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Saturday, 20 June 2026

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'
- Friday World 20 Jun 2026
अमेरिका की विदेश नीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान ने लैटिन अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ट्रंप प्रशासन की नजरें क्यूबा पर टिक गई हैं। एक प्राइवेट इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो क्यूबा में भी अमेरिका वैसा ही अभियान चला सकता है जैसा वेनेजुएला में चलाया गया था। 

ट्रंप का बयान: 'क्यूबा अमेरिका के बहुत करीब है'
इंटरव्यू के दौरान जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या क्यूबा में संभावित अमेरिकी ऑपरेशन वेनेजुएला जैसा हो सकता है, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया - 'संभव है।' ट्रंप ने कहा कि क्यूबा की भौगोलिक स्थिति उसे अलग बनाती है। यह देश अमेरिका से सिर्फ 90 मील दूर है। इसलिए वहां की कोई भी अस्थिरता सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा हितों को प्रभावित करती है। 

हालांकि ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि उनकी पहली प्राथमिकता हमेशा शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन ही रहेगी। लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो सैन्य विकल्पों को भी टेबल से हटाया नहीं गया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ महीनों से अमेरिका लगातार क्यूबा पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है।

अमेरिका का बढ़ता दबाव: प्रतिबंधों से लेकर सैन्य चेतावनी तक
रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने हवाना पर नए प्रतिबंधों का ऐलान किया है। इन प्रतिबंधों का मकसद क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बनाना है। अमेरिका ने क्यूबा को खुली चेतावनी दी है कि अगर उसने ऐसे हथियार हासिल करने की कोशिश की जो अमेरिकी क्षेत्र या ग्वांतानामो बे में स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे के लिए खतरा बन सकते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि क्यूबा रूस और चीन के साथ अपने रक्षा संबंध बढ़ा रहा है। ग्वांतानामो बे के इतने करीब किसी विरोधी देश की सैन्य मौजूदगी वाशिंगटन के लिए अस्वीकार्य है। इसलिए अमेरिका पहले से ही 'प्लान B' पर काम कर रहा है। 

'प्लान B' क्या है? सैन्य और राजनयिक दोनों विकल्प खुले 
ट्रंप ने इंटरव्यू में बताया कि उनकी टीम ने क्यूबा में संभावित अस्थिरता की स्थिति से निपटने के लिए कई योजनाएं तैयार की हैं। इनमें राजनयिक दबाव, आर्थिक नाकेबंदी को और सख्त करना, और अंतिम विकल्प के रूप में सीमित सैन्य कार्रवाई शामिल है। 

ट्रंप प्रशासन के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, अगर क्यूबा में जन आंदोलन तेज होता है या सरकार कमजोर पड़ती है, तो अमेरिका 'मानवीय हस्तक्षेप' के नाम पर कदम उठा सकता है। 1961 के बे ऑफ पिग्स आक्रमण की नाकामी के बाद अमेरिका सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है। लेकिन ट्रंप की भाषा से लगता है कि वे पुरानी नीतियों को बदलने से नहीं हिचकिचाएंगे।

ईरान से तुलना: 'क्यूबा का केस अलग है'
ट्रंप ने क्यूबा की स्थिति की तुलना हाल ही में ईरान पर किए गए अभियान से भी की। उन्होंने कहा कि ईरान वाला ऑपरेशन बहुत बड़े स्तर का था। उसमें ज्यादा हथियार, ज्यादा संसाधन और लंबी दूरी की रणनीति शामिल थी। 

इसके उलट क्यूबा अमेरिका के दरवाजे पर है। फ्लोरिडा से इसकी दूरी इतनी कम है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई लॉजिस्टिक रूप से आसान होगी। ट्रंप के शब्दों में, 'भौगोलिक रूप से क्यूबा हमारे लिए ज्यादा सुविधाजनक है।' इस बयान को विशेषज्ञ क्यूबा के लिए सीधी धमकी के रूप में देख रहे हैं।

क्या वेनेजुएला मॉडल क्यूबा में चलेगा?
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की क्यूबा रणनीति काफी हद तक 'वेनेजुएला मॉडल' जैसी दिखती है। वेनेजुएला में अमेरिका ने निकोलस मादुरो सरकार पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई थी। इसमें कड़े आर्थिक प्रतिबंध, विपक्षी नेता हुआन गुआइदो को समर्थन, और पड़ोसी देशों के जरिए कूटनीतिक अलगाव शामिल था। साथ ही समय समय पर सैन्य कार्रवाई के संकेत भी दिए गए थे।

लेकिन क्यूबा और वेनेजुएला में बड़ा फर्क है। क्यूबा में कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ 1959 से बेहद मजबूत है। फिदेल कास्त्रो के बाद राउल कास्त्रो और अब मिगुएल डियाज-कनेल के नेतृत्व में सरकार ने हर अमेरिकी दबाव को झेला है। दूसरा फर्क यह है कि क्यूबा को रूस, चीन और लैटिन अमेरिका के कई देशों का खुला समर्थन हासिल है। वेनेजुएला की तरह क्यूबा आर्थिक रूप से पूरी तरह ढहा हुआ नहीं है, हालांकि वहां भी हालात कठिन हैं।

