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Saturday, 11 April 2026

जन आक्रोश की लहर: बेरोजगारी, महंगाई और दबाव के नियम — क्या सरकारें इतिहास से सबक लेंगी?

जन आक्रोश की लहर: बेरोजगारी, महंगाई और दबाव के नियम — क्या सरकारें इतिहास से सबक लेंगी?
-Friday World-April 11,2026
लोकतंत्र में जनता की आवाज़ सबसे मजबूत होती है। लेकिन जब यह आवाज़ गुस्से में बदल जाती है, तो पूरा सिस्टम हिल जाता है। हाल के वर्षों में कई देशों में जो हुआ, वह इस सच्चाई का जीवंत उदाहरण है। 2022 का एक देश जहां आर्थिक संकट ने जनता को सड़कों पर ला दिया, 2024 का दूसरा जहां छात्र आंदोलन ने सत्ता बदल दी, और 2025 का तीसरा जहां युवा विद्रोह ने राजनीतिक अस्थिरता को चरम पर पहुंचाया — इन घटनाओं ने साबित किया कि बेरोजगारी, महंगाई और जनता में पनपता आक्रोश किसी भी सरकार की जड़ें उखाड़ सकता है। अब सवाल यह है कि बढ़ते असंतोष को नजरअंदाज किया जा सकता है? युवा सोशल मीडिया पर अपनी निराशा व्यक्त कर रहा है, हर गली-मोहल्ले में गुस्सा सुनाई दे रहा है, फिर भी समस्याओं के बजाय सवाल उठाने वालों को दबाने की कोशिशें हो रही हैं।

👉 श्रीलंका
 हाल की घटनाएं: आक्रोश कैसे सरकारें गिराता है
2022 में एक देश भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार खत्म, ईंधन-खाद्य पदार्थों की कमी, लंबी कतारें और बिजली कटौती ने आम लोगों को हताश कर दिया। जनता का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। “अरागलाया” नामक आंदोलन ने सत्ता में बैठे नेताओं को बेदखल कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया और अंततः सत्ता परिवर्तन हो गया। यह आंदोलन युवाओं और आम नागरिकों का था, जो आर्थिक mismanagement और भ्रष्टाचार से तंग आ चुके थे।
👉 बांग्लादेश 
 2024 में दूसरे देश में सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुआ। लेकिन जल्द ही यह व्यापक जन आक्रोश में बदल गया। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग ने युवाओं को एकजुट किया। सरकार की कड़ी दमनकारी कार्रवाई ने आग में घी डाला। सैकड़ों मौतों के बाद प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और देश छोड़ना पड़ा। छात्रों और युवाओं की यह “जन विद्रोह” साबित करता है कि जब युवा बेरोजगार महसूस करते हैं और सिस्टम को पक्षपाती मानते हैं, तो छोटी चिंगारी भी बड़ा विस्फोट कर सकती है।
👉 नेपाल 
 2025 में तीसरे देश में “जनरेशन जेड” आंदोलन सोशल मीडिया प्रतिबंध से शुरू हुआ, लेकिन जड़ें गहरी थीं — भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नेपोतिज्म और राजनीतिक अस्थिरता। युवाओं ने सड़कों पर उतरकर संसद भवन तक पहुंचाया। हिंसक घटनाओं में कई मौतें हुईं, लेकिन दबाव इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इन तीनों उदाहरणों में एक बात समान थी — खामोश आक्रोश जब फूटा, तो राजनीतिक ध्रुवीकरण या दमन भी उसे नहीं रोक सका।

👉 ये घटनाएं चेतावनी हैं। कोई भी सरकार जनता की रोजमर्रा की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं कर सकती। बेरोजगारी और असमान विकास जब युवा वर्ग को प्रभावित करता है, तो वह सिर्फ वोट नहीं, बल्कि सिस्टम बदलने की मांग करता है।

बढ़ती चुनौतियां: युवा बेरोजगारी और जनता का गुस्सा
देश दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला है। 15-29 वर्ष के बीच करीब 36 करोड़ युवा हैं, जिनमें से कई शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं लेकिन नौकरियां नहीं मिल रही हैं। Azim Premji University की State of Working India 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 15-25 वर्ष के स्नातकों में लगभग 40% बेरोजगार हैं, जबकि 25-29 वर्ष के आयु वर्ग में यह आंकड़ा 20% के आसपास है। शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर कुल बेरोजगारी से कहीं ज्यादा है।

हर साल करीब 50 लाख स्नातक बाजार में आते हैं, लेकिन स्थायी वेतनभोगी नौकरियां बहुत कम सृजित हो रही हैं। कई युवा अपनी योग्यता से नीचे के काम करने को मजबूर हैं या बेरोजगार घूम रहे हैं। Periodic Labour Force Survey के आंकड़ों में कुल बेरोजगारी दर 4.9% के आसपास दिखाई देती है, लेकिन युवा (15-29 वर्ष) वर्ग में यह 14-16% तक पहुंच जाती है। शहरी क्षेत्रों और शिक्षित युवाओं में स्थिति और गंभीर है।

