Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 18 May 2026

"छोड़ दो या मर जाओ": टेक्सास की किशोरी इज़राइली बस्तीवासी के मुंह से निकली खुली धमकी, यरुशलम में खौफ का मंजर

"छोड़ दो या मर जाओ": टेक्सास की किशोरी इज़राइली बस्तीवासी के मुंह से निकली खुली धमकी, यरुशलम में खौफ का मंजर -Friday World-18 May 2026

"यहाँ से चले जाओ, वरना हम तुम्हें क़त्ल कर देंगे।"— ये शब्द किसी फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि 2026 के यरुशलम दिवस मार्च के दौरान मकबूजा पुराने शहर (Old City) की गलियों में गूंजे। बोलने वाली थी अतरा — एक टेक्सास-जन्मी अमेरिकी किशोरी, जो महज पांच साल पहले अपने माता-पिता के साथ इज़राइल आकर बस्ती बसाने वाली सेटलर बन गई। ABC न्यूज़ के कैमरे ने इस घटना को कैद कर लिया, और दुनिया देख रही है कि कैसे कब्जे की संस्कृति युवा पीढ़ी को भी नफरत और हिंसा की आग में झोंक रही है।

घटना का पूरा विवरण: जब नफरत सड़कों पर उतर आई

इस सप्ताह इज़राइल ने वार्षिक यरुशलम दिवस मनाया, जो 1967 के छह दिनों के युद्ध में पूर्वी यरुशलम पर कब्जे की याद में मनाया जाता है। इस मौके पर हजारों इज़राइली राष्ट्रवादी, युवा और बस्तीवासी पुराने शहर की संकरी गलियों में मार्च निकालते हैं। झंडे लहराते, नारे लगाते और अक्सर फिलिस्तीनियों को खुलेआम धमकियां देते। इसी मार्च के दौरान अतरा का इंटरव्यू ABC न्यूज़ के पत्रकार जेम्स लॉन्गमैन ने लिया।

अतरा, जो थर्ड टेंपल (तीसरे मंदिर) का बैनर थामे खड़ी थी, बिना किसी हिचकिचाहट के बोली — "Leave or we'll kill you" (चले जाओ वरना हम तुम्हें मार डालेंगे)। उसने इस्लाम को "कैंसर" बताया और कहा कि इसे या तो पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए या इसके अनुयायियों को जबरन पुनः शिक्षित (re-educated) किया जाए। उसकी बातों में मीर कहाने जैसे चरमपंथी विचारों की झलक साफ दिखाई दी।

यह कोई अकेली घटना नहीं थी। मार्च के दौरान "मौत अरबों को" जैसे नारे लगाए गए, फिलिस्तीनी इलाकों में घुसपैठ की गई और भारी पुलिस सुरक्षा के बावजूद तनाव चरम पर रहा। ABC न्यूज़ की रिपोर्ट में साफ दिखा कि कई युवा बस्तीवासी वेस्ट बैंक से आए थे और वे तेजी से प्रभावशाली हो रहे हैं।

 अतरा कौन है? अमेरिका से कब्जे की राह पर

अतरा टेक्सास से आई है। पांच साल पहले परिवार के साथ इज़राइल शिफ्ट हुई। अब वह खुद को "इज़राइली" मानती है और पूर्वी यरुशलम के माहौल में घुलमिल गई है। उसका बयान न केवल व्यक्तिगत नफरत दर्शाता है, बल्कि एक बड़े आंदोलन — थर्ड टेंपल मूवमेंट — का हिस्सा है। यह आंदोलन अल-अक्सा मस्जिद को गिराकर उसके स्थान पर यहूदी मंदिर बनाने का सपना देखता है, जो मुस्लिम दुनिया के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है।

सोशल मीडिया पर इस वीडियो के वायरल होने के बाद दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोग इसे इज़राइली समाज में बढ़ती चरमपंथी सोच का प्रमाण मान रहे हैं, जबकि कुछ इसका बचाव करते हुए कह रहे हैं कि "वह पूरे इज़राइल की नहीं बोल रही"। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसे बयान कब्जे की नीतियों को मजबूत करते हैं।

 ऐतिहासिक संदर्भ: 1967 से आज तक कब्जा और प्रतिरोध

1967 का युद्ध इज़राइल के लिए निर्णायक था। उसने पूर्वी यरुशलम, वेस्ट बैंक, गाजा, गोलान हाइट्स और सिनाई (जो बाद में वापस हुई) पर कब्जा कर लिया। इज़राइल यरुशलम को अपनी "अविनाशी राजधानी" मानता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय (संयुक्त राष्ट्र सहित) पूर्वी यरुशलम को कब्जे वाला क्षेत्र मानता है।

