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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Saturday, 20 June 2026

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा
- Friday World 20 Jun 2026
तेहरान-ब्यूरो
39 दिनों तक चले भीषण टकराव के बाद आखिरकार अमेरिका ने ईरान की शर्तों पर समझौता कर लिया है। 28 फरवरी को शुरू हुआ यह संघर्ष सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं था, बल्कि इसने पूरी दुनिया की शक्ति-समीकरण को हिला दिया। युद्धविराम की स्याही सूखने से पहले ही विश्लेषक मान रहे हैं कि मिडिल ईस्ट अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।

कैसे शुरू हुई 39 दिन की जंग?  
28 फरवरी की सुबह खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंचा। अमेरिकी दबाव और इजरायल की रणनीतिक चालों के जवाब में ईरान ने सीधा मोर्चा खोल दिया। तेहरान ने साफ किया कि वह अब छद्म युद्ध नहीं, सीधी टक्कर के लिए तैयार है। इसके बाद जो हुआ उसने 1945 के बाद पहली बार किसी देश को अमेरिका के सामने इस तरह अड़ते देखा।

ईरान ने एक साथ कई मोर्चे खोले। कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत पर भयानक मिसाइल हमलों की झड़ी लगा दी गई। तेहरान का दावा था कि ये हमले आत्मरक्षा और बदले के अधिकार के तहत हैं। इन हमलों ने खाड़ी देशों की ऊर्जा सप्लाई लाइनों को बुरी तरह तोड़ दिया। तेल के कुएं, रिफाइनरी और शिपिंग रूट निशाने पर आए। कुछ ही दिनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मच गया। 

अमेरिका को क्यों झुकना पड़ा? 
युद्ध के पहले हफ्ते में ही वॉशिंगटन को अहसास हो गया कि यह 2003 का इराक या 2001 का अफगानिस्तान नहीं है। ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन स्वॉर्म और क्षेत्रीय मिलिशिया नेटवर्क ने अमेरिकी ठिकानों को लगातार नुकसान पहुंचाया। पेंटागन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि ईरान लड़ाई को लंबा खींचने की रणनीति पर था। हर गुजरते दिन के साथ अमेरिका के सहयोगी देशों में घबराहट बढ़ रही थी।

खाड़ी देशों में हुई मौतों और बुनियादी ढांचे की तबाही ने अमेरिका पर अंदरूनी दबाव बना दिया। सऊदी अरब और यूएई ने वॉशिंगटन से कहा कि या तो युद्ध रोको, या फिर वे खुद अलग रास्ता चुनेंगे। यूरोप में भी तेल संकट गहराने लगा। घरेलू स्तर पर अमेरिकी प्रशासन पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 39वें दिन अमेरिका ने माना कि सैन्य जीत की कीमत अब कूटनीतिक हार से ज्यादा है।

इजरायल का छद्मजाल कैसे टूटा?
पिछले दो दशक से इजरायल ने ईरान को घेरने के लिए खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा गठजोड़ बनाए थे। अब्राहम समझौते इसी रणनीति का हिस्सा थे। लेकिन 28 फरवरी के बाद ईरान ने सीधे उन देशों पर हमला किया जिन्हें इजरायल अपना सुरक्षा कवच मानता था। संदेश साफ था: तेहरान अब प्रॉक्सी नहीं, प्रिंसिपल से लड़ेगा। 

इन हमलों ने इजरायल की डिटरेंस नीति को ध्वस्त कर दिया। तेल अवीव को समझ आ गया कि ईरान अब हर लाल रेखा पार करने को तैयार है। नतीजा यह हुआ कि इजरायल युद्ध के आखिरी 10 दिनों में पूरी तरह रक्षात्मक हो गया और अमेरिका पर युद्धविराम का दबाव बनाने लगा।

GCC की भूमिका और कतर की मध्यस्थता
युद्ध जितना तेजी से भड़का, उतनी ही तेजी से कूटनीति भी सक्रिय हुई। खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों में मतभेद उभर आए। ओमान और कुवैत शुरू से ही तनाव कम करने के पक्ष में थे। लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई कतर ने। दोहा ने तेहरान और वॉशिंगटन के बीच गुप्त चैनल खोला। 

