28 फरवरी 2026 का वो भयानक दिन, जब मीनाब (मीनाबा) के शजराह तय्यिबा एलीमेंट्री स्कूल पर अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल ने हमला किया, दुनिया के इतिहास में एक और काला अध्याय बन गया। दर्जनों मासूम बच्चे, जिनकी उम्र महज 7 से 12 साल थी, स्कूल की दीवारों के नीचे दबकर शहीद हो गए। कुल मौतें 168 से अधिक बताई जा रही हैं, जिनमें ज्यादातर स्कूली बच्चे और शिक्षक शामिल थे। कोई युद्ध का मैदान नहीं था, कोई सैन्य ठिकाना नहीं—बल्कि एक सामान्य स्कूल, जहां बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, सपने संजो रहे थे।
यह नरसंहार महज एक "गलती" नहीं था। यह उस साम्राज्यवादी मानसिकता का हिस्सा है, जो दशकों से निर्दोषों के खून से अपने हथियार रंगती रही है। ठीक 38 साल पहले, 3 जुलाई 1988 में अमेरिका ने एक सिविलियन एयरबस को टारगेट करके गिरा दिया था। उस जहाज पर 290 यात्री सवार थे, जिनमें 66 बच्चे शामिल थे। कोई जंग नहीं चल रही थी, कोई खतरा नहीं था—फिर भी अमेरिकी नौसेना ने मिसाइल दाग दी।
दो घटनाएं, एक ही पैटर्न। एक ही अपराधी। और एक ही सवाल—कब तक चलेगा यह नरसंहार?
1988: ईरान एयर फ्लाइट 655 का नरसंहार
3 जुलाई 1988। फारस की खाड़ी। ईरान एयर फ्लाइट 655, एक एयरबस A300B2, बंदर अब्बास एयरपोर्ट से दुबई के लिए रवाना हुआ। यह एक नियमित सिविलियन उड़ान थी, निर्धारित रूट पर, ट्रांसपोंडर चालू और सिविलियन एयर कॉरिडोर में। onboard कुल 290 लोग थे—पुरुष, महिलाएं, बच्चे। 66 बच्चे अपनी मांओं के साथ यात्रा कर रहे थे।
USS विंसेन्स, एक अमेरिकी युद्धपोत, खाड़ी में था। उस समय ईरान-इराक युद्ध चल रहा था, लेकिन इस उड़ान के आसपास कोई सक्रिय लड़ाई नहीं थी। फिर भी, अमेरिकी नौसेना ने विमान को "F-14 फाइटर जेट" समझ लिया। बिना ठोस पुष्टि के, बिना सही चेतावनी दिए, दो सर्फेस-टू-एयर मिसाइलें दाग दी गईं। विमान टुकड़ों में बिखर गया और फारस की खाड़ी में समा गया। कोई बचा नहीं।
अमेरिका ने शुरू में दावा किया कि विमान "आक्रमक रूप से नीचे आ रहा था" और "खतरा" बन गया था। बाद में अपनी ही जांच रिपोर्ट (Fogarty Report) में स्वीकार किया कि विमान बढ़ते हुए था, सही रूट पर था और सिविलियन था। फिर भी, कप्तान विलियम रॉजर्स को "आउटस्टैंडिंग सर्विस" के लिए मेडल दे दिया गया। कोई सजा नहीं, कोई असली माफी नहीं। सिर्फ "दुख" का शब्द और मुआवजे के नाम पर कुछ पैसे।
66 बच्चे। कल्पना कीजिए—उनकी हंसी, उनके सपने, उनकी मासूमियत। सब कुछ एक पल में मिटा दिया गया। ईरान के परिवार आज भी उस दर्द को सहते हैं।
2026: मीनाब स्कूल पर टॉमहॉक हमला
38 साल बाद, इतिहास ने खुद को दोहराया—और भी भयानक रूप में।
28 फरवरी 2026। अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए। उसी दिन सुबह करीब 10:23 से 10:45 के बीच, दक्षिणी ईरान के हORMOZGAN प्रांत में मीनाब शहर के शजराह तय्यिबा लड़कियों के प्राथमिक स्कूल पर टॉमहॉक लैंड अटैक मिसाइल (TLAM) ने हमला किया। स्कूल एक IRGC नौसैनिक ठिकाने के बिल्कुल पास था, लेकिन हमला स्कूल पर ही पड़ा।
वीडियो फुटेज, सैटेलाइट इमेज और विशेषज्ञ विश्लेषण साफ बताते हैं कि अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल ने स्कूल को निशाना बनाया। "ट्रिपल-टैप" स्ट्राइक की खबरें आईं—एक के बाद एक मिसाइलें। स्कूल में क्लासेस चल रही थीं। बच्चियां पढ़ रही थीं। अचानक विस्फोट, धुआं, चीखें और मलबा। 168+ बच्चे और शिक्षक शहीद, दर्जनों घायल। ईरानी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में मौतों की संख्या 175 तक बताई गई है, जिनमें ज्यादातर 7-12 साल की लड़कियां।
अमेरिका ने शुरू में इनकार किया, फिर "टारगेटिंग मिस्टेक" कहा। पुरानी डेटा, गलत कोऑर्डिनेट्स। लेकिन सवाल उठता है—क्या इतनी एडवांस टेक्नोलॉजी के बावजूद स्कूल vs मिलिट्री बेस का फर्क नहीं पता चलता? क्या बच्चियों से भरा स्कूल "कोलैटरल डैमेज" बन सकता है?
