प्रतिकात्मक तस्वीर
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में बेतवा नदी की लहरों के बीच एक निर्माणाधीन पुल का हिस्सा अचानक भरभराकर गिर गया। रात के सन्नाटे में तेज आंधी-तूफान और बारिश ने मजदूरों को मौत की गोद में सुला दिया। शुक्रवार तड़के करीब 2-3 बजे हुए इस हादसे में कम से कम 6 मजदूरों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हैं। मलबे में कुछ मजदूर फंसे होने की आशंका है। SDRF, NDRF और स्थानीय प्रशासन की टीमें बचाव अभियान चला रही हैं। तीन मजदूरों को पिलर से सुरक्षित निकाला गया है।
यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि मजदूरों की सुरक्षा, निर्माण गुणवत्ता और मौसम चेतावनी की अनदेखी का दर्दनाक उदाहरण बन गया है। बेतवा नदी पर मोराकांडर (या मवई जार/पारसानी) और कुरारा क्षेत्र को जोड़ने वाला यह 900 मीटर लंबा दो लेन का पुल उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम द्वारा बनाया जा रहा था। कुल लागत करीब 90 करोड़ रुपये है। निर्माण मार्च 2024 में शुरू हुआ था और दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य था।
हादसे की वो भयावह रात
शुक्रवार की रात हमीरपुर जिले में अचानक मौसम ने करवट ली। तेज हवाएं, बिजली चमकना और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। निर्माण स्थल पर काम कर रहे मजदूर थकान के मारे पुल की स्लैब के नीचे या आसपास आराम कर रहे थे। अचानक एक बड़ा कंक्रीट स्लैब और सपोर्ट स्ट्रक्चर ढह गया। भारी मलबा नीचे सोए या काम कर रहे मजदूरों पर गिरा।
आंखों देखी गवाही के अनुसार, हादसे के बाद साइट पर चीख-पुकार मच गई। अंधेरे में लोग एक-दूसरे को पुकार रहे थे। JCB और अन्य मशीनों की मदद से मलबा हटाने का काम शुरू किया गया। स्थानीय पुलिस, प्रशासन, SDRF और NDRF की टीमें मौके पर पहुंचीं। अब तक 6 शव निकाले जा चुके हैं, जबकि घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया है। कुछ मजदूर अभी भी मलबे में फंसे हो सकते हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने एक्स पर लिखा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हृदय विदारक है। सीएम ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपये मुआवजा और घायलों को 50-50 हजार रुपये की सहायता देने के निर्देश दिए। उन्होंने बचाव कार्य तेज करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के भी आदेश दिए हैं।
निर्माण कार्य: प्रगति या लापरवाही?
यह पुल हमीरपुर के ग्रामीण इलाकों को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण था। बेतवा नदी क्षेत्र में यातायात सुविधा बढ़ाने, कृषि उत्पादों के परिवहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का लक्ष्य था। लेकिन हादसे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:
- मौसम चेतावनी की अनदेखी: मौसम विभाग ने आंधी-तूफान की चेतावनी दी थी। फिर मजदूरों को साइट पर ही रुकने या काम जारी रखने की अनुमति क्यों दी गई?
- सुरक्षा मानकों का पालन: क्या हेलमेट, सेफ्टी हार्नेस, क्रेन की मजबूती और स्लैब सपोर्ट की जांच की गई थी? रात में काम या आराम के दौरान पर्याप्त लाइटिंग और सतर्कता थी?
- ठेकेदार की जिम्मेदारी: निर्माण एजेंसी और ठेकेदार पर लापरवाही का आरोप लग रहा है। कई बार ऐसे प्रोजेक्ट्स में गुणवत्ता से समझौता किया जाता है ताकि समय पर काम पूरा हो।
उत्तर प्रदेश में पिछले वर्षों में भी कई पुल हादसे हो चुके हैं। विकास की रफ्तार तेज है, लेकिन मजदूरों की जान की कीमत क्या है? यह सवाल बार-बार उठता है।
प्रभावित परिवारों की कहानी
मरने वाले मजदूर ज्यादातर बिहार, झारखंड या पूर्वी उत्तर प्रदेश के गरीब परिवारों से थे। वे रोजगार की तलाश में यहां आए थे। परिवारों में अब कोहराम मचा हुआ है। एक मजदूर की पत्नी ने बताया, “रोज रात को फोन पर बात होती थी। कल भी कहा था कि काम ज्यादा है, जल्दी घर आऊंगा। अब क्या जवाब दूं बच्चों को?”
घायल मजदूरों में से कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है। अस्पतालों में चीखें गूंज रही हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि निर्माण साइट पर मजदूरों की रहने की व्यवस्था भी जर्जर थी।
विशेषज्ञों की राय और सबक
सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का कहना है कि तेज हवाओं (हाई वेलोसिटी विंड) में अनक्यूर्ड या आंशिक रूप से तैयार स्लैब कमजोर हो सकते हैं। प्रॉपर शोरिंग, फॉर्मवर्क और वेदर प्रोटेक्शन जरूरी है।
भारत में निर्माण क्षेत्र में हर साल हजारों मजदूर दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। लेबर कोड, सेफ्टी रेगुलेशंस के बावजूद अमल कमजोर रहता है। इस हादसे के बाद राज्य सरकार को पूरे प्रोजेक्ट की जांच करानी चाहिए। स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट, ठेकेदार पर जुर्माना और ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाई होनी चाहिए।
हमीरपुर और बेतवा का महत्व
हमीरपुर जिला बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है। बेतवा नदी यहां की जीवन रेखा है। सूखा, बाढ़ और कृषि चुनौतियों से जूझता यह क्षेत्र बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग करता है। पुल बनने से कुरारा, मोराकांडर जैसे गांवों की दूरी कम होती, लेकिन इस हादसे ने विकास की राह में बाधा डाल दी है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। निर्माण रुकने से मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। पर्यटन या कृषि से जुड़े फायदे भी टल गए हैं।
आगे क्या?
- बचाव कार्य जारी, मलबा पूरी तरह हटाने के बाद शवों की पहचान।
- पोस्टमार्टम और FIR दर्ज।
- तकनीकी जांच रिपोर्ट का इंतजार।
- मुआवजा वितरण और परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ना।
- पूरे राज्य में निर्माण साइट्स पर सेफ्टी ऑडिट।
यह हादसा हमें याद दिलाता है कि विकास इंसानों की बलि पर नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करके होना चाहिए। बेतवा नदी अब सिर्फ पानी की धारा नहीं, बल्कि उन मजदूरों की चीखों का गवाह बन गई है जिन्होंने सपनों का पुल बनाने में अपनी जान गंवा दी।
प्रशासन, सरकार और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी त्रासदियां दोबारा न हों। मजदूरों की जान अमूल्य है। विकास की नींव मजबूत हो, लेकिन उसमें इंसानियत की नींव और मजबूत हो।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 29 May 2026