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Tuesday, 21 April 2026

भारत-नेपाल सीमा पर बालेन शाह का कड़ा फैसला: रोटी-बेटी के रिश्तों में कड़वाहट, छोटी-छोटी खरीदारी पर भी भन्सार का बोझ

भारत-नेपाल सीमा पर बालेन शाह का कड़ा फैसला: रोटी-बेटी के रिश्तों में कड़वाहट, छोटी-छोटी खरीदारी पर भी भन्सार का बोझ
-Friday World-April 21,2026 
                   प्रतिकात्मक तस्वीर 
नेपाल की नई सरकार के प्रधानमंत्री बालेन शाह (बालेंद्र शाह) के नेतृत्व में भारत-नेपाल सीमा पर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। वर्षों से चले आ रहे खुली सीमा, रोटी-बेटी और सांस्कृतिक संबंधों वाले दोनों देशों के बीच अब कड़वाहट की हवा बह रही है। नेपाल सरकार ने भन्सार महसूल अधिनियम २०८१ के तहत सख्त नियम लागू कर दिया है। अब भारत से नेपाल लाए जाने वाले 100 रुपये (लगभग NPR 160) से अधिक मूल्य के किसी भी सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी (भन्सार शुल्क) चुकाना पड़ेगा।

यह नियम मुख्य रूप से रक्सौल-बीरगंज, बनबासा और अन्य प्रमुख सीमा चौकियों पर सख्ती से लागू किया जा रहा है। सशस्त्र प्रहरी बल (APF) के जवान माइकिंग कर लोगों को चेतावनी दे रहे हैं। छोटी-मोटी घरेलू खरीदारी, कपड़े, बर्तन, किराना सामान या दैनिक उपयोग की चीजें भी अब इस नियम के दायरे में आ गई हैं। परिणामस्वरूप सीमा क्षेत्रों में आम नागरिकों, खासकर महिलाओं और छोटे व्यापारियों में भारी रोष व्याप्त है।

 पुरानी परंपरा पर लगा ताला

भारत-नेपाल सीमा पर सदियों से एक अनौपचारिक व्यवस्था चली आ रही थी। नेपाल के तराई क्षेत्र (मधेश प्रदेश) के लोग, विशेष रूप से महिलाएं, सस्ते दामों पर भारतीय बाजारों (बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड) से घरेलू सामान खरीदकर लाते थे। नेपाल में महंगाई ज्यादा होने के कारण बिहार के रक्सौल, मोतिहारी या अन्य सीमावर्ती शहरों में खरीदारी करना आम बात थी। लोग कहते थे – “भारत से सस्ता सामान लाकर परिवार का बजट बचाते हैं।”

लेकिन अब स्थिति बदल गई है। APF के जवान हर बैग की सघन जांच कर रहे हैं। 100 रुपये से ऊपर का कोई भी सामान पकड़े जाने पर ड्यूटी (5% से लेकर 80% तक, सामान के प्रकार पर निर्भर) वसूली जा रही है। इससे न केवल समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि छोटी खरीदारी भी महंगी पड़ रही है। कई जगहों पर घर्षण की घटनाएं भी रिपोर्ट हुई हैं।

 जन आक्रोश और विरोध प्रदर्शन

इस नई नीति के खिलाफ नेपाल के मधेश क्षेत्र में तीखा विरोध शुरू हो गया है। **जन अधिकार पार्टी** के अध्यक्ष डॉ. शरद सिंह यादव के नेतृत्व में बीरगंज के शंकराचार्य गेट और भारत-नेपाल मैत्री पुल के पास जोरदार प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने इसे “मधेश के लिए अघोषित नाकाबंदी” करार दिया।

उन्होंने कहा कि मधेशी मूल के बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने पर क्षेत्र के लोग उत्साहित थे, लेकिन महज कुछ हफ्तों में ही ऐसा फैसला लिया गया जो आम लोगों की रोजी-रोटी पर सीधा हमला है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि महसूल बढ़ाने के नाम पर सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

