-Friday World-26 May 2026
चीन ने एक बार फिर भारत को स्पष्ट और अशिष्ट भाषा में चेतावनी दी है। मुद्दा है तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च गुरु दलाई लामा के उत्तराधिकारी (रिइनकार्नेशन) का। चीनी दूतावास ने कहा, “यह पूरी तरह से चीन का आंतरिक मामला है। भारत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।” इस बयान के साथ ही चीन ने भारत से मांग की है कि वह तिब्बत स्वतंत्रता समर्थक संगठनों और नेताओं को अपनी धरती पर जगह न दे।
यह घटना दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के आसपास हुई है, जब उन्होंने खुद स्पष्ट किया कि उनकी संस्था का उत्तराधिकार धार्मिक परंपरा के अनुसार ही चलेगा और इसमें किसी राज्य की भूमिका नहीं होनी चाहिए।
धार्मिक परंपरा बनाम चीन का राजनीतिक दावा
दलाई लामा तिब्बती बौद्ध धर्म की गेलुग संप्रदाय के प्रमुख हैं। 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो 1959 से भारत में निर्वासन में हैं। उनकी उम्र अब 90 वर्ष से अधिक हो चुकी है, इसलिए उत्तराधिकारी का मुद्दा वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है।
चीनी दृष्टिकोण:
बीजिंग का दावा है कि दलाई लामा की पुनर्जन्म प्रक्रिया सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक प्रथाओं पर आधारित है, जिसकी मंजूरी चीन की केंद्रीय सरकार को देनी होती है। चीन कहता है कि 14वें दलाई लामा की भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। चीन “गोल्डन अर्न” (स्वर्ण कलश) पद्धति का हवाला देता है, जो किंग राजवंश के समय से चली आ रही है।
दलाई लामा का स्पष्ट स्टैंड:
दलाई लामा ने हाल ही में कहा कि उनकी संस्था “गaden Phodrang Trust” के पास ही उत्तराधिकारी की खोज का पूरा अधिकार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “इसमें किसी अन्य को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगला दलाई लामा “मुक्त देश” में जन्म ले सकता है।
चीन की ताजा धमकी और भारत को चेतावनी
मई 2026 के अंत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग (Yu Jing) ने सोशल मीडिया पर बयान जारी किया:
> “दलाई लामा के पुनर्जन्म का मुद्दा पूरी तरह चीन का आंतरिक मामला है। भारत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। साथ ही भारत तिब्बत स्वतंत्रता की मांग करने वाले संगठनों को अपनी भूमि का उपयोग न करने दे।”
यह बयान उन भारतीय मंत्रियों के बयानों के जवाब में आया, जिन्होंने दलाई लामा की धार्मिक स्वायत्तता का समर्थन किया था।
किरेन रिजिजू का मजबूत बयान
केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू (जो खुद बौद्ध हैं) ने कहा:
> “दलाई लामा की संस्था न सिर्फ तिब्बतियों बल्कि पूरे विश्व के लाखों अनुयायियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार केवल दलाई लामा और उनकी स्थापित परंपराओं को है। इसमें किसी अन्य को दखल नहीं देना चाहिए।”
रिजिजू ने स्पष्ट किया कि यह उनका व्यक्तिगत और धार्मिक दृष्टिकोण है, लेकिन यह भारत की धार्मिक स्वतंत्रता की भावना को प्रतिबिंबित करता है।
भारत-चीन संबंधों में तिब्बत का “कांटा”
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद (लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक) पहले से ही तनावपूर्ण है। दलाई लामा का मुद्दा इस तनाव को और बढ़ा रहा है। भारत में लगभग 1 लाख से अधिक तिब्बती शरणार्थी रहते हैं और धर्मशाला में तिब्बती सरकार-इन-एग्जाइल का मुख्यालय है।
भारत आधिकारिक रूप से तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है, लेकिन वह तिब्बती लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक स्वायत्तता का सम्मान करता है। चीन इसे “भारत द्वारा तिब्बत कार्ड” के रूप में देखता है।
ऐतिहासिक संदर्भ
- 1959: चीनी सेना के दमन के बाद दलाई लामा भारत आए।
- 1960 के दशक से: भारत ने तिब्बती शरणार्थियों को आश्रय दिया।
- 2020 गलवान संघर्ष के बाद: संबंध और बिगड़े।
- 2025-26: दलाई लामा के 90वें जन्मदिन पर भारतीय मंत्रियों की उपस्थिति ने चीन को नाराज किया।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
अमेरिका, यूरोपीय देश और कई बौद्ध देश दलाई लामा की धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करते हैं। चीन पर आरोप है कि वह तिब्बत में बौद्ध विहारों पर नियंत्रण बढ़ा रहा है, संस्कृति का दमन कर रहा है और “सिनाइजेशन” की नीति चला रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगला दलाई लामा अगर भारत या किसी पश्चिमी देश में जन्म लेता है, तो यह बीजिंग के लिए बड़ा झटका होगा। चीन अपनी छाया में एक “नकली” दलाई लामा नियुक्त करने की कोशिश कर सकता है, जिससे दो दलाई लामा की स्थिति पैदा हो सकती है।
भारत के लिए चुनौतियां और रणनीति
भारत को संतुलन बनाना है — एक तरफ आर्थिक और सीमा संबंधी बातचीत, दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार का समर्थन।
भारत की संभावित रणनीति:
- धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का आधिकारिक स्टैंड।
- तिब्बती शरणार्थियों की सुरक्षा और उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों का सम्मान।
- “चाइना प्लस वन” और क्वाड जैसे मंचों पर रणनीतिक दबाव।
- बौद्ध देशों (म्यांमार, थाईलैंड, जापान, मंगोलिया) के साथ सांस्कृतिक संबंध मजबूत करना।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा
चीन की “वच्चे न पड़ो” वाली धमकी न सिर्फ दलाई लामा बल्कि वैश्विक बौद्ध समुदाय को चुनौती है। दलाई लामा की संस्था 600 वर्ष पुरानी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। इसे राजनीतिक नियंत्रण में लाना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जाएगा।
भारत, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सिद्धांत मानता है, इस मुद्दे पर नैतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत स्थिति में है। आने वाले दिनों में यह टकराव और तीखा हो सकता है, क्योंकि दलाई लामा के उत्तराधिकारी की घोषणा किसी भी समय हो सकती है।
यह मुद्दा केवल भारत-चीन संबंधों का नहीं, बल्कि 21वीं सदी में धार्मिक स्वतंत्रता, संप्रभुता और सॉफ्ट पावर के संघर्ष का प्रतीक बन गया है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-26 May 2026