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Sunday, 17 May 2026

ओंकारेश्वर मे आदिवासी परिवार पर आतंक: बुलडोजर ने उजाड़ दिया आदिवासी का 80 साल पुराना आशियाना, न्याय की आवाज दब गई?

ओंकारेश्वर मे आदिवासी परिवार पर आतंक: बुलडोजर ने उजाड़ दिया आदिवासी का 80 साल पुराना आशियाना, न्याय की आवाज दब गई?
-Friday World-17 May 2026
मध्य प्रदेश के पावन तीर्थ ओंकारेश्वर में विकास के नाम पर आदिवासी अधिकारों की कुचलती कहानी

खंडवा जिले के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल ओंकारेश्वर में 15-16 मई 2026 की सुबह एक ऐसी घटना घटी जो पूरे देश की चेतना को झकझोर देती है। लगभग 80 वर्षों से एक आदिवासी परिवार की जमीन पर कब्जा था, जहां उन्होंने अपनी मेहनत से आशियाना बनाया। लेकिन मोहन यादव सरकार के प्रशासन ने धरना-प्रदर्शन के बावजूद बुलडोजर चला दिया। पीड़ित राहुल पठान (पिता पठान) को कल शाम नोटिस मिला और आज सुबह 6 बजे उनके घर पर बुलडोजर दौड़ पड़ा। यह सिर्फ एक मकान तोड़ने की घटना नहीं, बल्कि गरीब आदिवासी परिवार की बेबसी, प्रशासनिक उदासीनता और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों पर हो रहे हमले का प्रतीक है।

घटना का क्रम: धरना के बावजूद बेदखली

पिछले 10 दिनों से ओंकारेश्वर के बाघनगर (Bagh Nagar) में आदिवासी परिवार लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहा था। वे अपनी जमीन पर कब्जे और अधिकार की रक्षा की मांग कर रहे थे। परिवार का दावा है कि वे दशकों से—करीब 80 वर्षों से—इस जमीन पर रह रहे हैं। उन्होंने यहां खेतीबाड़ी की, मकान बनाया और जीवन यापन किया।

फिर भी प्रशासन ने बिना पूरी सुनवाई के बेदखली का आदेश जारी कर दिया। राहुल पठान को 14 मई की शाम नोटिस थमा दिया गया। परिवार ने एसडीएम कार्यालय में अपील की थी, सुनवाई अभी लंबित थी। इसके बावजूद 15 मई सुबह प्रशासनिक टीम बुलडोजर लेकर पहुंच गई और परिवार के आशियाने को ध्वस्त कर दिया।

यह कार्रवाई इतनी अचानक और अमानवीय थी कि परिवार सदमे में है। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग रोते-बिलखते रह गए। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बुलडोजर के नीचे ढहते मकान और परिवार की चीखें देखकर किसी का भी दिल पसीज सकता है।

आदिवासी जीवन की सच्चाई

आदिवासी समुदाय भारत की मूल सभ्यता का आधार हैं। वे जंगलों के रक्षक, प्रकृति के पुजारी और पर्यावरण संतुलन के सबसे बड़े संरक्षक रहे हैं। मध्य प्रदेश में भिल, बरेला, गोंड जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं। लेकिन विकास के नाम पर बार-बार इन्हीं समुदायों को निशाना बनाया जाता है।

ओंकारेश्वर का यह परिवार भी उसी श्रेणी में आता है। राहुल पठान जैसे युवा आदिवासी आजीविका की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं। उनकी जमीन न सिर्फ घर थी, बल्कि पहचान, सुरक्षा और भविष्य थी। बिना वैकल्पिक व्यवस्था, बिना उचित मुआवजा और बिना न्यायिक प्रक्रिया पूरी किए घर उजाड़ना FRA (Forest Rights Act) 2006, PESA Act और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन लगता है।

FRA कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को उनके पारंपरिक अधिकारों की मान्यता दी जाए। लंबे कब्जे वाले मामलों में बेदखली से पहले ग्राम सभा की सहमति और सुनवाई जरूरी है। क्या यहां ये प्रक्रिया पूरी हुई? सवाल उठ रहे हैं।

 विकास बनाम विस्थापन: ओंकारेश्वर का संदर्भ

ओंकारेश्वर नर्मदा नदी के किनारे स्थित शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर्यटन, धार्मिक विकास और संभवतः अन्य परियोजनाओं के नाम पर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन सवाल यह है—क्या विकास का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट और तीर्थ सुविधाएं हैं, या इसमें स्थानीय लोगों—खासकर आदिवासियों—का हित भी शामिल है?

