-Friday World-May 2,2026
अमेरिका ने एक बार फिर भारत की बौद्धिक संपदा नीतियों पर सवाल उठाते हुए उसे '2026 स्पेशल 301 रिपोर्ट' में प्रायोरिटी वॉच लिस्ट में शामिल कर लिया है। यह सूची उन देशों की होती है जहां अमेरिका को IPR (Intellectual Property Rights) के संरक्षण में कमियों का आभास होता है। चीन, रूस, इंडोनेशिया, चिली और वेनेजुएला जैसे देशों के साथ भारत का नाम शामिल होना व्यापारिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस सूची में शामिल होने का मतलब तुरंत प्रतिबंध नहीं है, लेकिन यह अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में दबाव बनाने का काम करता है।
यह रिपोर्ट हर साल अप्रैल के अंत में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) कार्यालय द्वारा जारी की जाती है। इसमें अमेरिका अपने व्यापारिक भागीदार देशों में पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और अन्य बौद्धिक संपदा के कानूनों तथा उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करता है। 2026 की रिपोर्ट में भारत की प्रगति को 'अस्थिर' बताया गया है। अमेरिका का दावा है कि भारत में IPR सुरक्षा अभी भी पर्याप्त नहीं है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान हो रहा है।
भारत की पेटेंट व्यवस्था पर अमेरिका की आपत्ति क्यों?
अमेरिका की सबसे बड़ी शिकायत भारत के पेटेंट एक्ट की धारा 3(d) से जुड़ी है। यह धारा जेनेरिक दवाओं (सामान्य दवाओं) को मजबूत बनाती है। इसके अनुसार, किसी पुरानी दवा में मामूली परिवर्तन (जैसे नया फॉर्म, नया नमक या छोटा-मोटा बदलाव) करके नई पेटेंट हासिल नहीं की जा सकती, जब तक कि उससे दवा की प्रभावकारिता में उल्लेखनीय सुधार न हो।
यह प्रावधान भारत जैसे विकासशील देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनियों का एकाधिकार टूटता है और सस्ती जेनेरिक दवाएं बाजार में उपलब्ध रहती हैं। अमेरिकी फार्मा कंपनियां चाहती हैं कि छोटे-छोटे बदलावों पर भी उन्हें पेटेंट मिले ताकि वे लंबे समय तक उच्च कीमतें वसूल सकें। धारा 3(d) ने कई महंगी दवाओं की जेनेरिक संस्करणों को बाजार में आने से पहले रोका है, जिससे अफ्रीका और एशिया के गरीब देशों में लाखों-करोड़ों मरीजों को सस्ती दवाएं मिल सकी हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में पेटेंट केस लंबे समय तक लंबित रहते हैं। औसतन कई साल लग जाते हैं, जिससे विदेशी कंपनियां निराश होती हैं। इसके अलावा, डेटा सुरक्षा (Data Exclusivity) की कमी को भी बड़ा मुद्दा बताया गया है। अमेरिका चाहता है कि क्लिनिकल ट्रायल डेटा को एक निश्चित अवधि तक संरक्षित रखा जाए ताकि दूसरी कंपनियां उसे आसानी से इस्तेमाल न कर सकें।
ऊंची कस्टम ड्यूटी और नकली उत्पादों की समस्या
रिपोर्ट में भारत द्वारा आईटी उत्पादों, सोलर एनर्जी उपकरणों और मेडिकल डिवाइसेस पर लगाई जा रही ऊंची कस्टम ड्यूटी की भी आलोचना की गई है। अमेरिका का तर्क है कि ये ड्यूटी अमेरिकी निर्यात को प्रभावित करती हैं। साथ ही, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क नियमों के क्रियान्वयन में ढिलाई और बड़े पैमाने पर नकली उत्पादों (काउंटरफिटिंग) की उपलब्धता को भी उठाया गया है।
नकली दवाएं, इलेक्ट्रॉनिक्स और लग्जरी सामान भारतीय बाजार में आम हैं, जो न केवल अमेरिकी ब्रांड्स को नुकसान पहुंचाते हैं बल्कि उपभोक्ता स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा करते हैं। अमेरिका भारत सरकार से इन मुद्दों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है।
एक और बड़ा मुद्दा **कंपलसरी लाइसेंसिंग** का है। भारत के कानून के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य या राष्ट्रीय हित में सरकार किसी भी पेटेंट दवा का लाइसेंस किसी तीसरी कंपनी को दे सकती है। यह प्रावधान महामारी या जीवनरक्षक दवाओं की कमी के समय काम आता है। 2012 में नाटको द्वारा सोराफेनीब (कैंसर दवा) पर कंपलसरी लाइसेंस मिलना इसका उदाहरण है। अमेरिकी कंपनियां इसे अपने मुनाफे पर हमला मानती हैं।
