दुनिया के सबसे जटिल भू-राजनीतिक संकटों में से एक में, जहां अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली गठबंधनों ने ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ाया, वहां ईरान के विदेश मंत्री डॉ. अब्बास अराघची ने कूटनीति के मैदान में एक अनोखी मिसाल कायम की है। सैन्य मोर्चे पर पीछे हटने को मजबूर अमेरिका अब डिप्लोमेसी के मोर्चे पर भी नाकों चने चबा रहा है। 20 वर्षों की अनुभवी पारी खेलते हुए अराघची 'बातचीत का चलता-फिरता विश्वकोश' साबित हो रहे हैं। मुंबई स्थित ईरानी मिशन की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस शख्सियत को वैश्विक स्तर पर और चमका दिया।
ईरानी मिशन ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: "बातचीत की मेज पर 20 साल। म्यूनिख 2006 से तेहरान 2026 तक। डॉ. अब्बास अराघची बातचीत का चलता-फिरता विश्वकोश हैं। इसे कहते हैं असली 'खिलाड़ी', बाकी सब तो सिर्फ फील्डिंग कर रहे हैं!" यह पोस्ट महज एक प्रशंसा नहीं, बल्कि ईरानी कूटनीति की निरंतरता और अराघची की दूरदर्शिता का प्रतीक है।
शुरुआती जीवन: क्रांति से कूटनीति तक
5 दिसंबर 1962 को तेहरान में जन्मे अब्बास अराघची का परिवार इस्फहान से जुड़ा है। किशोरावस्था में 1979 की इस्लामिक क्रांति में शामिल होने के बाद उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में सेवा की और ईरान-इराक युद्ध (1980-88) में भाग लिया। युद्ध के बाद 1989 में विदेश मंत्रालय में शामिल होकर उन्होंने कूटनीति की नींव रखी। उन्होंने मंत्रालय से जुड़े स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस से बैचलर डिग्री, इस्लामिक आजाद यूनिवर्सिटी से मास्टर्स इन पॉलिटिकल साइंस और ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ केंट से पीएचडी (पॉलिटिकल थॉट) प्राप्त की। उनकी थीसिस "इस्लामिक पॉलिटिकल थॉट में पॉलिटिकल पार्टिसिपेशन" ने पश्चिमी लोकतंत्र और इस्लामी शासन के बीच सामंजस्य पर गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया।
अराघची बहुभाषी हैं — अंग्रेजी और अरबी में निपुण। फिनलैंड (1999-2003) और जापान (2008-2011) में राजदूत के रूप में सेवा कर चुके हैं। उन्होंने विदेश मंत्रालय में प्रवक्ता, लीगल एंड इंटरनेशनल अफेयर्स डिप्टी मिनिस्टर, पॉलिटिकल डिप्टी मिनिस्टर जैसे अहम पद संभाले। 2013 से 2021 तक वे ईरान के न्यूक्लियर नेगोशिएटर रहे, जहां उन्होंने जोइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) 2015 न्यूक्लियर डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2024-26: संकट का दौर और अराघची का उदय
2024 में राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के नेतृत्व में अराघची को विदेश मंत्री बनाया गया। यह नियुक्ति ईरान की पश्चिम के साथ सैंक्शंस राहत और डिप्लोमेसी पर जोर देने की नीति का प्रतीक थी। लेकिन क्षेत्रीय घटनाक्रम — इजरायल-हमास युद्ध, हिजबुल्लाह और सीरिया में बदलाव, 2024-25 के प्रत्यक्ष टकराव और 2026 का बड़ा ईरान युद्ध — ने सब बदल दिया।
अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के कई वरिष्ठ नेता प्रभावित हुए, लेकिन अराघची बार-बार सार्वजनिक रूप से सक्रिय रहे। वे पश्चिम में सम्मानित JCPOA नेगोशिएटर के रूप में जाने जाते हैं, जो हार्डलाइनर्स और पश्चिम दोनों के बीच विश्वसनीय सेतु साबित हो सकते हैं। 2026 के युद्ध के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि "कोई सैन्य समाधान नहीं है, डिप्लोमेसी ही रास्ता है", लेकिन "निष्पक्ष और संतुलित डील" के बिना आगे नहीं बढ़ेंगे।