मध्य प्रदेश में पिछले वर्षों में कई जगहों पर आदिवासी बस्तियों पर बुलडोजर चले हैं—चाहे केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट हो या अन्य विकास कार्य। आलोचक कहते हैं कि “बुलडोजर राज” गरीबों, किसानों और आदिवासियों पर अत्याचार का प्रतीक बन गया है। जबकि सरकार दावा करती है कि यह अवैध कब्जों को हटाने की कार्रवाई है।

लेकिन जब कब्जा दशकों पुराना हो, कर वसूली हुई हो, या पट्टा/अधिकार संबंधी दावे लंबित हों, तो क्या रातोंरात नोटिस देकर बुलडोजर चलाना न्यायसंगत है? विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, ऐसे मामलों में पहले पुनर्वास, मुआवजा और कानूनी सुनवाई जरूरी है।

सामाजिक और मानवीय आयाम

कल्पना कीजिए—एक परिवार जो सुबह उठकर अपनी रोजी-रोटी की चिंता में लगा रहता है, अचानक उनका छप्पर ढह जाता है। बच्चे स्कूल जाने की जगह खुले आसमान तले रह जाते हैं। बुजुर्गों की दवाइयां मलबे में दब जाती हैं। महिलाओं की इज्जत और सुरक्षा पर सवाल खड़े हो जाते हैं।

यह घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं है। यह पूरे आदिवासी समाज के भय और आक्रोश को दर्शाती है। सोशल मीडिया पर #OmkareshwarLandDispute, #SaveAdivasi, #JalJungleZameen जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। सामाजिक संगठन, आदिवासी नेता और न्यायप्रिय नागरिक आवाज उठा रहे हैं।

कानूनी और संवैधानिक पहलू

भारतीय संविधान की अनुसूची 5 और 6 आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा करती है। PESA Act 1996 ग्राम सभाओं को शक्तियां देता है। Supreme Court के कई फैसले (जैसे Samatha Judgment आदि) आदिवासी भूमि की सुरक्षा पर जोर देते हैं।

यदि परिवार के पास दस्तावेजी सबूत, कर रसीदें या गवाह हैं, तो वे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। लेकिन तात्कालिक राहत के लिए प्रशासन को तुरंत पुनर्वास प्रदान करना चाहिए—अस्थायी आवास, भोजन, चिकित्सा और बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित करनी चाहिए।

 अपील और आगे का रास्ता

इस घटना पर सभी न्यायप्रिय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं, मीडिया और राजनीतिक दलों से अपील है:

- पीड़ित परिवार राहुल पठान और उनके परिजनों के साथ खड़े हों।

- कानूनी सहायता प्रदान करें—वकील, दस्तावेजी सबूत जुटाने में मदद।

- स्थानीय प्रशासन और सरकार पर दबाव बनाएं कि उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए।

- बिना पूरी प्रक्रिया के ऐसी बेदखली पर रोक लगाई जाए।

- आदिवासी अधिकारों के लिए व्यापक आंदोलन और जागरूकता अभियान चलाएं।

मध्य प्रदेश सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। मुख्यमंत्री मोहन यादव से अपेक्षा है कि वे व्यक्तिगत रूप से मामले की समीक्षा करें और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाएं। विकास तभी सही मायने में विकास है जब अंतिम व्यक्ति को उसका हक मिले।

: इंसानियत की परीक्षा

ओंकारेश्वर की यह सुबह सिर्फ एक बुलडोजर की आवाज नहीं थी—यह मानवता की चीख थी। जब एक गरीब आदिवासी परिवार का घर उजड़ जाता है, तो पूरे समाज की नींव हिल जाती है। हमारा विकास मॉडल कितना समावेशी है? क्या हम आदिवासियों को उनकी जमीन से अलग करके प्रकृति और संस्कृति दोनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं?

समय आ गया है कि हम जल, जंगल, जमीन के अधिकारों को मजबूती से स्थापित करें। पीड़ित परिवार को न्याय मिले, उनका घर वापस बने या उचित मुआवजा मिले। और सबसे जरूरी—ऐसी घटनाएं भविष्य में न दोहराई जाएं।

आदिवासी नहीं हैं बोझ, वे हमारी विरासत हैं। उनकी रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है।

जय जोहार! जय आदिवासी! जल-जंगल-जमीन अमर रहे!

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-17 May 2026