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Friday, 15 May 2026

ट्रम्प ने ताइवान की बलि चढ़ा दी? चीन से लौटते ही बदला सुर, पूर्वी एशिया में युद्ध के बादल

ट्रम्प ने ताइवान की बलि चढ़ा दी? चीन से लौटते ही बदला सुर, पूर्वी एशिया में युद्ध के बादल
-Friday World-16 May 2026
दुनिया की राजनिति में वादों और वफादारी की उम्र कितनी छोटी होती है, इसका ताजा उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयानों से मिल गया है। चीन की तीन दिवसीय हाई-प्रोफाइल यात्रा पूरी कर एयर फोर्स वन में वापस लौटते हुए ट्रम्प ने जो कुछ कहा, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खलबली मच गई है। गत कुछ समय तक ताइवान की सुरक्षा के सबसे बड़े समर्थक दिखने वाले ट्रम्प अब इस मुद्दे पर पूरी तरह से उलटे सुर में बोल रहे हैं।

 हथियारों की डील पर ब्रेक और '9500 माइल' का तर्क

ट्रम्प प्रशासन ने पहले ताइवान को करीब 14 बिलियन डॉलर के हथियारों की बिक्री को मंजूरी दी थी, लेकिन चीन से लौटते ही उन्होंने इस पर ब्रेक लगा दिया। पत्रकारों के सवाल पर ट्रम्प ने स्पष्ट कहा, "मैंने अभी हथियारों की बिक्री पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। मैं इस बारे में थोड़ा और सोचूंगा।" 

उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका को अपने घर से 9,500 मील दूर किसी नए युद्ध में कूदने की जरूरत नहीं है। यह बयान चीन के दबाव को साफ दिखाता है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रम्प को साफ चेतावनी दी थी कि ताइवान मुद्दे पर कोई गलत कदम दोनों देशों के संबंधों को हमेशा के लिए बिगाड़ सकता है।

ट्रम्प की यह नरमाई नई नहीं है। वे हमेशा से 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति के पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि दूर-दराज के द्वीपों की रक्षा के लिए अमेरिकी सैनिकों और टैक्सपेयर्स का पैसा खर्च करना उचित नहीं। उन्होंने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा, "मैं किसी को स्वतंत्रता की घोषणा करते नहीं देखना चाहता। हमें 9,500 मील दूर जाकर युद्ध नहीं लड़ना चाहिए। मैं चाहता हूं कि दोनों पक्ष शांत रहें।"

जिनपिंग की 'रेड लाइन' और ट्रम्प की चुप्पी

बीजिंग में हुई बैठक के दौरान शी जिनपिंग ने ताइवान पर अपना आक्रामक रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि ताइवान चीन का अभिन्न अंग है और स्वतंत्रता की कोई कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जरूरत पड़ी तो सैन्य ताकत का इस्तेमाल भी किया जाएगा। 

ट्रम्प ने इस 'रेड लाइन' पर कोई विरोध नहीं जताया। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने जिनपिंग की बात सुनी लेकिन कोई टिप्पणी नहीं की। जानकारों का कहना है कि ट्रम्प फिलहाल व्यापार युद्ध, ईरान मुद्दे और अन्य क्षेत्रों में चीन के सहयोग की तलाश में हैं। इसलिए ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चीन को नाराज करने से बच रहे हैं।

यह रणनीति ट्रम्प की क्लासिक डील-मेकिंग स्टाइल है — दबाव बनाओ, फिर समझौता करो। लेकिन आलोचक इसे ताइवान के साथ विश्वासघात बता रहे हैं।

ताइवान की प्रतिक्रिया: सतर्क लेकिन दृढ़

ताइवान के अधिकारियों ने इस समिट के नतीजों पर 'कोई आश्चर्य नहीं' वाली प्रतिक्रिया दी है। फिर भी उन्होंने चीन से अपील की है कि वह ताइवान द्वीप के आसपास सैन्य दबाव कम करे। ताइवान का कहना है कि चीन की ये गतिविधियां पूरे क्षेत्र की शांति के लिए खतरा हैं।

ताइवान की विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि अमेरिका के साथ हथियार सौदे रक्षा के लिए जरूरी हैं और यह अमेरिकी कानून के तहत जारी रहना चाहिए।

ऐतिहासिक संदर्भ: एक-चीन नीति और स्ट्रेटेजिक अस्पष्टता

ताइवान मुद्दा दशकों पुराना है। 1979 के बाद से अमेरिका 'एक-चीन' नीति का अनुसरण करता आया है, लेकिन साथ ही ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत हथियार बेचता रहा है। यह 'स्ट्रेटेजिक अस्पष्टता' (Strategic Ambiguity) की नीति रही है — न तो पूर्ण समर्थन, न पूर्ण त्याग।

ट्रम्प का बयान इस अस्पष्टता को और झुका रहा है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह चीन को सिग्नल दे रहा है कि अमेरिका युद्ध के लिए तैयार नहीं है, जबकि अन्य इसे व्यावहारिक कूटनीति मानते हैं।

पूर्वी एशिया में युद्ध के संकेत?

ट्रम्प के इन बयानों से पूर्वी एशिया में तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। चीन ताइवान के आसपास नियमित सैन्य अभ्यास कर रहा है। अगर अमेरिका हथियार सप्लाई रोकता है तो ताइवान की रक्षा क्षमता प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर, ट्रम्प TSMC जैसे चिप मैन्युफैक्चरर्स को अमेरिका में प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ताकि सप्लाई चेन चीन पर निर्भर न रहे।

 वैश्विक प्रभाव

- *lभारत के लिए: भारत-चीन सीमा तनाव के बीच यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। अगर चीन ताइवान पर फोकस करता है तो भारत को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन कुल मिलाकर इंडो-पैसिफिक में चीन की आक्रामकता बढ़ सकती है।
- जापान और दक्षिण कोरिया: ये देश भी चिंतित हैं। अमेरिका की कमिटमेंट पर सवाल उठने से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होगी।
- आर्थिक निहितार्थ: ताइवान दुनिया का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर उत्पादक है। कोई संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका देगा।

 रियलपॉलिटिक की जीत?

ट्रम्प की यह रणनीति शॉर्ट-टर्म डील पर आधारित लगती है। वे चीन से व्यापारिक रियायतें और ईरान जैसे मुद्दों पर सहयोग चाहते हैं। लेकिन लंबे समय में यह अमेरिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है।

दुनिया देख रही है कि सुपरपावर की वफादारी कितनी टिकाऊ है। ताइवान आज अकेला महसूस कर रहा है, लेकिन उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था और टेक इंडस्ट्री उसे मजबूत बनाती है।

ट्रम्प का अंतिम फैसला आने वाला है। क्या वे हथियार डील आगे बढ़ाएंगे या चीन के साथ बड़ा सौदा करेंगे? आने वाले दिन पूर्वी एशिया की नियति तय करेंगे।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-16 May 2026