UN एक्सपर्ट्स, Amnesty International और Human Rights Watch ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। स्कूल पर हमला, खासकर क्लास टाइम में, युद्ध अपराध हो सकता है। माता-पिता मलबे में बच्चों के शरीर के टुकड़े निकाल रहे थे। कब्रें खोदी गईं। दुनिया देख रही थी।
दो घटनाओं में समानता: साम्राज्यवाद का पैटर्न
- सिविलियन टारगेट: 1988 में सिविलियन एयरलाइनर, 2026 में सिविलियन स्कूल।
- बच्चों का नरसंहार: 66 बच्चे vs 168+ बच्चे।
- अमेरिकी जिम्मेदारी: दोनों बार US मिसाइलें, दोनों बार "गलती" का बहाना।
- कोई सजा नहीं: 1988 में मेडल, 2026 में जांच का ढोंग।
- मीडिया प्रोपेगैंडा: शुरू में इनकार, फिर आधा सच, फिर भुला दिया जाना।
ये घटनाएं संयोग नहीं हैं। ये उस विदेश नीति का नतीजा हैं, जो "हमारी सुरक्षा" के नाम पर दूसरों के बच्चों को मारने को जायज समझती है। ईरान पर बार-बार हमले, गलत सूचना, आर्थिक प्रतिबंध और फिर "मानवीय चिंता" का प्रदर्शन—यह हाइपोक्रिसी चरम पर है।
जब गाजा में, यमन में, अफगानिस्तान में, इराक में हजारों बच्चे मारे जाते हैं, तो पश्चिम चुप रहता है। लेकिन अगर कहीं उनका "मित्र" प्रभावित हो, तो पूरी दुनिया "मानवाधिकार" की दुहाई देती है।
मानवीय प्रभाव और दर्द
कल्पना कीजिए मीनाब की उन मांओं का दर्द, जिन्होंने सुबह स्कूल भेजा और शाम को कफन में लौटाया। 1988 की उन ईरानी परिवारों का आंसू, जिन्होंने कभी अपने बच्चों की लाशें भी ठीक से नहीं देख पाए। ये बच्चे आतंकवादी नहीं थे, सैनिक नहीं थे—वे सिर्फ जीना चाहते थे, पढ़ना चाहते थे, खेलना चाहते थे।
ये हमले न सिर्फ शारीरिक, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक नरसंहार हैं। शिक्षा के मंदिर को तोड़ना, भविष्य की पीढ़ी को मारना—यह जंग नहीं, नरसंहार है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और न्याय की मांग
जeneva कन्वेंशन, UN चार्टर और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट—सभी कहते हैं कि सिविलियन, खासकर बच्चे, युद्ध में संरक्षित हैं। स्कूल और अस्पताल पर हमला युद्ध अपराध है।
फिर क्यों कोई ट्रंप या नेतृत्वकर्ता जवाबदेह नहीं होता? क्यों ICC में अमेरिकी नेताओं के खिलाफ केस नहीं बनते? क्योंकि शक्ति है उनके पास। लेकिन इतिहास गवाह है—अत्याचार कभी नहीं छिपते।
ईरान के लोग, मुस्लिम दुनिया और दुनिया के शांतिप्रिय लोग आज एकजुट होकर न्याय मांग रहे हैं। FIR, वॉर क्राइम ट्रायल, मुआवजा और सबसे जरूरी—इन अपराधों को दोहराने से रोकना।
चुप्पी अपराध है
1988 का एयरबस और 2026 का मीनाब स्कूल हमें याद दिलाते हैं कि साम्राज्यवाद अभी जिंदा है। वह अब ड्रोन और मिसाइलों के रूप में आता है, लेकिन उसका स्वाद बच्चों के खून का ही है।
हम चुप नहीं रह सकते। हर आवाज, हर पोस्ट, हर लेख इस क्रूरता को उजागर करे। बच्चों के शहीद होने पर दुनिया को जगाना होगा। न्याय तब तक नहीं मिलेगा, जब तक हम मांग नहीं करेंगे।
"एक बच्चे की मौत एक दुर्घटना है, सैकड़ों बच्चों की मौत नीति है।"
यह नीति बदलनी होगी। मीनाब और ईरान एयर 655 के शहीदों को सलाम। उनके सपनों को हम आगे बढ़ाएंगे। शांति की लड़ाई जारी रहेगी—बच्चों के भविष्य के लिए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 29 May2026