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस 2006 से शुरू हुई उनकी यात्रा 2026 के तेहरान तक पहुंची है। उन्होंने यूरोपीय देशों को "अप्रासंगिक" और "पैरालिसिस" का शिकार बताया। म्यूनिख को "सर्कस" कहते हुए उन्होंने लिखा कि ई3 (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी) अब क्षेत्रीय मुद्दों में किनारे पर हैं, जबकि गल्फ देश ज्यादा प्रभावी साबित हो रहे हैं।
ट्रंप के साथ सामना: डिप्लोमेसी की मास्टरक्लास
डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाया, लेकिन अराघची ने दृढ़ता दिखाई। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत अब एजेंडा पर नहीं है, क्योंकि पहले प्रगति के बावजूद हमले हुए। ओमान, चीन और अन्य मध्यस्थों के जरिए संदेश आए, लेकिन "ट्रस्ट की कमी" सबसे बड़ी बाधा बनी। अराघची ने BRICS मीटिंग में और अन्य मंचों पर ईरान की स्थिति स्पष्ट की — आत्मरक्षा का अधिकार असीमित है, लेकिन डिप्लोमेसी बेहतर विकल्प है।
उनकी रणनीति बहुआयामी रही:
- क्षेत्रीय गठबंधन: रूस, चीन और BRICS देशों के साथ समन्वय।
- सार्वजनिक संदेश: पश्चिमी मीडिया इंटरव्यू में ईरान की लचीलापन और दृढ़ता दोनों दिखाई।
- ऐतिहासिक निरंतरता: JCPOA अनुभव का उपयोग कर "निष्पक्ष डील" की मांग।
- घरेलू संतुलन: हार्डलाइनर्स को विश्वास दिलाते हुए पेजेश्कियन सरकार की डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाया।
मुंबई ईरानी मिशन की पोस्ट इसी निरंतरता को रेखांकित करती है। 20 साल में अराघची ने सैकड़ों दौर की बातचीत की, असफलताओं से सीखा और ईरानी हितों की रक्षा की।
वैश्विक प्रभाव और चुनौतियां
अराघची की कूटनीति सिर्फ ईरान-अमेरिका तक सीमित नहीं। उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, तेल बाजार, क्षेत्रीय सुरक्षा और न्यूक्लियर कार्यक्रम जैसे मुद्दों पर ईरान की आवाज को मजबूत किया। उनकी पृष्ठभूमि — IRGC सेवा से लेकर पश्चिमी शिक्षा तक — उन्हें अनोखा बनाती है। वे कहते हैं, "सैनिक दोस्तों, वही कमांडर जिसने तुम्हें यूनिफॉर्म दी, मुझे सूट दिया है।"
विश्लेषक उन्हें "रीजनलिस्ट और प्रैग्मेटिस्ट" दोनों मानते हैं। 2026 के संकट में उन्होंने दिखाया कि सैन्य हमलों के बावजूद ईरान टूटा नहीं, बल्कि डिप्लोमेसी के जरिए मजबूती से खड़ा है। ट्रंप प्रशासन के दावों के बावजूद, अराघची ने स्पष्ट किया कि कोई "आसान" समझौता नहीं होगा।
भविष्य की दिशा
ईरान की कूटनीति अब बहुपक्षीय है — BRICS, शंघाई सहयोग संगठन और क्षेत्रीय मध्यस्थों पर जोर। अराघची जैसे अनुभवी खिलाड़ी सुनिश्चित करते हैं कि ईरान न सिर्फ टिके, बल्कि प्रभावशाली बने। मुंबई पोस्ट याद दिलाती है कि असली खिलाड़ी मैदान में फील्डिंग नहीं, बल्कि गेम प्लान बनाते हैं।
डॉ. अब्बास अराघची की कहानी सिर्फ एक राजनयिक की नहीं, बल्कि संकट के समय में दूरदर्शी नेतृत्व की है। 20 साल की पारी अब नई ऊंचाइयों को छू रही है। चाहे म्यूनिख का सर्द हॉल हो या तेहरान की रणनीतिक बैठकें, अराघची साबित कर रहे हैं कि शब्दों की ताकत तोपों से कम नहीं होती।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-20 May 2026