-Friday World-April 13,2026
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका निष्पक्ष, संतुलित और जवाबदेह होनी चाहिए। लेकिन जब सरकारी धन से संचालित Doordarshan News (DD News) जैसे सार्वजनिक प्रसारक पर ही विपक्षी नेताओं के खिलाफ अशोभनीय, अपमानजनक और बेहूदगी भरी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है, तो सवाल उठता है – क्या यह सरकारी प्रचार तंत्र बन चुका है? हाल ही में DD News के एक वरिष्ठ एंकर अशोक श्रीवास्तव द्वारा राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं के प्रति इस्तेमाल की गई ‘चप्पल’ वाली भाषा और अत्यंत अपमानजनक टिप्पणियों ने पूरे देश में विवाद खड़ा कर दिया है।
टैक्सपेयर्स का पैसा यानी जनता का पैसा, जिससे DD News चलता है, उसका दुरुपयोग करके विपक्ष को निशाना बनाना न केवल पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करता है। सरकारी चैनल पर एंकर ने वो लकीर लांघ दी, जिसे पार करने की हिम्मत आज तक किसी भी भाजपा समर्थक या निजी चैनल के एंकर ने शायद ही दिखाई हो। यह घटना महज एक भाषाई फिसलन नहीं, बल्कि व्यवस्थागत पूर्वाग्रह और सरकारी मीडिया के ‘गोदी’ होने का स्पष्ट प्रमाण है।
DD News पर हुई बेहूदगी: क्या हुआ था?
हाल के एक कार्यक्रम में DD News के एंकर अशोक श्रीवास्तव ने राहुल गांधी पर टिप्पणी करते हुए ऐसी भाषा का प्रयोग किया जो किसी भी सभ्य बहस की सीमा से बाहर थी। ‘चप्पल’ वाली टिप्पणी के साथ-साथ विपक्षी नेताओं को अपमानित करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया गया। यह कोई पहली बार नहीं है। DD News पर विपक्ष को ‘गद्दार’ तक कहे जाने के आरोप लग चुके हैं। कांग्रेस ने पहले भी मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य नेताओं को ‘ट्रेटर’ (गद्दार) बताने वाले नैरेटिव पर आपत्ति जताई थी। लेकिन इस बार एंकर ने सीधे अपमानजनक शब्दावली का सहारा लिया, जो टेलीविजन पर लाइव प्रसारित हुआ।
जनता के पैसे से चलने वाला चैनल होने के बावजूद DD News पर निष्पक्षता का अभाव साफ दिखता है। जब विपक्ष संसद में मुद्दे उठाता है, तो उसे ‘अराजकता’ और ‘हंगामा’ बताया जाता है, जबकि सरकार की नीतियों पर कोई सवाल उठाने पर तुरंत ‘देशद्रोह’ का ठप्पा लगा दिया जाता है। एंकर अशोक श्रीवास्तव जैसे पत्रकारों की इस शैली ने DD News को ‘प्रचार भारती’ बनाने का आरोप मजबूत कर दिया है।
सरकारी मीडिया की जिम्मेदारी और उसका दुरुपयोग
भारत में प्रसार भारती के तहत DD News और आकाशवाणी सार्वजनिक सेवा प्रसारक हैं। इनका उद्देश्य निष्पक्ष समाचार देना, विविधता को प्रतिबिंबित करना और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना है। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है।
- टैक्सपेयर्स का पैसा: हर साल करोड़ों रुपये जनता के टैक्स से DD News को मिलते हैं। यह पैसा समाचार प्रसारण के लिए है, न कि किसी एक पार्टी के प्रचार या विपक्ष के चरित्र हनन के लिए।
- निष्पक्षता का उल्लंघन: जब एंकर खुले तौर पर एक पक्ष लेते हुए विपक्ष को ‘चप्पल’ से जोड़कर अपमानित करते हैं, तो यह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और प्रसार भारती के दिशानिर्देशों का सीधा उल्लंघन है।
- लकीर पार करना: निजी चैनलों पर भी तीखी बहस होती है, लेकिन सरकारी चैनल पर इस स्तर की बेहूदगी दुर्लभ है। भाजपा के कई समर्थक एंकर भी इस हद तक नहीं जाते, क्योंकि उन्हें कुछ हद तक बाजार और दर्शकों का डर रहता है। लेकिन DD News पर ‘सरकारी सुरक्षा’ का भरोसा होने से एंकर बेखौफ होकर लकीर पार कर जाते हैं।