60 साल पुरानी दुश्मनी की नई किस्त
अमेरिका और क्यूबा के रिश्ते 1959 की क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। 1962 का मिसाइल संकट दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर ले आया था। इसके बाद से अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। ओबामा के समय में रिश्तों में थोड़ी नरमी आई थी। राजनयिक संबंध बहाल हुए और कुछ पाबंदियां हटी थीं। 

लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल में ये सभी प्रयास पलट दिए गए। बाइडेन प्रशासन ने भी कोई बड़ी राहत नहीं दी। अब ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद क्यूबा नीति और आक्रामक हो गई है। क्यूबा सरकार इसे 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' का नया रूप बता रही है। हवाना का कहना है कि अमेरिका क्यूबा के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है।

लैटिन अमेरिका में चिंता: 'क्या मोनरो डॉक्ट्रिन की वापसी हो रही है?'
ट्रंप के बयान के बाद पूरे लैटिन अमेरिका में बेचैनी है। मेक्सिको, ब्राजील और कोलंबिया जैसे बड़े देशों ने कहा है कि किसी भी देश में सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरनाक होगा। 19वीं सदी की 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के तहत अमेरिका लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता रहा है। 

विश्लेषकों को डर है कि ट्रंप उसी सोच को 21वीं सदी में वापस ला रहे हैं। वेनेजुएला में नाकामी के बाद क्यूबा को निशाना बनाना यह दिखाता है कि अमेरिका अब 'रिजीम चेंज' की नीति को खुलकर अपना रहा है। 

आगे क्या? समयसीमा पर सस्पेंस बरकरार
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या और कब अमेरिका क्यूबा में कार्रवाई करेगा। ट्रंप ने इस पर कोई समयसीमा नहीं दी। उन्होंने कहा कि स्थिति 'फ्लेक्सिबल' है और फैसले हालात देखकर लिए जाएंगे। इसका मतलब है कि वाशिंगटन हवाना के हर कदम पर नजर रख रहा है। 

अगर क्यूबा में आर्थिक संकट गहराता है, बड़े प्रदर्शन होते हैं, या सरकार रूस से कोई बड़ा रक्षा समझौता करती है, तो अमेरिका बहाने के तौर पर कार्रवाई कर सकता है। 2026 अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले विदेश नीति में एक 'बड़ी जीत' दिखाना भी ट्रंप की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

क्यूबा की तैयारी: 'हम किसी धमकी से नहीं डरते' 
उधर क्यूबा ने भी सख्त रुख अपनाया है। राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कनेल ने कहा कि क्यूबा की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा। क्यूबा की सेना को अलर्ट पर रखा गया है। रूस और चीन ने भी बयान जारी कर कहा है कि वे क्यूबा के साथ खड़े हैं। 

क्यूबा की जनता में भी मिली जुली प्रतिक्रिया है। सरकार समर्थक इसे अमेरिकी दादागिरी बता रहे हैं। वहीं सरकार विरोधी गुटों को उम्मीद है कि अमेरिकी दबाव से बदलाव का रास्ता खुलेगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि बाहरी दबाव से क्यूबा की सरकार और मजबूत होती रही है।

: लैटिन अमेरिका बना नया शीत युद्ध का मैदान  
ट्रंप का क्यूबा को लेकर दिया गया बयान सिर्फ एक धमकी नहीं है। यह अमेरिकी विदेश नीति के बड़े बदलाव का संकेत है। वेनेजुएला, ईरान और अब क्यूबा, तीनों मामलों में ट्रंप प्रशासन का संदेश साफ है: जो देश अमेरिकी हितों के खिलाफ जाएगा, उसे परिणाम भुगतने होंगे। 

चाहे वह आर्थिक प्रतिबंध हों या सैन्य कार्रवाई, अमेरिका अब 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को आक्रामक तरीके से लागू कर रहा है। इससे लैटिन अमेरिका एक बार फिर महाशक्तियों के टकराव का अखाड़ा बन सकता है। आने वाले महीने तय करेंगे कि ट्रंप की धमकी बयानबाजी तक सीमित रहती है या क्यूबा वाकई वेनेजुएला और ईरान के बाद अमेरिका का अगला युद्धक्षेत्र बनता है। 

फिलहाल इतना तय है कि कैरेबियन सागर में सियासी तापमान बढ़ चुका है। हवाना से वाशिंगटन तक, सबकी नजरें अब इसी पर टिकी हैं कि अगला कदम कौन उठाता है। शांति से सत्ता परिवर्तन होगा या टकराव होगा, इसका जवाब सिर्फ वक्त देगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 20 Jun 2026