-Friday World 27 Jun 2026
सोनम_वांगचुक स्विट्ज़रलैंड जा रहे हैं... हमेशा के लिए?
नहीं। लेकिन सवाल यही है कि क्यों एक वैज्ञानिक को अपना घर छोड़कर जाना पड़े, सिर्फ इसलिए कि वह सवाल पूछता है?
लद्दाख की बर्फीली वादियों से निकलकर दुनिया को 'आइस स्तूप' का आईडिया देने वाले, शिक्षा में नवाचार करने वाले सोनम वांगचुक इन दिनों फिर चर्चा में हैं। वजह है स्विट्ज़रलैंड में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के भविष्य पर होने वाला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन।
खुद सोनम बताते हैं कि जब वे वीज़ा के लिए स्विस एंबेसी पहुँचे तो वहां का नज़ारा कुछ और था। गर्मजोशी से स्वागत, 5 साल का वीज़ा और वीज़ा फीस भी माफ। अधिकारियों ने कहा — "यह हमारे लिए सम्मान की बात है कि आप हमारे देश आ रहे हैं।"
एक पराया देश, जो विचार सुनना चाहता है
एक अपना देश, जो विचार से डरता है
विडंबना देखिए। जो देश सोनम को सुनने के लिए पलक-पाँवड़े बिछाता है, वहां उन्हें 'ग्लोबल थिंकर' कहा जाता है। और जिस मिट्टी ने उन्हें पैदा किया, वहां अक्सर उन्हें 'राष्ट्रविरोधी', 'देशद्रोही' या 'सिस्टम-विरोधी' का तमगा थमा दिया जाता है।
क्यों?
क्योंकि सोनम वांगचुक सिर्फ़ इनोवेटर नहीं हैं। वे सवाल भी करते हैं। लद्दाख के बच्चों की शिक्षा पर, हिमालय के सिकुड़ते ग्लेशियर पर, 6th शेड्यूल पर, पर्यावरण नीतियों पर। और हमारे दौर में सबसे बड़ा गुनाह यही है — सत्ता से सवाल करना।
सम्मान की शर्त: चुप रहो
हमारे यहाँ का दस्तूर साफ़ है। वैज्ञानिक, शिक्षक, कलाकार, विचारक — सबका सम्मान तब तक है जब तक वे सत्ता की मशीन के पुर्जे बने रहें। तब तक मंच मिलेगा, पुरस्कार मिलेंगे, 'राष्ट्र का गौरव' का सर्टिफिकेट मिलेगा।
लेकिन जिस दिन आपने जनता की तरफ से, पर्यावरण की तरफ से, संविधान की तरफ से सवाल उठा दिया, आप 'समस्या' बन जाते हैं। आपकी नीयत पर शक, आपके फंडिंग पर सवाल, आपके विदेश जाने पर बहस।
सोनम वांगचुक का केस कोई पहला नहीं है। इतिहास गवाह है — जो भी अपने वक्त से आगे सोचता है, सिस्टम पहले उसे इग्नोर करता है, फिर उसका मज़ाक उड़ाता है, फिर विरोध करता है, और अंत में उसे अपनाता है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
लोकतंत्र की असली ताकत क्या है?
टैंक, मिसाइल, बुलेट ट्रेन, 100 मंज़िला इमारतें — ये किसी देश की ताकत हो सकती हैं। पर लोकतंत्र की असली ताकत उसके विचार होते हैं। असहमति को सुनने का साहस होता है।
जब कोई देश अपने वैज्ञानिकों से डरने लगे, अपने शिक्षकों को संदिग्ध मानने लगे, अपने छात्रों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' कहने लगे — तो समझिए वो देश वैचारिक रूप से पतन की ओर है।
लद्दाख आज सिर्फ़ बॉर्डर नहीं है। वो क्लाइमेट चेंज की सबसे पहली प्रयोगशाला है। वहां ग्लेशियर पिघल रहे हैं, पानी का संकट बढ़ रहा है, पलायन हो रहा है। अगर वहां का बेटा, वहां का वैज्ञानिक, इन मुद्दों पर नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा?
