अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किसी से छिपा नहीं है। बयानों की जंग अक्सर हथियारों से ज्यादा तीखी हो जाती है। ऐसा ही एक मौका तब आया जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची रूस के दौरे पर पहुंचे। मॉस्को में उनका स्वागत किसी और ने नहीं, बल्कि खुद राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किया। यह मुलाकात ही दुनिया को कई संकेत दे गई।
लेकिन असली धमाका हुआ अराघची के इंटरव्यू में। रूसी मीडिया से बात करते हुए अराघची ने सीधे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दावों पर पलटवार किया।
ट्रंप का दावा क्या था?
पत्रकार ने अराघची से पूछा कि डोनाल्ड ट्रंप बार बार कह रहे हैं कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ जंग जीत ली है। उनका दावा है कि इस्लामी गणराज्य हार चुका है और अमेरिका विजेता बनकर उभरा है।
अराघची का जवाब: सवालों से दिया करारा तमाचा
अराघची ने ट्रंप के इस दावे को शब्दों के तीर से भेद दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "अगर सच में अमेरिका जीता है, तो फिर ट्रंप बातचीत के लिए इतने बेचैन क्यों हैं?"
उन्होंने आगे तर्क दिया कि दुनिया का नियम साफ है। जो देश जंग हारता है, वही झुकता है। वही दूसरों के दरवाज़े पर जाकर बातचीत की गुहार लगाता है, शर्तें मनवाने की कोशिश करता है। विजेता को कभी बातचीत की भीख नहीं मांगनी पड़ती। अराघची का इशारा साफ था: अगर अमेरिका जीता है तो ईरान को मनाने की कोशिश क्यों हो रही है?
होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर सबसे बड़ा सवाल
अराघची यहीं नहीं रुके। उन्होंने दूसरा सवाल दागा जो सीधे अमेरिका की "जीत" पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने कहा, "अगर अमेरिका सच में विजेता है, तो फिर होर्मुज़ जलडमरूमध्य अब तक खुला क्यों नहीं? अभी तक बंद क्यों है?"
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के लिए तेल की सबसे अहम नस है। दुनिया का करीब 20% तेल व्यापार यहीं से होता है। इस पर ईरान का दबदबा है। अराघची का कहना था कि अगर ईरान हार गया होता तो यह रास्ता कब का अमेरिका के कंट्रोल में होता। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी तेहरान की मर्जी के बिना वहां पत्ता नहीं हिलता। यह अपने आप में बताता है कि मैदान में कौन मजबूत है।
रूस-ईरान रिश्ते: "हम बराबर के साझेदार हैं"
इंटरव्यू में जब पत्रकार ने रूस के समर्थन पर सवाल उठाया तो अराघची ने कूटनीति का बेहतरीन नमूना पेश किया। उन्होंने कहा कि रूस एक मजबूत सहयोगी है और मुश्किल वक्त में ईरान का समर्थन करता है।
लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने जोड़ दिया, "लेकिन ईरान ने भी उनका साथ दिया है और देता रहेगा।" यह एक लाइन बहुत गहरी थी। इसका सीधा संदेश था कि तेहरान और मॉस्को का रिश्ता मालिक और मोहताज का नहीं है। यह दो ताकतवर देशों की बराबरी की दोस्ती है। ईरान किसी के रहमोकरम पर नहीं, बल्कि अपने दम पर खड़ा है।
क्यों अहम है अराघची की भूमिका?
इस पूरे घटनाक्रम में अब्बास अराघची की भूमिका को कम आंकना गलती होगी। सच कहें तो इस कूटनीतिक जंग में अराघची की जुबान, ईरान की मिसाइलों से कम घातक नहीं रही।
मिसाइलें दुश्मन के ठिकाने तबाह करती हैं। अराघची के शब्द दुश्मन के नैरेटिव को तबाह कर रहे हैं। ट्रंप का "जीत" वाला दावा पूरी दुनिया में घूम रहा था। अराघची ने दो सवालों से उस दावे की हवा निकाल दी। पहला: विजेता बातचीत को क्यों तरसे? दूसरा: जीते होते तो होर्मुज़ तुम्हारे पास होता।
पुतिन से मुलाकात के मायने
अराघची का पुतिन द्वारा खुद स्वागत किया जाना भी बड़ी कूटनीतिक चाल है। रूस यह दिखाना चाहता है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद वह ईरान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। ईरान के लिए यह संदेश है कि वह दुनिया में अकेला नहीं है। अमेरिका और इज़रायल के दबाव के बीच रूस-ईरान की यह जुगलबंदी पश्चिम एशिया का पूरा खेल बदल सकती है।
आगे क्या?
अराघची का यह इंटरव्यू सिर्फ एक जवाब नहीं था। यह ईरान की नई विदेश नीति का ऐलान था: हम झुकेंगे नहीं, डरेंगे नहीं, और बराबरी की बात करेंगे। ट्रंप हों या कोई और, तेहरान अब डिक्टेशन नहीं सुनेगा।
होर्मुज़ बंद है, बातचीत की टेबल पर अमेरिका इंतजार कर रहा है, और रूस साथ खड़ा है। अराघची ने दुनिया को बता दिया कि जंग सिर्फ मैदान में नहीं लड़ी जाती। कभी एक इंटरव्यू, एक सवाल, और एक सधा हुआ जवाब पूरी बाज़ी पलट देता है।
फिलहाल इतना तय है कि शब्दों की इस जंग में ईरान ने अपना स्कोर बराबर कर लिया है। और इस स्कोर को बराबर करने वाला कप्तान अब्बास अराघची है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-May 4,2026