काठमांडू में भी इस नीति के विरुद्ध दखल दिए जा रहे हैं। सत्ताधारी दल के कुछ सांसदों ने भी असंतोष जताया है। **राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी** के सांसदों ने प्रधानमंत्री बालेन शाह और गृह मंत्री से इस नीति पर पुनर्विचार की मांग की है।

सत्तापक्ष में भी बेचैनी

विरोध केवल विपक्ष तक सीमित नहीं है। सत्तापक्ष के अंदर भी असंतोष की लहर है। कई नेताओं का मानना है कि यह नीति सीमा क्षेत्र के लोगों की वास्तविकता को नजरअंदाज करती है। मधेश प्रदेश के पुलिस प्रमुख DIG गोविंद थपलिया ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि घरेलू उपयोग के सामान लाने वाले सामान्य नागरिकों को अनावश्यक परेशान न किया जाए और संवेदनशीलता बरती जाए।

 व्यापारियों का दोहरा नजरिया

बीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के उपाध्यक्ष माधव राजपाल का कहना है कि शुरू में तो परेशानी होगी, लेकिन लंबे समय में यह नीति नेपाल के स्थानीय उद्योगों और व्यापार को बढ़ावा देगी। सरकार का तर्क भी यही है कि अनौपचारिक व्यापार से होने वाले राजस्व के नुकसान को रोकना और देशी उत्पादों को प्रोत्साहन देना जरूरी है।

लेकिन सीमा क्षेत्र के छोटे व्यापारी और उपभोक्ता इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि नेपाल में कई सामानों की उपलब्धता या गुणवत्ता अभी भारतीय बाजार जितनी नहीं है। अचानक सख्ती से गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों का बजट बिगड़ रहा है। भारतीय सीमा क्षेत्रों (रक्सौल, खटीमा आदि) के बाजारों में भी नेपाली खरीदारों की आवाजाही कम होने से व्यापार पर असर पड़ रहा है।

 क्या है सरकार का उद्देश्य?

नेपाल सरकार का कहना है कि यह नियम पहले से कानून में था, लेकिन लागू नहीं हो रहा था। अब नई सरकार इसे सख्ती से लागू कर राजस्व बढ़ाना और छोटे पैमाने के अनौपचारिक आयात (जिसे smuggling भी कहा जा सकता है) को नियंत्रित करना चाहती है। साथ ही भारतीय नंबर प्लेट वाली निजी गाड़ियों पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं, जिससे अतिरिक्त विवाद बढ़ा है।

विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि राजस्व संरक्षण और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य सराहनीय है, लेकिन सीमा क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना अचानक सख्ती से लोगों में नाराजगी स्वाभाविक है। खासकर मधेश प्रदेश, जहां भारत के साथ पारिवारिक और सांस्कृतिक रिश्ते बहुत गहरे हैं।

 आगे क्या?

वर्तमान में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। विरोध प्रदर्शन जारी हैं और मांग है कि 100 रुपये की सीमा को बढ़ाया जाए या घरेलू उपयोग के सामान को छूट दी जाए। दोनों देशों के बीच राजनयिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर चर्चा की संभावना है।

भारत-नेपाल संबंध हमेशा से विशेष रहे हैं। खुली सीमा, मुक्त आवागमन और आपसी विश्वास इन रिश्तों की मजबूती है। अगर इस विवाद को संवेदनशील तरीके से सुलझाया गया तो रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं। लेकिन अनदेखी की गई तो छोटी-छोटी खरीदारी का यह मुद्दा बड़े राजनैतिक और सामाजिक तनाव में बदल सकता है।

सीमा के दोनों ओर के लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द ही कोई संतुलित समाधान निकलेगा, ताकि रोटी-बेटी का रिश्ता फिर से मीठा हो सके और रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य हो जाए।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 21,2026