सोनम लौटेंगे या नहीं?
ये उनका निजी फैसला है। लेकिन एक समाज के तौर पर हमें सोचना होगा — हमने अपने बेस्ट माइंड्स के लिए कैसा माहौल बनाया है? क्या हमने उन्हें सिर्फ़ ताली बजाने वाली भीड़ का हिस्सा बनने की शर्त पर रखा है?
मुझे यकीन है, सोनम वांगचुक लौटेंगे। क्योंकि मिट्टी से रिश्ता वीज़ा से बड़ा होता है। वे लौटकर फिर उसी काम में जुट जाएंगे — बच्चों को पढ़ाना, ग्लेशियर बचाना, सिस्टम से सवाल करना।
क्योंकि ज़रूरी सवाल पूछने वाले सम्मान- अपमान के मोहताज नहीं होते।
सवाल ज़िंदा है तो लोकतंत्र ज़िंदा है
ठीक वैसे ही, जैसे लिखने वाला गालियाँ खाकर भी लिखता है। ट्रोल होने पर भी बोलता है। क्योंकि सवाल सरकार से कम, सिस्टम से ज़्यादा हैं।
सरकारें आती-जाती रहेंगी। पार्टियां बदलती रहेंगी। कांग्रेस के दौर में भी सवाल पूछे गए थे, आज भी पूछे जा रहे हैं।
पर अगर आप सिस्टम से सवाल करना बंद कर दें, तो समझिए —
1. या तो आप चाटुकार हो गए हैं
2. या आप बौद्धिक रूप से दिवालिया हो गए हैं
3. या आप बिक गए हैं
4. या फिर आपकी आत्मा मर चुकी है
स्विट्ज़रलैंड का वीज़ा बनाम हिंदुस्तान का नज़रिया
स्विस एंबेसी का 5 साल का वीज़ा सोनम वांगचुक की जीत नहीं है। ये हमारे सिस्टम की हार है। जब दुनिया का कोई देश आपके वैज्ञानिक को हाथों-हाथ लेता है और आप उसे शक की निगाह से देखते हैं, तो समस्या वैज्ञानिक में नहीं, नज़रिए में है।
लद्दाख को 6th शेड्यूल चाहिए या नहीं, विकास किस कीमत पर हो, टूरिज्म बनाम इकोलॉजी — इन पर बहस हो सकती है। असहमति हो सकती है। पर बहस को 'देशद्रोह' बनाकर आपने लोकतंत्र की हत्या ही की है।
आखिरी बात
सोनम वांगचुक कोई नेता नहीं हैं। कोई पार्टी नहीं चलाते। उनके पास बस एक आइडिया है — 'Education, Environment, Entrepreneurship'। और एक ज़िद है — सवाल पूछने की।
अगर हम एक ऐसे समाज में बदल गए हैं जहां सवाल पूछना अपराध है, तो फिर स्कूल-कॉलेज बंद कर दीजिए। क्योंकि शिक्षा का पहला पाठ ही होता है — 'क्यों?'
जिस दिन हमने 'क्यों' पूछना छोड़ दिया, उस दिन हम नागरिक नहीं, प्रजा बन जाएंगे। और प्रजा को लोकतंत्र नहीं, राजा चाहिए।
सोनम जाएंगे, सम्मान पाएंगे, बोलेंगे और लौट आएंगे। सवाल ये नहीं है कि वे क्या करेंगे। सवाल ये है कि हम क्या करेंगे? ताली बजाएंगे या गाली देंगे? सुनेंगे या संदेह करेंगे?
क्योंकि अंत में देश इमारतों से नहीं, विचारों से बनते हैं। और विचार वहीं पनपते हैं जहां सवालों को फूलों की तरह उगने दिया जाए, रौंदा न जाए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 27 Jun 2026