पुराना शहर — UNESCO विश्व धरोहर स्थल — तीनों अब्राहमिक धर्मों (यहूदी, ईसाई, मुस्लिम) के लिए पवित्र है। यहां यहूदी दीवार (Western Wall), चर्च ऑफ होली सेपलकर और अल-अक्सा मस्जिद-डोम ऑफ द रॉक मौजूद हैं। लेकिन कब्जे के बाद से फिलिस्तीनियों की जिंदगी मुश्किल हुई है — घर तोड़े जा रहे हैं, बस्तियां बढ़ रही हैं, आवाजाही प्रतिबंधित है।

यरुशलम दिवस मार्च को फिलिस्तीनी "प्रोवोकेशन" मानते हैं क्योंकि यह उनके इलाकों से गुजरता है और अक्सर हिंसा भड़काता है। पिछले सालों में कई बार मार्च के दौरान झड़पें हुई हैं, पत्थर फेंके गए और गिरफ्तारियां हुईं।

 बस्तीवाद की संस्कृति: युवाओं पर असर

अतरा जैसी युवा सेटलर्स की बढ़ती संख्या चिंताजनक है। इज़राइल सरकार बस्तियों को बढ़ावा देती है — सब्सिडी, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण देकर। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में बस्तियां अवैध हैं, फिर भी लाखों इज़राइली वहां बस चुके हैं।

ये बस्तीवासी अक्सर धार्मिक राष्ट्रवाद से प्रेरित होते हैं। वे मानते हैं कि पूरा "एरेट्ज इज़राइल" (बाइबिल का वादा किया भूमि) उनका है। थर्ड टेंपल मूवमेंट इसी सोच का हिस्सा है। अगर अल-अक्सा पर छेड़छाड़ हुई तो पूरे मध्य पूर्व में आग लग सकती है — जैसा 2021 में हुआ था।

फिलिस्तीनी युवा इस कब्जे के नीचे बड़े हो रहे हैं। उनके लिए रोजमर्रा की जिंदगी चेकपॉइंट्स, सैनिकों, घरेलू तोड़-फोड़ और आर्थिक दबाव से भरी है। UN रिपोर्ट्स के अनुसार, कब्जे के कारण फिलिस्तीनी अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और मीडिया की भूमिका

ABC न्यूज़ जैसे मुख्यधारा के मीडिया का यह कवरेज महत्वपूर्ण है। पहले अक्सर इज़राइली पक्ष को ज्यादा जगह मिलती थी, लेकिन अब सोशल मीडिया और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के कारण फिलिस्तीनी आवाज भी पहुंच रही है।

भारत में भी यह मुद्दा चर्चा में है। भारत-इज़राइल संबंध मजबूत हैं (रक्षा, तकनीक, खुफिया), लेकिन लाखों भारतीय मुसलमान और आम नागरिक फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति संवेदनशील हैं। भारत ने दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इज़राइल के साथ सहयोग बढ़ा रहा है।

 क्या है आगे का रास्ता? शांति की उम्मीद या और खूनखराबा?

यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि कब्जा स्थायी समाधान नहीं हो सकता। जब एक तरफ युवा "चले जाओ या मर जाओ" कह रही है, तो दूसरी तरफ फिलिस्तीनी बच्चे पत्थर फेंककर अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।

शांति के लिए जरूरी है:
- कब्जे का अंत
- बस्तियों का विघटन
- पूर्वी यरुशलम को फिलिस्तीनी राजधानी के रूप में मान्यता
- अल-अक्सा की स्थिति quo का सम्मान
- अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन

लेकिन वर्तमान इज़राइली राजनीति (नेटanyahu और चरमपंथी गठबंधन) में यह दूर की कौड़ी लगती है। अमेरिकी समर्थन, लॉबी और आंतरिक धार्मिक राष्ट्रवाद इसे और जटिल बना रहे हैं।

नफरत का चक्र तोड़ने की जरूरत

अतरा का बयान सिर्फ एक किशोरी का नहीं, बल्कि एक सिस्टम का प्रतिबिंब है — जहां कब्जा, उपनिवेशवाद और धार्मिक अतिवाद को "राष्ट्रीय गौरव" का नाम दिया जाता है। फिलिस्तीनियों के लिए यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है — धमकियां, eviction, demolition और अपमान।

दुनिया को अब चुप रहने का अधिकार नहीं। मीडिया, नागरिक समाज और सरकारों को निष्पक्षता से इस मुद्दे को उठाना चाहिए। क्योंकि जब तक कब्जा रहेगा, तब तक "चले जाओ या मर जाओ" जैसे शब्द गूंजते रहेंगे — और शांति का सपना अधूरा रहेगा।

फिलिस्तीन की आजादी तक संघर्ष जारी रहेगा।
#FreePalestine #JerusalemDay #Occupation

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-18 May 2026