नई दिल्ली। BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के समापन पर ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक ऐसा बयान दिया जिसने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी। उन्होंने आरोप लगाया कि BRICS के एक सदस्य देश, जिसके इजराइल के साथ "विशेष संबंध" हैं, ने बैठक के अंतिम संयुक्त बयान को रोक दिया। इसे "बहुत दुर्भाग्यपूर्ण" बताते हुए अराघची ने स्पष्ट किया कि ईरान का उस देश से कोई झगड़ा नहीं है, बल्कि उसने केवल अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया था जो उस देश की भूमि पर स्थित हैं।
यह घटना 14-15 मई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान हुई। भारत की BRICS अध्यक्षता के तहत हुई इस बैठक में ईरान, UAE, रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका समेत अन्य सदस्य देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। बैठक के बाद संयुक्त बयान जारी न हो पाने से BRICS की एकता पर सवाल उठने लगे हैं।
पृष्ठभूमि: BRICS में बढ़ते तनाव
BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) हाल के वर्षों में विस्तारित हुआ है और इसमें ईरान, UAE, इंडोनेशिया, मिस्र, इथियोपिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं। यह समूह पारंपरिक रूप से पश्चिमी वर्चस्व का विकल्प बनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष, खासकर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनाव ने इस एकता को चुनौती दी है।
ईरानी विदेश मंत्री ने बैठक में जोर देकर कहा कि ईरान अमेरिका और इजराइल की "अवैध आक्रामकता" का शिकार है। उन्होंने BRICS सदस्यों से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की निंदा करें। अराघची के अनुसार, पश्चिमी देशों की "झूठी श्रेष्ठता" और "दंडमुक्ति" की भावना को चुनौती देनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "हमने उस देश को निशाना नहीं बनाया। हमने केवल अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया जो दुर्भाग्यवश उनकी भूमि पर हैं। उनका इजराइल और अमेरिका के साथ गठबंधन उन्हें कम सुरक्षित बनाता है।"
UAE पर इशारा?
अराघची ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन सूत्रों और रिपोर्ट्स के अनुसार इशारा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की ओर था। UAE इजराइल के साथ अब्राहम समझौते के तहत मजबूत संबंध रखता है और हाल के संघर्ष में उस पर ईरान के खिलाफ भूमिका का आरोप भी लगा है। ईरान ने UAE पर प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग का आरोप लगाया है, जबकि UAE ने इसे खारिज किया है।
यह विवाद BRICS की सीमाओं को उजागर करता है। एक तरफ ईरान जैसे देश पश्चिमी नीतियों का विरोध करते हैं, तो दूसरी तरफ UAE जैसे सदस्य पश्चिम और इजराइल से निकटता बनाए रखना चाहते हैं। भारत, जो बैठक का मेजबान था, ने संतुलित रुख अपनाया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संवाद और कूटनीति पर जोर दिया। भारत ने अंत में चेयरमैन का बयान जारी किया, जिसमें "पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व की स्थिति पर सदस्यों में अलग-अलग विचार" होने का उल्लेख किया गया। कोई मजबूत निंदा या समर्थन नहीं।
ईरान का रुख: आत्मरक्षा या विस्तारवाद?
ईरानी विदेश मंत्री ने बैठक में ईरान को "अवैध विस्तारवाद और युद्धउन्माद" का शिकार बताया। उन्होंने जोर दिया कि ईरान कभी दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा। हाल के घटनाक्रम में अमेरिका-इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें क्षेत्रीय ठिकानों को निशाना बनाया गया।
अराघची ने स्पष्ट किया:
- ईरान का लक्ष्य केवल अमेरिकी सैन्य स्थापनाएं थीं।
- वह देश जिसकी भूमि पर ये अड्डे हैं, उसके साथ ईरान का कोई विवाद नहीं।
- लेकिन उस देश का इजराइल-अमेरिका गठबंधन उसे कमजोर बनाता है।
यह बयान रणनीतिक है। ईरान BRICS के माध्यम से वैश्विक समर्थन जुटाना चाहता है, जबकि आर्थिक प्रतिबंधों और युद्ध की मार झेल रहा है। वह तेल निर्यात, हORMUZ जलडमरूमध्य की सुरक्षा और BRICS के भीतर व्यापार बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है।
भारत की भूमिका: संतुलन का कूटनीतिक खेल
भारत के लिए यह बैठक चुनौतीपूर्ण रही। एक तरफ ईरान के साथ लंबे समय से ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, दूसरी तरफ इजराइल के साथ सुरक्षा सहयोग और UAE के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारी। भारत ने BRICS को आर्थिक बहुपक्षीयता का मंच बनाए रखने पर फोकस किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर ने अराघची से मुलाकात की। भारत का संदेश साफ था - संवाद ही समाधान है। बैठक में आपूर्ति श्रृंखला, आर्थिक अनिश्चितता और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
भारतीय दृष्टिकोण से BRICS को पश्चिमी-पूर्वी विभाजन का शिकार नहीं बनना चाहिए। भारत रूस-चीन के साथ भी संतुलन बनाए रखते हुए इजराइल और अरब देशों से संबंध मजबूत करता रहा है।
BRICS की भविष्य चुनौतियां
यह घटना BRICS की आंतरिक कमजोरियों को दिखाती है:
1. सहमति आधारित निर्णय: एक सदस्य के विरोध से संयुक्त बयान रुक सकता है।
2. भिन्न हित: सदस्य देशों के अलग-अलग भू-राजनीतिक गठबंधन।
3. मध्य पूर्व संकट का प्रभाव: ऊर्जा कीमतें, सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति पर असर।
4. विस्तार की जटिलता: नए सदस्य (ईरान, UAE) पुराने सदस्यों के बीच तनाव बढ़ा रहे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि BRICS नेताओं की आगामी बैठक में इन मुद्दों को सुलझाना होगा। अन्यथा समूह की विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
वैश्विक प्रतिक्रियाएं
रूस और चीन ने ईरान के रुख का समर्थन किया, जबकि पश्चिमी देशों ने इसे "विभाजनकारी" बताया। अमेरिका ने BRICS को "विरोधी गठबंधन" करार दिया। इजराइल ने ईरानी आरोपों को "प्रचार" बताया।
UAE ने आरोपों से इनकार किया और BRICS में सहयोग पर जोर दिया।
अब्बास अराघची का बयान सिर्फ एक बैठक का परिणाम नहीं, बल्कि बदलते विश्व व्यवस्था का प्रतीक है। जहां पारंपरिक शक्तियां (अमेरिका-इजराइल) अपना प्रभाव बनाए रखना चाहती हैं, वहीं उभरती शक्तियां (BRICS) नया संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं।
ईरान की चुनौती साफ है - या तो BRICS पश्चिमी "आक्रामकता" की निंदा करे, या फिर अपनी प्रासंगिकता खो दे। भारत जैसे देशों के लिए यह मध्य मार्ग अपनाने का अवसर है।
दुनिया देख रही है कि क्या BRICS वास्तव में "ग्लोबल साउथ" की आवाज बन पाएगा, या आंतरिक मतभेद इसे कमजोर कर देंगे। अराघची के शब्दों में, "पश्चिम की झूठी श्रेष्ठता को तोड़ना होगा।" लेकिन यह तोड़ना कितना आसान होगा, यह समय बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-15 May 2026