यह घटना महज एक व्यक्ति की गलती नहीं है। यह पूरे सिस्टम की मानसिकता को दर्शाती है, जहां विपक्ष को कमजोर करने, उसकी छवि खराब करने और जनता को एकतरफा नैरेटिव थोपने का प्रयास किया जाता है।
विपक्ष पर हमले का पैटर्न
DD News पर विपक्ष के खिलाफ अपमानजनक भाषा कोई एकाकी घटना नहीं है।
- पहले खड़गे और इमरान मसूद को ‘गद्दार’ कहा गया।
- राहुल गांधी के विदेशी भाषणों को ‘अपमानजनक’ बताकर उन्हें देश की छवि खराब करने वाला करार दिया जाता है।
- संसद में विपक्ष के हंगामे को ‘बच्चों जैसा व्यवहार’ या ‘हूलिगनिज्म’ कहा जाता है।
- जबकि सरकार की उपलब्धियों को लगातार सराहा जाता है, विपक्ष के सवालों को ‘देश विरोधी’ ठहराया जाता है।
यह पैटर्न खतरनाक है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी होता है। अगर सरकारी मीडिया ही विपक्ष को लगातार अपमानित करेगा, तो बहस का स्तर गिरेगा, युवा नेतृत्व हतोत्साहित होगा और जनता को सही जानकारी नहीं मिलेगी।
पत्रकारिता की गरिमा और जवाबदेही
पत्रकारिता का मूल मंत्र है – सत्य, निष्पक्षता और साहस। लेकिन जब सरकारी एंकर टैक्सपेयर्स के पैसे पर बैठकर विपक्ष को गाली-गलौज की भाषा में संबोधित करते हैं, तो यह साहस नहीं, बल्कि सरकारी तलवे चाटना है।
अशोक श्रीवास्तव जैसे एंकरों को याद रखना चाहिए कि वे जनता के नौकर हैं, किसी पार्टी के प्रचारक नहीं। यदि वे अपनी जिम्मेदारी भूलकर व्यक्तिगत या राजनीतिक एजेंडा चलाते हैं, तो जनता को जवाब देना होगा।
विपक्षी दलों ने इस घटना पर आपत्ति जताई है। कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने प्रसार भारती और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से माफी की मांग की है। लेकिन सवाल यह है – क्या सिर्फ माफी काफी है? क्या DD News में आंतरिक सुधार, एंकरों की जवाबदेही और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे?
लोकतंत्र की रक्षा के लिए क्या जरूरी है?
1. प्रसार भारती की स्वायत्तता: सरकारी हस्तक्षेप कम होना चाहिए। संपादकीय स्वतंत्रता बहाल की जाए।
2. कोड ऑफ कंडक्ट: सरकारी मीडिया के लिए सख्त दिशानिर्देश बनाए जाएं, जिसमें अपमानजनक भाषा पर तुरंत कार्रवाई हो।
3. जनता की निगरानी: टैक्सपेयर्स को DD News के खर्च और कंटेंट पर सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए।
4. विपक्ष की भूमिका: विपक्ष को भी मीडिया पर दबाव बनाने के बजाय सशक्त वैकल्पिक नैरेटिव बनाना चाहिए।
5. नागरिक जागरूकता: दर्शकों को एकतरफा प्रचार से बचना चाहिए और विविध स्रोतों से जानकारी लेनी चाहिए।
DD News की यह घटना भारत के मीडिया परिदृश्य में एक चेतावनी है। अगर सरकारी चैनल इस रास्ते पर चला तो भविष्य में लोकतंत्र की आवाज और कमजोर हो जाएगी। टैक्सपेयर्स का पैसा विपक्ष को अपमानित करने में नहीं, बल्कि सच्ची खबरें देने में लगना चाहिए।
समय आ गया है कि प्रसार भारती और सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें। एंकरों को सख्त चेतावनी दी जाए, दोषियों पर कार्रवाई हो और DD News को फिर से निष्पक्ष सार्वजनिक प्रसारक बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएं। अन्यथा, जनता का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा और ‘सरकारी मीडिया’ का तमगा हमेशा के लिए लग जाएगा।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब मीडिया दोनों पक्षों को बराबर जगह दे। DD News पर हुई इस बेहूदगी ने साबित कर दिया कि अभी यह आदर्श बहुत दूर है। टैक्सपेयर्स अब और चुप नहीं रहेंगे। सवाल पूछेंगे, जवाब मांगेंगे और जवाबदेही तय करेंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 13,2026