महंगाई भी आम जनता को परेशान कर रही है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से घरेलू बजट प्रभावित हो रहा है। RBI सर्वे में घरेलू स्तर पर महंगाई की उम्मीदें बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों की सराहना होती है, लेकिन रोजगार सृजन की गति अपेक्षित नहीं है। युवा महसूस कर रहा है कि विकास के लाभ समान रूप से नहीं बंट रहे।

सोशल मीडिया पर युवा अपनी निराशा व्यक्त कर रहा है — भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, नौकरियों की कमी, महंगाई और भविष्य की अनिश्चितता। यह गुस्सा हर गली-मोहल्ले में महसूस किया जा सकता है।

 समाधान की बजाय दमन: सवाल पूछने वालों पर कार्रवाई
समस्याओं का सामना करने की बजाय सरकार अक्सर आलोचना करने वालों को निशाना बनाती दिखाई देती है। पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और सामान्य नागरिकों पर विभिन्न कानूनों का इस्तेमाल बढ़ा है, जो “चिलिंग इफेक्ट” पैदा कर रहा है। अब सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

2026 में आईटी नियमों के संशोधनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अवैध कंटेंट हटाने के लिए सिर्फ 3 घंटे का समय दिया गया है (पहले 36 घंटे थे)। “न्यूज और करंट अफेयर्स” से जुड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट को भी नैतिकता कोड के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। सरकार का तर्क फेक न्यूज, हेट स्पीच और डीपफेक को रोकना है, लेकिन आलोचक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं। छोटे क्रिएटर्स और युवा इंफ्लुएंसर्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

सोशल मीडिया आज युवाओं की सबसे बड़ी आवाज़ है। इसे नियंत्रित करने की कोशिश गुस्से को दबा सकती है, लेकिन जड़ें नहीं मिटा सकती। हाल की घटनाओं में भी सोशल मीडिया प्रतिबंध या दमन ने आंदोलनों को और भड़काया।

 चुनाव के समय राजनीतिक ध्रुवीकरण और जन आक्रोश
अगर चुनाव नजदीक हों और राजनीतिक दल ध्रुवीकरण के जरिए वोट हासिल करने की कोशिश करें, तब भी खामोश जन आक्रोश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब जनता की बुनियादी समस्याएं — रोजगार, महंगाई, पारदर्शी भर्तियां — अनसुलझी रहती हैं, तो ध्रुवीकरण सिर्फ अस्थायी राहत देता है। लंबे समय में आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है।

सरकार को समझना होगा कि लोकप्रियता सिर्फ सर्वेक्षणों में नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में नजर आती है। विकास के लाभ अगर हर वर्ग तक नहीं पहुंच रहे, युवा निराश है और सवाल पूछने पर गिरफ्तारियां हो रही हैं, तो गुस्सा स्वाभाविक है। नियमों से उफान को दबाया नहीं जा सकता — उसे सुनकर समाधान निकालना पड़ता है।

 समाधान की राह: संवाद और ठोस कदम
जन आक्रोश को अवसर में बदलने के लिए सरकार को निम्न कदम उठाने चाहिए:

- रोजगार सृजन पर प्राथमिकता: स्किल डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश। लेबर कोड्स का प्रभावी क्रियान्वयन ताकि फॉर्मलाइजेशन बढ़े और युवाओं को स्थायी नौकरियां मिलें।
- भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता: परीक्षाओं में सख्त एंटी-लीक मेकैनिज्म, समयबद्ध भर्तियां और मेरिट को प्राथमिकता।
- महंगाई पर नियंत्रण: आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और वैश्विक झटकों से बचाव के उपाय।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: आलोचना को दुश्मन न मानकर सुधार का माध्यम बनाना। सोशल मीडिया पर फेक न्यूज से निपटने के लिए बेहतर तंत्र विकसित करना, न कि पूर्ण नियंत्रण।
- समावेशी विकास: असमानता कम करने वाली नीतियां, ताकि विकास का लाभ गरीब, युवा और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचे।

लोकतंत्र में जनता राजा है। हाल की घटनाएं सिखाती हैं कि गुस्से को दबाने से समस्या हल नहीं होती। बल्कि उसे सुनकर, संवाद स्थापित करके और ठोस समाधान निकालकर विश्वास बहाल किया जा सकता है।

देश की युवा शक्ति सबसे बड़ी ताकत है। अगर इस शक्ति को निराशा की बजाय अवसर दिए जाएं, तो देश वाकई नई ऊंचाइयों को छू सकता है। लेकिन अगर बेरोजगारी और आक्रोश को नजरअंदाज किया गया, तो खामोश गुस्सा किसी भी समय उफान मार सकता है — जैसा हाल की घटनाओं में देखा गया।

सरकार को अब फैसला करना है — दमन या संवाद? नियमों से दबाव या समस्याओं का समाधान? इतिहास दोहराया नहीं जाना चाहिए। जनता की आवाज़ को सम्मान देना ही सबसे बड़ा राज है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 11,2026