- Friday World-25 May 2026
दोहा (कतर), २५ मई २०२६ – मध्य पूर्व के उथल-पुथल भरे क्षेत्र में एक नई कूटनीतिक पहल शुरू हो गई है। ईरान के संसद अध्यक्ष और वरिष्ठ वार्ताकार मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ़ के नेतृत्व में एक शक्तिशाली उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल आज कतर की राजधानी दोहा पहुंचा। इसका मुख्य उद्देश्य अमेरिका के साथ चल रहे संघर्ष को समाप्त करने और एक व्यापक समझौते की दिशा में प्रगति करना है। इस प्रतिनिधिमंडल में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची और केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दुल नासिर हिम्मती भी शामिल हैं।
यह यात्रा उस संवेदनशील दौर में हुई है जब फरवरी २०२६ से शुरू हुए ईरान-अमेरिका (और संबंधित इजरायल) संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था। दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ताओं की श्रृंखला पहले ओमान, पाकिस्तान और अन्य माध्यमों से चल रही थी, लेकिन दोहा अब नई मध्यस्थता का केंद्र बनकर उभरा है।
युद्ध से शांति की ओर यात्रा
फरवरी २०२६ के अंत में शुरू हुए संघर्ष ने हॉर्मुज की खाड़ी, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा को केंद्र में रखा। अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाए रखा, जबकि ईरान ने अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों की रक्षा पर जोर दिया। अब, महीनों की तनावपूर्ण स्थितियों के बाद, कतर जैसे तटस्थ और प्रभावशाली मध्यस्थ देश के माध्यम से दोनों पक्ष संवाद की मेज पर लौटे हैं।
मोहम्मद बाकिर क़ालिबाफ़ को हाल ही में ईरान का मुख्य वार्ताकार नियुक्त किया गया है। वे एक अनुभवी राजनीतिज्ञ, पूर्व रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर और वर्तमान संसद अध्यक्ष हैं। उनकी नेतृत्व क्षमता और व्यावहारिक दृष्टिकोण को इस वार्ता में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची कूटनीतिक अनुभव के साथ इस टीम को मजबूती प्रदान कर रहे हैं, जबकि अब्दुल नासिर हिम्मती आर्थिक पक्ष – विशेष रूप से ईरान के फ्रोजन फंड्स की रिहाई – पर फोकस करेंगे।
वार्ता के प्रमुख मुद्दे
1. हॉर्मुज की खाड़ी की सुरक्षा: विश्व तेल व्यापार का महत्वपूर्ण रूट। इसकी स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करना दोनों पक्षों के लिए प्राथमिकता है।
2. परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन: ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम स्टॉक पर चर्चा। अमेरिका सुरक्षा गारंटी चाहता है, जबकि ईरान अपने अधिकारों पर अडिग है।
3. फ्रोजन एसेट्स की रिहाई: ईरान के अरबों डॉलर के फंसे फंड्स को अनलॉक करना। हिम्मती की मौजूदगी इसी मुद्दे को रणनीतिक महत्व देती है।
4. क्षेत्रीय स्थिरता: लेबनान, गाजा और अन्य मोर्चों पर युद्धविराम और दीर्घकालिक शांति व्यवस्था।
कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। कतर पहले भी अमेरिका-तालिबान, इजरायल-हमास और अन्य संवेदनशील वार्ताओं में सफल मध्यस्थ साबित हो चुका है।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं और प्रभाव
यह विकास वैश्विक बाजारों में सकारात्मक संकेत दे रहा है। तेल की कीमतों में गिरावट और स्टॉक मार्केट में उछाल देखा जा रहा है, क्योंकि निवेशक शांति समझौते की उम्मीद कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही "कोई बुरा सौदा नहीं" की नीति दोहराई है, जबकि ईरानी पक्ष "आत्मसमर्पण नहीं, संतुलित समझौता" का रुख रखता है।
ईरान के अंदर हार्डलाइनर्स इस वार्ता को लेकर सतर्क हैं। क़ालिबाफ़ ने पहले भी स्पष्ट किया है कि ईरान किसी भी दबाव में नहीं झुकेगा, लेकिन व्यावहारिक कूटनीति से देश के हितों की रक्षा की जाएगी।
ऐतिहासिक संदर्भ
ईरान-अमेरिका संबंधों का इतिहास १९७९ की इस्लामिक क्रांति से लेकर JCPOA (२०१५) तक उतार-चढ़ाव भरा रहा है। २०१८ में अमेरिका के JCPOA से बाहर निकलने के बाद तनाव बढ़ा। अब २०२६ का यह दौर एक नई शुरुआत हो सकता है, जहां अप्रत्यक्ष वार्ताएं धीरे-धीरे ठोस समझौते की ओर बढ़ रही हैं।
कतर न केवल मध्यस्थ है बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक सहयोग का भी केंद्र है। दोहा में होने वाली यह बैठक पिछले पाकिस्तान (इस्लामाबाद) और ओमान की वार्ताओं का प्राकृतिक विस्तार है।
आगे की राह: चुनौतियां और संभावनाएं
चुनौतियां:
- दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी।
- क्षेत्रीय सहयोगियों (इजरायल, सऊदी अरब आदि) की भूमिका।
- घरेलू राजनीतिक दबाव (ईरान में हार्डलाइनर्स, अमेरिका में चुनावी वर्ष)।
- तकनीकी मुद्दे जैसे यूरेनियम स्तर और मिसाइल कार्यक्रम।
संभावनाएं
- फ्रोजन फंड्स की रिहाई से ईरानी अर्थव्यवस्था को राहत।
- हॉर्मुज की खाड़ी में स्थिरता से वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत।
- व्यापक क्षेत्रीय शांति समझौते की नींव।
- भविष्य में प्रत्यक्ष द्विपक्षीय संबंधों की संभावना।
यह वार्ता केवल युद्ध समाप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व में नई स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दुनिया की निगाहें अब दोहा की इन बैठकों पर टिकी हैं। सफलता मिली तो इतिहास में इसे "दोहा समझौता" के रूप में याद किया जा सकता है।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल की यह यात्रा दिखाती है कि कूटनीति अभी भी सबसे शक्तिशाली हथियार है। संघर्ष की बजाय संवाद से दोनों पक्ष अपने-अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं। आने वाले दिनों में और अपडेट्स की उम्मीद है, जब वार्ता की प्रगति स्पष्ट होगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-25 May 2026