-Friday World-10 May 2026
मिडिल ईस्ट में चल रहे संकट की जटिलता पूरी दुनिया देख रही है। एक तरफ युद्ध की आग फैल रही है, दूसरी तरफ शांति के नाम पर बयानबाजी। हाल ही में भारत में इजरायल के महावाणिज्यदूत यानिव रेवाच ने एक बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा कि "इजरायल और अमेरिका युद्ध नहीं चाहते, हम तो सिर्फ अपने लोगों के लिए सुरक्षा, शांति और स्थिरता चाहते हैं।" यह बयान सुनकर कई लोग हैरान हैं—क्या यह वाकई मासूमियत है या चतुराई भरा प्रोपेगैंडा?
यह लेख न तो किसी पक्ष का अंध समर्थन करता है और न ही भावनाओं में बहता है। यह 2026 के इजरायल-ईरान-अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि में तथ्यों, दावों और विरोधाभासों को रखता है।
संदर्भ: 2026 का मिडिल ईस्ट युद्ध
फरवरी 2026 में इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए। इन हमलों का लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलें, एयर डिफेंस और सैन्य ठिकाने थे। शुरुआती हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत कई उच्च अधिकारी मारे गए। ईरान ने जवाबी हमले किए—मिसाइलें, ड्रोन, हिजबुल्लाह और हूती जैसे सहयोगी गुटों के जरिए।
नतीजा? हजारों मौतें, लाखों विस्थापित, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल परिवहन बाधित, वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित। अप्रैल में अस्थायी सीजफायर हुआ, लेकिन तनाव बरकरार है। पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका-ईरान बातचीत चल रही है, जिस पर इजरायल ने असंतोष जताया है।
रेवाच का बयान इसी पृष्ठभूमि में आया। उन्होंने कहा कि इजरायल युद्ध नहीं चाहता, बल्कि सुरक्षा चाहता है। ईरान पर आरोप लगाया कि वह पूरे क्षेत्र में आतंकवादी गुटों (हिजबुल्लाह, हमास, हूती) को समर्थन देता है और इजरायल को नष्ट करने की धमकियां देता है।
'सेल्फ-डिफेंस' बनाम आक्रामकता: दोहरी कहानी
इजरायल का दावा है कि उसके कदम 'सेल्फ-डिफेंस' हैं। ईरान ने लंबे समय से इजरायल के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर चलाई है—रॉकेट हमले, ड्रोन हमले। 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद इजरायल-गाजा युद्ध, फिर लेबनान में हिजबुल्लाह के साथ टकराव, और 2026 में ईरान पर सीधा हमला। इजरायल कहता है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अस्तित्व का खतरा है।
दूसरी तरफ आलोचक कहते हैं:
- इजरायल ने पहले हमला किया।
- व्यापक हवाई हमलों में नागरिक क्षति हुई (जैसे मिनाब स्कूल)।
- क्षेत्रीय विस्तार और सेटलमेंट पॉलिसी को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना।
- अमेरिका का बिना शर्त समर्थन।
ईरान का पक्ष: वह इजरायल को 'जियोनिस्ट रेजिम' कहकर इल्जाम लगाता है, क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है, और कहता है कि उसके कार्यक्रम रक्षात्मक हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान ने भी प्रॉक्सी के जरिए हिंसा को बढ़ावा दिया है।
दोगलापन कहां है?
हर पक्ष अपनी आक्रामकता को 'रक्षा' बताता है। इजरायल 'विक्टिम कार्ड' खेलता है—हॉरर ऑफ हिस्ट्री (होलोकॉस्ट) से लेकर आज के रॉकेट हमलों तक। ईरान 'प्रतिरोध' का नारा देता है लेकिन घरेलू दमन और क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाता है। अमेरिका दोनों को हथियार और कूटनीतिक कवर देता है।
रेवाच का बयान 'मासूम' लग सकता है, लेकिन संदर्भ में यह प्रोपेगैंडा का हिस्सा है। युद्ध के बीच 'हम शांति चाहते हैं' कहना, जबकि स्ट्राइक्स जारी हैं, विरोधाभासी लगता है। फिर भी, कई देशों (भारत सहित) में इजरायल की दलीलें इसलिए स्वीकार्य हैं क्योंकि आतंकवाद से उसका संघर्ष जाना-पहचाना है।
भारत का नजरिया: रणनीतिक साझेदारी
भारत इजरायल के साथ मजबूत रक्षा, कृषि, टेक्नोलॉजी और इंटेलिजेंस सहयोग रखता है। इजरायल ने भारत को आतंकवाद से लड़ने में मदद की है। लेकिन भारत ईरान के साथ भी ऊर्जा और व्यापार संबंध रखता है। भारत 'सभी पक्षों के साथ दोस्ती' की नीति अपनाता है—न तो अंध समर्थन, न आंख मूंदकर विरोध।
रेवाच ने भारत में इजरायल के समर्थन और आतंकवाद विरोधी सहयोग की बात भी की।
हकीकत की तह तक
1. ईरान का प्रॉक्सी नेटवर्क: हिजबुल्लाह, हमास, हूती—ये ईरान के हथियार हैं। ये गुट इजरायल और अमेरिकी हितों पर हमले करते रहे हैं।
2. इजरायल की सैन्य श्रेष्ठता: आयरन डोम, एयर स्ट्राइक्स—इजरायल की क्षमता जबरदस्त है। लेकिन लंबे युद्ध में नागरिक पीड़ा और अंतरराष्ट्रीय अलगाव बढ़ता है।
3. अमेरिका की भूमिका: ट्रंप प्रशासन ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बनाया। 'शांति' के बयान के बावजूद सैन्य विकल्प हमेशा खुले रहे।
4. *ममानवीय कीमत: दोनों तरफ मौतें, विस्थापन। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहा है।
5. समाधान? प्रामाणिक बातचीत, जिसमें सभी पक्ष समझौते करें। ईरान को परमाणु महत्वाकांक्षा छोड़नी होगी, इजरायल को सुरक्षा गारंटी मिलनी होगी, और क्षेत्रीय देशों को प्रॉक्सी वॉर बंद करनी होगी। लेकिन 'विक्टिम' और 'विलेन' का नैरेटिव जारी रहने तक शांति मुश्किल है।
निष्कर्ष: प्रोपेगैंडा से परे
रेवाच का बयान सुनकर 'दोगलापन' कहना आसान है, लेकिन जटिलता ज्यादा गहरी है। मिडिल ईस्ट में कोई एक 'मासूम' नहीं है। इजरायल ने आक्रामक कदम उठाए, ईरान ने प्रॉक्सी के जरिए युद्ध छेड़ा, अमेरिका ने अपनी रणनीति चलाई। हर पक्ष अपनी जनता को 'हम सही, वे गलत' का नैरेटिव बेच रहा है।
सच्ची शांति तब आएगी जब तथ्यों पर आधारित संवाद होगा, न कि कैमरे के सामने 'शांतिदूत' बनने से। दुनिया को चाहिए—निष्पक्ष रिपोर्टिंग, मानवीय मूल्यों का सम्मान, और ऐसे समाधान जो सिर्फ एक पक्ष को नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र को स्थिरता दें।
विक्टिम कार्ड खेलने वाले सभी पक्षों को याद रखना चाहिए: इतिहास सिर्फ विजेताओं का नहीं लिखा जाता। यह उन लोगों का भी लिखा जाता है जो युद्ध की आग बुझाने की हिम्मत दिखाते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-10 May 2026