रिपोर्ट में अन्य बड़े बदलाव
2026 रिपोर्ट में कुछ नए विकास भी सामने आए हैं। वियतनाम को 13 वर्षों बाद पहली बार 'प्रायोरिटी फॉरेन कंट्री' कैटेगरी में रखा गया है, जिसके खिलाफ अगले 30 दिनों में जांच शुरू हो सकती है। वहीं अर्जेंटीना को सूची से बाहर कर दिया गया। यूरोपीय संघ (EU) को फार्मास्यूटिकल नियमों की चिंताओं के कारण वॉच लिस्ट में शामिल किया गया है।
ये बदलाव दर्शाते हैं कि अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपनी कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए लगातार दबाव बनाए रख रहा है।
भारत का पक्ष: सस्ती दवाएं और विकासशील देशों की जरूरतें
भारत खुद को 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' कहता है। यहां बनी जेनेरिक दवाएं दुनिया भर के विकासशील देशों को सस्ते में उपलब्ध होती हैं। TRIPS समझौते (WTO) के तहत विकासशील देशों को कुछ छूट दी गई है ताकि वे जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे सकें। भारत इसी संतुलन को बनाए रखना चाहता है।
अगर IPR नियमों को बहुत सख्त कर दिया जाए तो लाखों गरीब मरीजों को महंगी दवाएं नहीं मिल पाएंगी। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने वैक्सीन और दवाओं के उत्पादन एवं निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसलिए भारत का तर्क है कि IPR सुरक्षा और जन स्वास्थ्य के बीच संतुलन जरूरी है।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर प्रभाव
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले से ही मजबूत है। दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का कारोबार होता है। IPR मुद्दा अगर बढ़ा तो टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, निवेश और सेवा क्षेत्र पर असर पड़ सकता है। अमेरिका भारत को महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार मानता है, खासकर चीन के मुकाबले में। ऐसे में यह रिपोर्ट व्यापार वार्ताओं में लीवरेज के रूप में इस्तेमाल की जा सकती है।
भारत सरकार को अब मजबूत कदम उठाने होंगे – पेटेंट केसों का निपटारा तेज करना, डेटा सुरक्षा कानूनों को मजबूत करना और नकली उत्पादों पर सख्ती बढ़ाना। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने पक्ष को प्रभावी ढंग से रखना होगा।
आगे क्या?
यह रिपोर्ट सिर्फ चेतावनी है, लेकिन लंबे समय में अगर विवाद सुलझाया नहीं गया तो व्यापार संबंध प्रभावित हो सकते हैं। भारत को अपनी IPR व्यवस्था को और पारदर्शी तथा कुशल बनाना होगा बिना जन स्वास्थ्य से समझौता किए। अमेरिका को भी विकासशील देशों की वास्तविकताओं को समझना चाहिए।
दोनों देशों के बीच संवाद और समझौते से ही इस मुद्दे का समाधान निकल सकता है। भारत की मजबूत फार्मा इंडस्ट्री और अमेरिका की इनोवेशन क्षमता – अगर दोनों साथ आएं तो वैश्विक स्तर पर फायदेमंद साबित हो सकता है।
प्रायोरिटी वॉच लिस्ट में भारत का नाम शामिल होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार यह याद दिलाता है कि IPR एक जटिल मुद्दा है जिसमें आर्थिक हित, सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीतियां आपस में उलझी हुई हैं। भारत को अपनी विकासशील अर्थव्यवस्था की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए सुधार करने होंगे। अमेरिका को भी सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहिए।
वैश्विक व्यापार में जीत-जीत का समाधान ही टिकाऊ होता है। आशा है कि दोनों देश आगे आने वाले दिनों में सकारात्मक वार्ता के जरिए इस विवाद को सुलझा लेंगे और मजबूत आर्थिक साझेदारी को और आगे बढ़ाएंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-May 2,2026