अप्रैल 2026 की इस गर्मी में दुनिया एक बार फिर 1970 के दशक के तेल संकट से भी बदतर ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नौसेना नाकाबंदी की घोषणा के बाद तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ब्रेंट क्रूड 101-105 डॉलर और WTI 90-95 डॉलर के आसपास पहुंच चुका है। यह नाकाबंदी, जो ईरान के बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों को निशाना बनाने के लिए की गई थी, अब पूरे विश्व के ऊर्जा आपूर्ति को खोखला कर रही है।
होर्मुज क्या है और क्यों इतना महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला संकरा जलमार्ग है। दुनिया का लगभग 20% तेल और प्राकृतिक गैस (LNG) इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने फरवरी 2026 में शुरू हुए अमेरिका-इजरायल संघर्ष के बाद इस जलमार्ग को लगभग बंद कर दिया था। ईरानी क्रांतिकारी गार्ड ने कई जहाजों पर हमला किया और कुछ को जब्त भी कर लिया। ट्रम्प प्रशासन ने अप्रैल 2026 में जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों से जुड़े जहाजों पर नाकाबंदी लगा दी।
ट्रम्प का दावा था कि यह नाकाबंदी ईरान पर दबाव डालेगी, उसे तेल राजस्व से वंचित करेगी और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए मजबूर करेगी। लेकिन वास्तविकता उल्टी साबित हो रही है।
ट्रम्प का दांव क्यों उल्टा पड़ा?
1. तेल आपूर्ति में भारी कमी: होर्मुज से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल निकलता था। अब यातायात लगभग ठप है। केवल कुछ जहाज ही गुजर पा रहे हैं, और वे भी जोखिम उठाकर। इससे गल्फ क्षेत्र की 80 से ज्यादा ऊर्जा सुविधाएं प्रभावित हुई हैं, जिनमें से एक-तिहाई गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हैं।
2. कीमतों में रिकॉर्ड उछाल: संघर्ष शुरू होने से पहले तेल 70-80 डॉलर के आसपास था। अब ब्रेंट 100 डॉलर पार कर चुका है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर स्थिति लंबी चली तो कीमतें 150 डॉलर तक पहुंच सकती हैं। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 4.12 डॉलर प्रति गैलन हो गई है, जो युद्ध से पहले से 38% ज्यादा है।
3. 1970 के संकट से भी बदतर: इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने इसे 1973-79 के तेल संकटों और यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा बताया। एसएंडपी ग्लोबल के डेनियल येरगिन कहते हैं कि इतना बड़ा आपूर्ति झटका पहले कभी नहीं देखा गया।
# भारत और दुनिया पर क्या असर?
भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए यह संकट गंभीर है। हमारा बड़ा हिस्सा तेल खाड़ी क्षेत्र से आता है। होर्मुज बंद होने से:
- पेट्रोल-डीजल महंगा: पंप पर कीमतें बढ़ेंगी, परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगा होगा।
- खाद्य महंगाई: खाद्यान्नों के लिए जरूरी खाद (फर्टिलाइजर) महंगा हो जाएगा, क्योंकि उसका उत्पादन गैस पर आधारित है।
- जेट ईंधन संकट: हवाई यात्रा और कार्गो महंगा, पर्यटन और व्यापार प्रभावित।
- आर्थिक मंदी का खतरा: बढ़ती महंगाई और ऊर्जा लागत से वैश्विक विकास दर घट सकती है। एशिया के कई देश राशनिंग लगा चुके हैं।
चीन, जो गल्फ तेल का बड़ा आयातक है, भी दबाव में है। ट्रम्प ने कहा कि प्रभावित देश अमेरिकी तेल खरीदें, लेकिन अमेरिका खुद भी ऊंची कीमतों से नहीं बचा है।
ईरान की स्थिति और जवाबी कार्रवाई
ईरान ने नाकाबंदी को “युद्ध का कार्य” बताया है। उसने कई जहाजों पर गोलीबारी की और दो को जब्त कर लिया। ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि जब तक अमेरिका नाकाबंदी नहीं हटाएगा, होर्मुज पूरी तरह बंद रहेगा। ट्रम्प ने सीजफायर बढ़ाया है लेकिन नाकाबंदी बनाए रखी है। वे कहते हैं कि ईरान को परमाणु कार्यक्रम रोकना होगा और समझौता करना होगा, वरना “देश के बाकी हिस्से” को नष्ट कर देंगे।
विश्लेषक ट्रिता पारसी चेतावते हैं कि ज्यादा तेल बाजार से हटाने से कीमतें और बढ़ेंगी। पेंटागन ने चेताया है कि होर्मुज से ईरानी माइन्स हटाने में 6 महीने लग सकते हैं।
आगे क्या?
शांति वार्ताएं (इस्लामाबाद टॉक्स सहित) फेल हो चुकी हैं। ट्रम्प का कहना है कि उनके पास समय है, लेकिन ईरान के पास नहीं। लेकिन वास्तविकता यह है कि लंबा संकट अमेरिका की खुद की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है। स्टॉक मार्केट्स अस्थिर हैं, मुद्रास्फीति बढ़ रही है।
विश्व को उम्मीद है कि जल्द कोई समझौता हो, होर्मुज खुलें और तेल की आपूर्ति बहाल हो। लेकिन फिलहाल स्थिति गंभीर है। IEA और अन्य संस्थाएं चेतावनी दे रही हैं कि अगर स्थिति दो साल तक चली तो क्षेत्र की उत्पादन क्षमता पूरी तरह बहाल होने में समय लगेगा।
यह संकट सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का है। ट्रम्प की “मजबूत” नीति का उल्टा असर पड़ रहा है – ईरान पर दबाव तो है, लेकिन पूरी दुनिया महंगाई और मंदी की आग में जल रही है।
होर्मुज नाकाबंदी ट्रम्प के लिए रणनीतिक दांव थी, लेकिन अब यह वैश्विक आपदा बन गई है। 1970 के संकट से भी बड़ा यह ऊर्जा झटका हमें याद दिलाता है कि युद्ध और नाकाबंदी का असर हमेशा अप्रत्याशित और दूरगामी होता है। भारत को वैकल्पिक स्रोतों (रूस, अमेरिका आदि) पर जोर देना चाहिए और ऊर्जा दक्षता बढ़ानी चाहिए। दुनिया को शांति और स्थिर आपूर्ति की सख्त जरूरत है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 24,2026