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Monday, 11 May 2026

ट्रम्प का यू-टर्न: हॉर्मुज खोलने की जिद, रेजीम चेंज से नेगोशिएशन तक — अमेरिका के लिए आने वाली बड़ी ज़िल्लत

ट्रम्प का यू-टर्न: हॉर्मुज खोलने की जिद, रेजीम चेंज से नेगोशिएशन तक — अमेरिका के लिए आने वाली बड़ी ज़िल्लत-Friday World-11 May 2026
वाशिंगटन में एक बार फिर नीति का पलटा खाया जा रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के मामले में अपनी आक्रामक अप्रोच को पूरी तरह बदल दिया है। अब उनका फोकस “जंग जल्द से जल्द खत्म करने” पर है — इसके लिए हॉर्मुज की खाड़ी को हर हाल में खुला रखना जरूरी है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल प्रोग्राम? वो “मुश्किल नेगोशिएशन” है, जो बाद में देखा जाएगा। 

जो लोग कल तक “रेजीम चेंज” (शासन परिवर्तन) की बात कर रहे थे, आज वही रोज़ नया सुर अलाप रहे हैं। यह उलटफेर सिर्फ नीति नहीं, बल्कि अमेरिकी साम्राज्य की बढ़ती असमंजस और कमजोरी का आईना है।

 सामरिक पलटाव: हॉर्मुज अब सबसे बड़ा प्राथमिकता

हॉर्मुज की खाड़ी दुनिया के तेल व्यापार का गला है। रोजाना लगभग 21 मिलियन बैरल तेल इस संकरे रास्ते से गुजरता है — यानी वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20-21%। अगर ईरान ने इसे बंद कर दिया (जैसा कि उसने पहले चेतावनी दी है), तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी। ट्रम्प प्रशासन अब इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ चुका है।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट साफ बताती है कि व्हाइट हाउस अब “हर हाल में” हॉर्मुज खुला रखने पर जोर दे रहा है। इसका मतलब है — सैन्य टकराव को सीमित रखना, पूर्ण युद्ध से बचना और तेल मार्ग को सुरक्षित करना। ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को “मुश्किल मुद्दा” बताकर बाद के लिए टाल दिया गया है। यानी पहले युद्ध रोकना, बाद में शर्तें मनवाना।

लेकिन इतिहास गवाह है — ईरान के साथ “बाद में” वाली रणनीति अक्सर अमेरिका के लिए बोझ बन जाती है। 2015 का JCPOA (परमाणु समझौता) तोड़ने के बाद ट्रम्प खुद “मैक्सिमम प्रेशर” कैंपेन चला चुके हैं। नतीजा? ईरान का परमाणु कार्यक्रम पहले से ज्यादा मजबूत, मिसाइलें ज्यादा सटीक और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ा हुआ।

 “रेजीम चेंज” से “डील” तक — रोज़ नया सुर

कुछ महीने पहले तक अमेरिकी अधिकारी और उनके सहयोगी खुलेआम ईरानी नेतृत्व को उखाड़ फेंकने की बात कर रहे थे। “मैक्सिमम प्रेशर”, इजरायल के साथ तालमेल, साइबर हमले, प्रतिबंध — हर हथियार आजमाया गया। अब अचानक सुर बदला जा रहा है। 

यह बदलाव संयोग नहीं है। 

- इजरायल-ईरान सीधी टकराव में ईरान ने दिखाया कि उसके ड्रोन और मिसाइलें इजरायली डिफेंस को भेद सकती हैं।
- लेबनान, यमन, इराक और सीरिया में ईरान समर्थित ताकतें अभी भी सक्रिय हैं।
- वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के आसार और अमेरिकी घरेलू राजनीति में ट्रम्प को तेल की कीमतें कम रखनी हैं।

ट्रम्प, जो खुद को “डीलमेकर” कहते हैं, अब समझ रहे हैं कि ईरान 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे मजबूत और लचीला विरोधी है। रेजीम चेंज की बात करना आसान है, लेकिन उसे अमल में लाना लगभग असंभव।

 ईरान की मजबूती: मिसाइलें, परमाणु और रणनीतिक धैर्य

ईरान के पास दुनिया के सबसे बड़े बैलिस्टिक मिसाइल फ्लीट में से एक है। फतेह, सज्जील, खोर्रमशहर जैसी मिसाइलें सैकड़ों किलोमीटर दूर सटीक हमला कर सकती हैं। हाल के संघर्षों में ईरान ने दिखाया कि वह जवाबी कार्रवाई में देरी नहीं करता, बल्कि सोच-समझकर और प्रभावी ढंग से करता है।

परमाणु कार्यक्रम पर IAEA रिपोर्ट्स बार-बार संकेत दे रही हैं कि ईरान ब्रेकआउट टाइम (परमाणु हथियार बनाने का समय) को काफी कम कर चुका है। अमेरिका अब इसे “मुश्किल नेगोशिएशन” कहकर टाल रहा है, क्योंकि पूर्ण युद्ध का खर्च और नुकसान दोनों तरफ भारी होगा।

ईरानी नेतृत्व — चाहे राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियन हों या सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई — बार-बार दोहरा चुके हैं कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। उनका संदेश साफ है: “हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अगर थोपा गया तो पूरी ताकत से जवाब देंगे।”

 अमेरिका के लिए आने वाली ज़िल्लत

यह पॉलिसी फ्लिप-फ्लॉप अमेरिकी विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान है। 

कल तक “ईरान को घुटनों पर लाना” था, आज “हॉर्मुज खुला रखो, बाकी बाद में देखेंगे”। यह ठीक वैसा ही है जैसा अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में हुआ — लंबे युद्ध, भारी खर्च, हजारों सैनिकों की मौत और अंत में शर्मनाक निकासी।

अब पूरी दुनिया देख रही है। 

चीन और रूस जैसे देश इस स्थिति का फायदा उठा रहे हैं। ब्रिक्स में ईरान की एंट्री, शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में मजबूत भूमिका और चीन के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध ईरान को वैकल्पिक सहारा दे रहे हैं। अमेरिकी प्रतिबंध अब पहले जितने असरदार नहीं रहे।

ट्रम्प प्रशासन अगर सोच रहा है कि ईरान “डील” कर लेगा, तो वह फिर गलती कर रहा है। ईरानी रणनीति “धैर्य + प्रतिरोध” पर टिकी है। वे दबाव सहते हैं, समय लेते हैं और मौके का इंतजार करते हैं।

 निष्कर्ष: साम्राज्य का पतन या नई वास्तविकता?

ट्रम्प का यह यू-टर्न कोई ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मजबूरी का स्वीकारोक्ति है। हॉर्मुज खोलने की जिद, परमाणु-मिसाइल मुद्दे को टालना और रोज़ नया सुर — ये सब अमेरिकी सामरिक थकान को दर्शाते हैं। 

ईरान 45 साल से अमेरिकी दबाव झेल रहा है और हर बार मजबूत होकर निकला है। अब अगर अमेरिका सचमुच शांति चाहता है, तो उसे ईरान की क्षेत्रीय भूमिका, सुरक्षा चिंताओं और संप्रभु अधिकारों का सम्मान करना होगा। 

वरना, इतिहास फिर दोहराएगा — और इस बार ज़िल्लत और भी बड़ी हो सकती है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-11 May 2026