कतर के अमीर ने खुद कई दौर की बातचीत की मेजबानी की। सऊदी अरब ने भी आखिरी हफ्ते में रुख नरम किया क्योंकि उसके तेल संयंत्रों पर हमलों से अरामको का उत्पादन 40% तक गिर गया था। GCC को अहसास हुआ कि अमेरिका की छतरी अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। इसलिए क्षेत्रीय समाधान ही एकमात्र रास्ता बचा।

समझौते की बड़ी शर्तें क्या हैं? 
हालांकि पूरा दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन तीन बड़ी बातें सामने आई हैं:  

1. प्रतिबंधों में ढील: अमेरिका ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर लगे प्रमुख प्रतिबंध हटाएगा।  

2. क्षेत्रीय सुरक्षा गारंटी: ईरान खाड़ी में और हमले न करने पर सहमत हुआ है, बशर्ते उसकी सुरक्षा चिंताओं को मान्यता मिले।  

3. परमाणु निगरानी का नया फॉर्मूला: ईरान सीमित निरीक्षण के लिए तैयार हुआ है, लेकिन संवर्धन पर उसकी संप्रभुता बनी रहेगी।  

तेहरान इसे अपनी जीत बता रहा है। राष्ट्रपति कार्यालय से जारी बयान में कहा गया कि ईरान ने साबित कर दिया कि सुपरपावर को भी झुकाया जा सकता है।

मिडिल ईस्ट में अब कौन होगा असली सुल्तान?
युद्ध के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है। ईरान अब खुद को प्रतिरोध की धुरी के केंद्र के तौर पर पेश कर रहा है। उसने दिखा दिया कि वह इजरायल और अमेरिका के गठजोड़ को सैन्य तौर पर चुनौती दे सकता है। यमन से लेबनान तक उसके समर्थक समूहों का मनोबल बढ़ा है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब है। युद्ध में सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान रियाद को ही हुआ। लेकिन क्राउन प्रिंस अब दोहरी रणनीति पर हैं। एक तरफ वे कतर और ओमान के साथ मिलकर ईरान से तनाव कम करना चाहते हैं, ताकि विजन 2030 बचे। दूसरी तरफ वे इस्लामिक दुनिया के सुन्नी नेतृत्व का दावा नहीं छोड़ना चाहते। 

इसलिए अगला दशक तेहरान और रियाद के बीच वर्चस्व की शांत लड़ाई का होगा। जो देश ज्यादा स्थिरता, आर्थिक मौके और सुरक्षा देगा, इस्लामिक दुनिया उसी के पीछे लामबंद होगी। ईरान के पास अब सैन्य मनोबल है। सऊदी के पास तेल और मक्का-मदीना की कस्टोडियनशिप है।

अमेरिका के पीछे हटने के दूरगामी असर

1. डॉलर का दबदबा कमजोर: तेल व्यापार अब सिर्फ डॉलर में नहीं होगा। ईरान-चीन-रूस पहले से ही वैकल्पिक मुद्रा पर काम कर रहे हैं।  

2. नाटो सहयोगियों में शक: यूरोपीय देश अब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को सौ फीसदी नहीं मानेंगे।  

3. चीन की एंट्री: बीजिंग युद्धविराम के तुरंत बाद पुनर्निर्माण पैकेज लेकर खाड़ी पहुंच गया है।  

4. हथियारों की नई दौड़: सऊदी, यूएई और कतर अब आत्मनिर्भर रक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करेंगे।  

भारत समेत एशिया के लिए मतलब
भारत के लिए यह दोधारी तलवार है। एक तरफ ईरान से चाबहार और तेल व्यापार आसान होगा। दूसरी तरफ खाड़ी में अस्थिरता से 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और रेमिटेंस पर खतरा रहेगा। भारत को अब तेहरान और रियाद दोनों के साथ संतुलन बनाना होगा।

 एक युग का अंत, दूसरे का आगाज

39 दिन की जंग ने साबित किया कि 21वीं सदी में सिर्फ सैन्य बजट से सुपरपावर नहीं बना जाता। सहनशक्ति, क्षेत्रीय पकड़ और जोखिम उठाने की हिम्मत भी मायने रखती है। ईरान ने वह हिम्मत दिखाई। अमेरिका ने व्यावहारिकता चुनी। 

अब मिडिल ईस्ट वॉशिंगटन की छाया से निकलकर अपने फैसले खुद लेगा। असली सुल्तान कौन होगा, इसका फैसला मिसाइलों से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कूटनीति और अवाम के भरोसे से होगा। तेहरान ने जंग जीती है, लेकिन वर्चस्व की जंग अभी बाकी है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 20 Jun 2026