नई दिल्ली/बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर से बड़े ट्विस्ट की ओर बढ़ रही है। 2023 की विधानसभा चुनाव में सत्ता हासिल करने के बाद कांग्रेस सरकार अब अपने सबसे बड़े नेतृत्व परिवर्तन की दहलीज पर खड़ी दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान के साथ हुई लगभग 7 घंटे की मैराथन बैठक के बाद यह संभावना और मजबूत हो गई है।
यह फैसला महज राज्य स्तर का नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर कांग्रेस की राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
OBC चेहरे के रूप में नई जिम्मेदारी
कांग्रेस नेतृत्व सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा ओबीसी (Other Backward Classes) चेहरा बनाने की तैयारी कर रहा है। पार्टी चाहती है कि वे दिल्ली आकर सामाजिक न्याय, जाति आधारित जनगणना और पिछड़ों के empowerment जैसे मुद्दों पर पार्टी की रणनीति को मजबूत करें।
बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार और महासचिव के.सी. वेणुगोपाल समेत बड़े नेता मौजूद रहे। सूत्र बताते हैं कि सिद्धारमैया को राज्यसभा की सीट और AICC में महत्वपूर्ण पद की पेशकश की गई है। 8 जून तक कर्नाटक से राज्यसभा उम्मीदवारों के नामांकन की आखिरी तारीख है, इसलिए समयबद्धता बेहद अहम है।
सिद्धारमैया ने अभी अंतिम फैसला लेने के लिए थोड़ा समय मांगा है। वे बेंगलुरु लौटकर अपने विश्वसनीय मंत्रियों और स्थानीय नेताओं से चर्चा कर रहे हैं।
पावर शेयरिंग फॉर्मूला और DK शिवकुमार का दावा
अगर सिद्धारमैया इस्तीफा देते हैं तो कांग्रेस के आंतरिक पावर शेयरिंग फॉर्मूले के तहत डी.के. शिवकुमार अगले मुख्यमंत्री के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। वीरभद्रिया और सिद्धारमैया के बाद कर्नाटक कांग्रेस में शिवकुमार की हैसियत काफी मजबूत है। वे लिंगायत और वokkaliga समुदायों के बीच संतुलन बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।
बैठक के बाद हालांकि के.सी. वेणुगोपाल ने मीडिया से कहा कि नेतृत्व परिवर्तन की खबरें पूरी तरह काल्पनिक हैं और बैठक सिर्फ आगामी राज्यसभा चुनाव को लेकर थी। लेकिन सूत्रों का दावा है कि अंदरूनी बातचीत काफी गहरी थी।
सिद्धारमैया की राजनीतिक यात्रा: एक संघर्षशील किसान पुत्र
सिद्धारमैया का सफर आसान नहीं रहा। एक साधारण किसान परिवार से आने वाले इस नेता ने कर्नाटक की राजनीति में लंबा संघर्ष किया। वे जनता दल से कांग्रेस में आए और कई बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनकी सरकार में गारंटी योजनाओं (Ladli Lakshmi, Gruha Jyothi आदि) ने महिलाओं, किसानों और युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आंतरिक कलह, डिप्टी सीएम के साथ तनाव और कुछ विवादास्पद फैसलों ने भी सरकार को चुनौतियां दीं।
अब उन्हें राष्ट्रीय पटल पर लाकर कांग्रेस OBC वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ OBC और दलित-बहुजन गठजोड़ बनाने की कोशिश में सिद्धारमैया जैसे अनुभवी नेता की भूमिका अहम हो सकती है।
2029 लोकसभा चुनाव: कांग्रेस का बड़ा दांव
कांग्रेस 2029 के चुनाव को 2024 से ज्यादा अहम मान रही है। पार्टी का मानना है कि अगर OBC, SC/ST और अल्पसंख्यक वोटों को सही ढंग से जोड़ा जाए तो भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सकती है। सिद्धारमैया न सिर्फ कर्नाटक बल्कि पूरे दक्षिण भारत और कुछ उत्तरी राज्यों में भी OBC चेहरे के रूप में काम कर सकते हैं।
राज्यसभा पहुंचने के बाद उन्हें AICC में OBC विभाग या सामाजिक न्याय से जुड़े किसी बड़े विभाग की जिम्मेदारी दी जा सकती है। यह कदम कांग्रेस को “सामाजिक न्याय की पार्टी” के रूप में फिर से स्थापित करने में मदद करेगा।
कर्नाटक पर क्या होगा असर?
कर्नाटक भारत का आर्थिक इंजन माना जाता है। बेंगलुरु आईटी हब है, जहां निवेश, रोजगार और औद्योगिक विकास की बड़ी संभावनाएं हैं। नेतृत्व परिवर्तन से सरकार की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन अगर सुचारू तरीके से पावर ट्रांसफर होता है तो कांग्रेस अपनी छवि मजबूत कर सकती है।
डी.के. शिवकुमार अगर CM बनते हैं तो विकास कार्यों पर ज्यादा फोकस और प्रशासनिक सुधार की उम्मीद की जा रही है। वे पहले से ही पार्टी संगठन को मजबूत करने में सक्रिय रहे हैं।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और संभावित परिदृश्य
भाजपा इस घटनाक्रम को कांग्रेस के आंतरिक कलह का सबूत बताकर हमला बोल सकती है। जेडीएस भी स्थिति पर नजर रखे हुए है। अगर सिद्धारमैया इस्तीफा देते हैं तो 2024 के बाद कर्नाटक में दूसरी बार बड़ा राजनीतिक बदलाव होगा।
कुछ नेता मानते हैं कि यह कदम सिद्धारमैया की इज्जत बचाने और उन्हें आरामदायक राष्ट्रीय भूमिका देने का रास्ता है, जबकि कुछ इसे “साइडलाइन” करने की कोशिश भी बता रहे हैं।
रणनीतिक बदलाव या मजबूरी?
कांग्रेस के इस कदम को रणनीतिक माना जा रहा है। 2029 के लिए OBC कार्ड खेलना, अनुभवी नेता को केंद्र में लाना और राज्य में नया चेहरा आजमाना—तीनों लक्ष्य एक साथ पूरे करने की कोशिश है।
सिद्धारमैया का फैसला आज या कल साफ हो सकता है। गुरुवार सुबह उनके आवास पर कैबिनेट की ब्रेकफास्ट मीटिंग और उसके बाद संभावित प्रेस कॉन्फ्रेंस से कई राज खुल सकते हैं।
कर्नाटक की यह राजनीतिक हलचल पूरे देश की नजरों में है। अगर कांग्रेस यह ट्रांजिशन सुचारू ढंग से कर पाती है तो 2029 की तैयारी में यह एक मजबूत कदम साबित हो सकता है। वहीं, अगर कलह बढ़ा तो भाजपा के लिए फायदे का सौदा बन सकता है।
कर्नाटक की सियासत फिर मुड़ गई है। अब देखना है कि सिद्धारमैया दिल्ली का रास्ता चुनते हैं या बेंगलुरु में ही रहकर संघर्ष जारी रखते हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-27 May 2026