-Friday World-12May 2026
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। लगभग 85-90% अपनी तेल जरूरतें आयात पर निर्भर। जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता आती है, तो ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। हाल के वर्षों में, खासकर 2026 में मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) संकट के कारण भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा — और कई मामलों में पहले की तुलना में महंगे भाव पर। यह कोई साधारण खरीदारी नहीं, बल्कि रणनीतिक मजबूरी का परिणाम है।
पृष्ठभूमि: रूस से सस्ता तेल से महंगे सौदे तक
2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए। इससे रूस ने भारत और चीन जैसे देशों को भारी डिस्काउंट पर तेल ऑफर किया — कभी-कभी ब्रेंट क्रूड से $10-30 प्रति बैरल सस्ता। भारत ने इसका फायदा उठाया। रूस भारत का टॉप सप्लायर बन गया, 35-40% शेयर तक पहुंच गया। इससे भारत ने अरबों डॉलर बचाए और घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतें स्थिर रखीं।
लेकिन 2025-26 में स्थिति बदली। अमेरिकी प्रतिबंध, टैरिफ दबाव और संकुचित डिस्काउंट (केवल $1-5 प्रति बैरल) के बावजूद भारत खरीदता रहा। फिर मार्च 2026 के आसपास अमेरिका-इजराइल और ईरान संघर्ष ने होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावित किया। मध्य पूर्व से सप्लाई बाधित हुई। सऊदी, इराक, UAE से आने वाले टैंकर अटक गए या महंगे हो गए। नतीजा — भारत को रूस से इमरजेंसी खरीदारी करनी पड़ी। कुछ मामलों में रूसी क्रूड बाजार मूल्य या उससे थोड़ा प्रीमियम पर मिला।
क्यों मजबूर हुआ भारत? मुख्य कारण
1. ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति की निरंतरता
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। तेल की मांग रोजाना बढ़ती जा रही है। होर्मुज स्ट्रेट (जिससे दुनिया का 20% तेल गुजरता है) में तनाव के कारण गल्फ सप्लाई अनिश्चित हो गई। रूस ने तत्काल उपलब्ध कार्गो ऑफर किए। अमेरिका ने भी 30 दिन की वेवर (छूट) दी ताकि ग्लोबल ऑयल प्राइस न बढ़े और भारत को शॉर्टेज न हो। बिना रूसी तेल के भारत में 1 हफ्ते की सप्लाई गैप हो सकता था, जो रिफाइनरी, ट्रांसपोर्ट और अर्थव्यवस्था को ठप कर देता।
2. विकल्पों का महंगा होना
अन्य स्रोत (US, सऊदी, इराक) से तेल या तो महंगा था या उपलब्ध नहीं। दिसंबर 2025 में रूसी क्रूड कुछ सस्ता था, लेकिन मार्च 2026 में डिमांड बढ़ने से प्राइस टाइट हो गया। कुछ रिपोर्ट्स में रूसी Urals क्रूड ब्रेंट से प्रीमियम पर बिका। फिर भी, लॉजिस्टिक्स, पेमेंट चैनल और पहले से बने रिलेशनशिप के कारण रूस बेहतर विकल्प था।
3. रिफाइनरी की जरूरत और प्रॉफिट मार्जिन
भारतीय रिफाइनरी (Reliance, IOCL, BPCL आदि) हाई कॉम्प्लेक्सिटी वाली हैं। वे विभिन्न ग्रेड का क्रूड प्रोसेस कर पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल बनाती हैं और निर्यात भी करती हैं। रूसी क्रूड उनके लिए सूटेबल है। डिस्काउंट कम होने पर भी प्रोडक्ट क्रैक्स (रिफाइनिंग मार्जिन) अच्छा रहता है। सप्लाई डिसरप्शन में महंगा तेल खरीदना भी बेहतर है बजाय रिफाइनरी बंद रखने के।
4. भू-राजनीतिक और आर्थिक दबाव
ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ और सैंक्शन का दबाव बनाया, लेकिन भारत ने हमेशा कहा — "हम अपने राष्ट्रीय हित में फैसला लेंगे।" सस्ते तेल से बचत inflation कंट्रोल करती है, रुपये का दबाव कम करती है और गरीबों को सब्सिडी देने में मदद करती है। 2026 के संकट में US waiver भी मिला क्योंकि ग्लोबल स्टेबिलिटी जरूरी थी।
5. वैश्विक बाजार की अस्थिरता
2025-26 में ऑयल प्राइस $70 से $120+ प्रति बैरल तक पहुंच गए। ईरान संकट, OPEC डिसीजन और डिमांड-सप्लाई गैप ने सबको प्रभावित किया। भारत जैसे आयातक देशों के पास कोई चारा नहीं — या तो महंगा तेल खरीदो या अर्थव्यवस्था को झटका दो।
आर्थिक प्रभाव: बचत से बढ़त तक
पहले वर्षों में रूसी तेल से भारत ने $5-10 बिलियन सालाना बचाए। लेकिन जब डिस्काउंट कम हुए और कीमतें बढ़ीं, तो इम्पोर्ट बिल बढ़ा। फिर भी, कुल मिलाकर रूस अन्य विकल्पों से सस्ता या उपलब्ध रहा। अगर पूरी तरह गल्फ पर निर्भर रहते तो महंगा पड़ता।
रिफाइनरी कंपनियां घाटा झेल रही हैं क्योंकि घरेलू कीमतें नहीं बढ़ा रहीं, लेकिन लंबे समय में यह ऊर्जा सुरक्षा की कीमत है।
रणनीतिक सबक और भविष्य की राह
यह घटना दिखाती है कि भारत को तेल पर निर्भरता कम करनी होगी:
- घरेलू उत्पादन बढ़ाना (ONGC, रिलायंस आदि)।
- रिन्यूएबल एनर्जी (सोलर, विंड, इलेक्ट्रिक व्हीकल) को तेजी से बढ़ावा।
- स्टॉकपाइलिंग बढ़ाना।
- डाइवर्सिफिकेशन — US, वेनेजुएला, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा खरीदारी।
- डिप्लोमेसी: रूस, US, मध्य पूर्व सबके साथ बैलेंस बनाए रखना।
भारत ने हमेशा प्रैग्मेटिक पॉलिसी अपनाई है। Jaishankar जैसे नेता कहते हैं — "हम global policeman नहीं हैं, हम अपने लोगों के हित देखते हैं।"
निष्कर्ष: मजबूरी नहीं, समझदारी
रूस से महंगे भाव पर तेल खरीदना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि वैश्विक संकट में त्वरित और व्यावहारिक फैसला था। होर्मुज संकट जैसी स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा सबसे ऊपर होती है। भारत ने दिखाया कि वह बड़े खिलाड़ियों के दबाव में नहीं झुकता, बल्कि अपने 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देता है।
भविष्य में आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति ही स्थायी समाधान है। तब तक, स्मार्ट डिप्लोमेसी और डाइवर्सिफाइड सोर्सिंग भारत को मजबूत बनाए रखेगी। यह घटना भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलता और रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-12May 2026