फोटोग्राफ R Redmark के सौजन्य से
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर से आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह सिर्फ़ बंधुआ मज़दूरी का केस नहीं है। यह गुलामी की उस बर्बर सच्चाई का चेहरा है जिसे हम 21वीं सदी में खत्म मान चुके थे।
13 मज़दूर किसी तरह जान बचाकर बाहर आए हैं। 3 की हत्या करके गाड़ दिया गया। जो बचकर आए हैं, उनकी आपबीती सुनकर रूह काँप जाती है।
क्या हुआ मुज़फ़्फ़रनगर में?
मामला मुज़फ़्फ़रनगर के एक ईंट भट्ठे और फार्म हाउस से जुड़ा है। आरोप है कि ठेकेदार अंकित बालियान और उसके गुर्गों ने 16 मज़दूरों को बंधक बनाकर रखा। इनमें महिलाएँ भी शामिल थीं।
मज़दूरों ने बताया:
1. मज़दूरी के नाम पर ज़हर: दिन भर 14-16 घंटे काम कराया जाता। मज़दूरी मांगने पर सूखी रोटी और मवेशियों का चारा खाने को दिया जाता।
2. कोड़े, भाले और कुत्ते: काम में ज़रा सी ढील पर कोड़ों से पीटा जाता। धारदार हथियार, भाले से हमला किया जाता। सबसे खौफनाक — विरोध करने वालों को पालतू कुत्तों से कटवाया जाता।
3. हत्या और दफ़न: जिन 3 मज़दूरों ने भागने की कोशिश की या ज्यादा विरोध किया, उन्हें मारकर वहीं खेत में गाड़ दिया गया। बाकी 13 मज़दूर किसी तरह मौका पाकर भाग निकले और पुलिस तक पहुँचे।
यह सिर्फ़ अपराध नहीं, सिस्टम की नाकामी है
बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन अधिनियम 1976 के तहत यह गैर-कानूनी है। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि बंधुआ मज़दूरी संविधान के अनुच्छेद 21 यानी 'गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार' का सीधा उल्लंघन है।
सवाल ये है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी, 'बुलडोजर न्याय' के दौर में भी, एक जिले में 16 लोग महीनों तक बंधक बने रहे और स्थानीय प्रशासन को भनक तक नहीं लगी? यह लापरवाही नहीं, व्यवस्था की आपराधिक विफलता है।
जब गरीब की चीख थाने तक नहीं पहुँचती, जब श्रम विभाग की आँखें ईंट भट्ठों पर बंद रहती हैं, तभी अंकित बालियान जैसे लोग 'मालिक' बनकर इंसानों को जानवर समझने की हिम्मत करते हैं।
अब क्या होना चाहिए? 4 कदम जो ज़रूरी हैं
1. सबसे सख्त सज़ा: आरोपियों पर बंधुआ मज़दूरी कानून, SC-ST एक्ट, हत्या, हत्या का प्रयास, गैंगस्टर एक्ट के तहत केस चलें। फास्ट ट्रैक कोर्ट में 6 महीने में सज़ा हो। ऐसी मिसाल बने कि कोई दोबारा गरीब को गुलाम समझने से पहले सौ बार सोचे।
2. प्रशासन की जवाबदेही: उस इलाके के श्रम अधिकारी, थानाध्यक्ष और राजस्व कर्मचारियों की भूमिका की जांच हो। ड्यूटी में लापरवाही साबित होने पर निलंबन नहीं, बर्खास्तगी हो।
3. पीड़ितों का पुनर्वास: बचे हुए 13 मज़दूरों को तत्काल 3 लाख रुपये की पुनर्वास राशि, घर, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड और बच्चों की मुफ्त शिक्षा दी जाए। केंद्र की 'बंधुआ मज़दूर पुनर्वास योजना' के तहत यह उनका हक है।
4. व्यापक अभियान: पूरे पश्चिमी यूपी के ईंट भट्ठों, खेतों और फैक्ट्रियों में श्रम विभाग और NGOs का संयुक्त सर्वे चले। 2026 में भी अगर कहीं बंधुआ मज़दूर मिले तो यह पूरे समाज के मुँह पर तमाचा है।
बुलडोजर का इंसाफ़ कब?
मुज़फ़्फ़रनगर की इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक ही सवाल गूंज रहा है — 'हम देखते हैं योगी जी बुलडोजर कब चलवाते हैं, अपराधी अंकित बालियान के घर पर?'
सवाल वाजिब है। जब सरकार माफिया की अवैध संपत्ति पर बुलडोजर चलवा सकती है, तो उन दरिंदों के घर पर क्यों नहीं जो इंसानों को कुत्तों से कटवाते हैं? कानून सबके लिए बराबर है। अगर अवैध निर्माण है तो कार्रवाई हो। लेकिन न्याय का पहला तकाज़ा है — पीड़ितों को इंसाफ़, दोषियों को सज़ा।
बुलडोजर प्रतीक है। असली न्याय तब होगा जब अंकित बालियान और उसके साथी जेल की सलाखों के पीछे उम्र कैद काटें।
यह हमला मज़दूर पर नहीं, संविधान पर है
बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान में बेगारी और बंधुआ मज़दूरी को खत्म करने के लिए अनुच्छेद 23 लिखा था। मुज़फ़्फ़रनगर की घटना उस अनुच्छेद पर सीधा हमला है। यह हमला दलित, पिछड़े, आदिवासी और गरीब मज़दूर की गरिमा पर है।
आज 13 मज़दूर बच गए हैं। वे गवाह हैं। उनकी टूटी पसलियाँ, शरीर पर कुत्तों के काटने के निशान और आँखों का खौफ — ये सबूत है कि 'गुलामी' अभी मरी नहीं है। वो रूप बदलकर हमारे बीच ज़िंदा है।
अगर आज हम चुप रहे, तो कल किसी और जिले से ऐसी ही खबर आएगी। फर्क सिर्फ़ नाम का होगा, दरिंदगी वही रहेगी।
इसलिए आवाज़ उठाइए। प्रशासन से सवाल पूछिए। दोषियों के लिए फांसी से कम की मांग मत कीजिए। क्योंकि जब तक एक भी मज़दूर बंधुआ है, तब तक देश की आज़ादी अधूरी है।
मानव तस्करी, बंधुआ मज़दूरी या बाल श्रम दिखे तो तुरंत 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन या 112 पर कॉल करें। आपकी एक कॉल किसी की ज़िंदगी बचा सकती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 27 Jun 2027