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मनोज झा, राजद सांसद, ने एक तीखा तंज कसा है जो इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है। उनका कहना है कि वडा प्रधान श्री (बड़े नेता) चुनाव वाले राज्यों में बार-बार एंबुलेंस को रास्ता देते नजर आते हैं, लेकिन अब यह दृश्य बनावटी लगने लगा है। उन्होंने पुरानी एम्बुलेंस को भी रास्ता देने का विशेष उल्लेख करते हुए पूछा—“एक ही पटकथा कितने बार इस्तेमाल की जाएगी? स्क्रिप्ट राइटर को कुछ नया लिखना चाहिए।”
यह टिप्पणी बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा या अन्य चुनावी राज्यों में बार-बार वायरल होने वाले उन वीडियो पर कटाक्ष है, जिनमें वीवीआईपी काफिले के बीच अचानक एंबुलेंस प्रकट हो जाती है और साहेब तुरंत रास्ता दे देते हैं। कुछ वीडियो में पीएम नरेंद्र मोदी का काफिला सिलीगुड़ी या भुवनेश्वर में एंबुलेंस के लिए रुकता दिखाया गया। कुछ में अन्य नेताओं के काफिले भी यही इंसानीयत दिखाते नजर आए। लेकिन बार-बार दोहराए जाने वाले इन दृश्यों पर अब सवाल उठने लगे हैं—क्या यह वाकई संवेदनशीलता है या चुनावी इमेज बनाने का एक पुराना फॉर्मूला?
पुरानी एम्बुलेंस वाली पटकथा
मनोज झा ने सही कहा—पुरानी एम्बुलेंस को भी रास्ता देने का विशेष उल्लेख जरूरी है। कई बार वीडियो में देखा जाता है कि काफिले के रास्ते में एक जर्जर, पुरानी एंबुलेंस आ जाती है, सायरन बजाते हुए। काफिला रुक जाता है, सुरक्षा कर्मी हाथ जोड़कर या इशारे से रास्ता साफ करते हैं, और नेता मुस्कुराते हुए ‘इंसानियत पहले’ का संदेश देते नजर आते हैं।
यह दृश्य इतना दोहराया जा चुका है कि अब दर्शक सोचने लगे हैं—क्या हर चुनावी राज्य में एंबुलेंस का ‘कास्टिंग’ पहले से तय होता है? क्या स्क्रिप्ट राइटर हर बार वही डायलॉग लिखते हैं— “रास्ता दो भाई, कोई मरीज है”?
बिहार में तो यह और भी चर्चित रहा है। कुछ साल पहले नीतीश कुमार के काफिले के आगे एंबुलेंस रोकी जाने के वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें मरीज के परिजन रोते दिखे थे। तब विपक्ष ने तीखी आलोचना की थी कि वीवीआईपी संस्कृति आम आदमी की जान से भी ऊपर है। लेकिन अब जब चुनावी मौसम आता है, तो पटकथा पलट जाती है—अब काफिला रुकता है, एंबुलेंस निकल जाती है।
चुनावी राज्यों में बार-बार क्यों?
चुनाव वाले राज्यों में यह ड्रामा क्यों दोहराया जाता है? जवाब साफ है—इमेज मैनेजमेंट। आधुनिक राजनीति में वायरल वीडियो की ताकत बहुत बड़ी है। एक छोटा सा क्लिप, जिसमें नेता एंबुलेंस को रास्ता देता दिखे, लाखों लोगों तक ‘कॉम्पैशनेट लीडर’ का मैसेज पहुंचा देता है।
- पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी रोडशो के दौरान पीएम मोदी के काफिले ने एंबुलेंस को प्राथमिकता दी।
- ओडिशा के भुवनेश्वर में भी यही हुआ।
- असम, गुजरात और अन्य जगहों पर भी ऐसी घटनाएं सामने आईं।
ये वीडियो तुरंत सोशल मीडिया पर शेयर होते हैं। हैशटैग बनते हैं—#HumanityFirst, #NoVIPCulture। लेकिन जब यह बार-बार होता है, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। मनोज झा जैसे नेता इसी संदेह को आवाज देते हैं। उनका तंज है कि असली समस्या यह नहीं कि एंबुलेंस को रास्ता दिया जाए—वह तो होना ही चाहिए—समस्या यह है कि यह ‘शो’ बन गया है।
वीवीआईपी संस्कृति का दोहरा चेहरा
सच्चाई यह है कि भारत में वीवीआईपी संस्कृति अभी भी गहरी जड़ें जमाए हुए है। रोजमर्रा की जिंदगी में आम एंबुलेंस को ट्रैफिक में फंसना पड़ता है। सायरन बजाने के बावजूद लोग रास्ता नहीं देते। अस्पताल पहुंचने में देरी हो जाती है। लेकिन जब चुनावी काफिला होता है, तो अचानक ‘इंसानियत’ जाग उठती है।
मनोज झा का इशारा इसी दोहरेपन की ओर है। अगर सचमुच एंबुलेंस को प्राथमिकता दी जाती, तो हर दिन, हर जगह, बिना कैमरे के यह होता। लेकिन जब कैमरे चल रहे हों और चुनाव नजदीक हों, तो यह बनावटी लगता है।
पुरानी एंबुलेंस का जिक्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह आम आदमी की सच्ची तस्वीर दिखाती है—सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत, जर्जर वाहन, लेकिन फिर भी जान बचाने की कोशिश। अगर नेता सच में संवेदनशील हैं, तो उन्हें इस व्यवस्था को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए, न कि सिर्फ वायरल वीडियो बनाने पर।
स्क्रिप्ट राइटर को नया क्या लिखना चाहिए?
मनोज झा ने ठीक कहा—स्क्रिप्ट राइटर को कुछ नया करना चाहिए।
नई पटकथा में क्या हो सकता है?
- हर दिन बिना कैमरे के एंबुलेंस को रास्ता देने की संस्कृति बनाना।
- ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन कराना, ताकि आम एंबुलेंस को भी प्राथमिकता मिले।
- स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, ताकि पुरानी एंबुलेंस की जगह आधुनिक, सुसज्जित वाहन हों।
- वीवीआईपी मूवमेंट को भी यातायात के सामान्य नियमों में बांधना, ताकि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित न हो।
राजनीति में इमेज जरूरी है, लेकिन इमेज से ज्यादा जरूरी है असली काम। अगर नेता सच में जनता की सेवा करना चाहते हैं, तो एंबुलेंस को रास्ता देने का एक-दो वीडियो काफी नहीं—पूरी व्यवस्था को बदलना होगा।
अंत में एक सवाल
मनोज झा का तंज सिर्फ एक सांसद की टिप्पणी नहीं है। यह आम आदमी की आवाज है जो बार-बार दोहराए जाने वाले ड्रामे से थक चुका है। चुनाव आते हैं, काफिले निकलते हैं, एंबुलेंस आती है, रास्ता मिलता है—और फिर सब भूल जाते हैं।
क्या वाकई हम इंसानियत दिखा रहे हैं या सिर्फ इंसानियत का प्रदर्शन कर रहे हैं?
जब तक स्क्रिप्ट नहीं बदलेगी, पटकथा वही पुरानी चलेगी। और जनता अब पुरानी फिल्में देख-देखकर ऊब चुकी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 12,2026