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Saturday, 11 April 2026

"हसन नीयत है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं: ग़ालिबाफ़ की इस्लामाबाद में सख्त चेतावनी, ईरान-अमेरिका शांति वार्ता की शुरुआत से पहले तनावपूर्ण माहौल"

"हसन नीयत है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं: ग़ालिबाफ़ की इस्लामाबाद में सख्त चेतावनी, ईरान-अमेरिका शांति वार्ता की शुरुआत से पहले तनावपूर्ण माहौल"-Friday World-April 11,2026 
इस्लामाबाद, 11 अप्रैल 2026 – ईरान और अमेरिका के बीच हालिया संघर्ष के बाद पहली बार शांति वार्ता की मेजबानी कर रहा पाकिस्तान इन दिनों वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ के नेतृत्व में उच्चस्तरीय ईरानी प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार देर रात इस्लामाबाद पहुंचा। एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बात करते हुए ग़ालिबाफ़ ने साफ़ कहा, “हमारी मंशा अच्छी (हसन नीयत) है, लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं है।”

यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच एक नाजुक संघर्षविराम (सीजफायर) लागू है, लेकिन गहरी अविश्वास की दीवार खड़ी है। ग़ालिबाफ़ की टिप्पणी ने वार्ता की शुरुआत से पहले ही माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है।

 ग़ालिबाफ़ का सख्त संदेश: पिछले अनुभवों से सबक
ईरानी राज्य मीडिया तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, इस्लामाबाद एयरपोर्ट पर ईरानी पत्रकारों से बातचीत में ग़ालिबाफ़ ने कहा, “दुर्भाग्यवश, अमेरिकियों के साथ हमारे مذاکरात का अनुभव हमेशा असफलता और वादाखिलाफी से भरा रहा है। एक साल से भी कम समय में दो बार, बातचीत के दौरान और हमारे नेक इरादों के बावजूद, हम पर हमला किया गया और कई युद्ध अपराध किए गए। हमारी मंशा अच्छी है, लेकिन हमें अमेरिका पर भरोसा नहीं है।”

ग़ालिबाफ़ ने आगे जोड़ा कि अगर अमेरिका एक सच्चे और वास्तविक समझौते के लिए तैयार है तथा ईरानी लोगों के वैध अधिकारों को मान्यता देता है, तो ईरान भी पूर्ण तत्परता से समझौते की ओर बढ़ेगा। लेकिन अगर वाशिंगटन वार्ता को केवल शक्ति प्रदर्शन या धोखे की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है, तो ईरान अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी क्षमताओं पर भरोसा करेगा।

उन्होंने हालिया संघर्ष में ईरान की रक्षात्मक और जवाबी कार्रवाइयों का जिक्र करते हुए कहा, “यह इस बात का सबूत है कि ईरान अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए पूरी तरह तैयार और दृढ़ संकल्पित है।”

 प्रतिनिधिमंडल की ताकत और एजेंडा
ईरानी प्रतिनिधिमंडल काफी शक्तिशाली है। ग़ालिबाफ़ के अलावा विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची, रक्षा परिषद सचिव अली अकबर अहमदियान, सेंट्रल बैंक गवर्नर अब्दुलनासिर हेम्मती और संसद के कई सदस्य शामिल हैं। कुल मिलाकर 71 सदस्यों का यह दल सुरक्षा, राजनीतिक, सैन्य, आर्थिक और कानूनी समितियों में बंटा हुआ है, जो व्यापक चर्चा की तैयारी दर्शाता है।

वार्ता के प्रमुख मुद्दे शामिल हैं:
- नाजुक सीजफायर को स्थायी शांति समझौते में बदलना
- ईरान पर लगे प्रतिबंधों में राहत
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की सुरक्षा और खुलापन
- लेबनान में स्थिति
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन का अधिकार

ईरान ने वार्ता शुरू करने से पहले कुछ पूर्व शर्तें रखी हैं, जिनमें लेबनान में सीजफायर का सख्ती से पालन और ईरानी संपत्तियों को अनफ्रीज करना शामिल है। ग़ालिबाफ़ ने संकेत दिया कि ये शर्तें पूरी न होने पर औपचारिक बातचीत शुरू करना मुश्किल होगा।

पाकिस्तान की भूमिका: मध्यस्थता का नाजुक संतुलन
पाकिस्तान इस वार्ता का मेजबान है और दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली में अहम भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक दार और आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। पाकिस्तान ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए “मेक या ब्रेक” मौका बताया है।

अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस करेंगे, जिनके साथ स्टीव विटकोफ और जared कुश्नर जैसे प्रमुख व्यक्ति शामिल हैं। दोनों पक्षों के बीच गहरी शंका है। अमेरिका ने भी ईरान पर सीजफायर उल्लंघन के आरोप लगाए हैं, जबकि ईरान पुरानी वादाखिलाफियों को याद दिला रहा है।

पृष्ठभूमि: संघर्ष से शांति की ओर?
हाल के हफ्तों में ईरान और इजराइल के बीच तनाव चरम पर पहुंचा था, जिसमें अमेरिका ने इजराइल का समर्थन किया। ईरान ने जवाबी हमले किए, जिससे क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ गई। पाकिस्तान और मिस्र जैसे देशों की मध्यस्थता से एक अस्थायी सीजफायर हुआ, लेकिन दोनों पक्ष इसे तोड़ने का आरोप एक-दूसरे पर लगा रहे हैं।

ईरान का रुख स्पष्ट है – वह अपने संप्रभु अधिकारों, खासकर परमाणु कार्यक्रम में यूरेनियम संवर्धन के अधिकार की रक्षा पर अड़ा हुआ है। वहीं अमेरिका ईरान के परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित करना चाहता है और क्षेत्र में इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है।

 क्या होगा आगे?
वार्ता आज (11 अप्रैल) से शुरू होने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि गहरे अविश्वास के बावजूद दोनों पक्ष युद्ध थामने के लिए कुछ समझौते तक पहुंच सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान दूर दिख रहा है। ग़ालिबाफ़ का बयान ईरान की मजबूत स्थिति को दर्शाता है – वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन बिना शर्त नहीं।

ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर अमेरिका धोखे की नीति अपनाएगा तो वह अपनी क्षमताओं (मिसाइल, ड्रोन और क्षेत्रीय प्रभाव) पर भरोसा करेगा। वहीं पाकिस्तान की मेजबानी इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय शक्तियां अब बड़े संघर्ष को टालने के लिए सक्रिय हो गई हैं।

यह वार्ता न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों बल्कि पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल निर्यात का प्रमुख मार्ग है – अगर यह प्रभावित हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

ग़ालिबाफ़ का “हसन नीयत लेकिन भरोसा नहीं” वाला बयान ईरान की वर्तमान कूटनीतिक रणनीति का सार है। वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन आत्मसमर्पण भी नहीं करेगा। अब सबकी निगाहें इस्लामाबाद की इन बंद कमरों पर हैं, जहां दो विरोधी ताकतें एक-दूसरे के साथ बैठकर क्षेत्र को युद्ध की आग से बचाने की कोशिश करेंगी। सफलता मिली तो शांति की नई सुबह हो सकती है, वरना तनाव और बढ़ सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 11,2026