अरे वाह! बिहार के “सुशासन बाबू” आखिरकार सुशासन की कुर्सी छोड़कर दिल्ली की सड़कों पर “मार्गदर्शन” देने निकल पड़े हैं। दो दशक से ज्यादा समय तक बिहार की सत्ता पर राज करने वाले नीतीश कुमार अब राज्यसभा सांसद बन चुके हैं। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा, सम्राट चौधरी को सत्ता सौंपना और खुद को “मार्गदर्शक मंडल” की ओर बढ़ते देखना – यह सब कुछ इतना सहज और स्वाभाविक लग रहा है जितना कोई राजनीतिक ड्रामा कभी नहीं होता। सवाल यह है: क्या यह बिहार से दिल्ली की ओर एक नया अध्याय है, या राज्य की सीमाओं के अंदर ही राजनीतिक करियर का आखिरी पन्ना?
व्यंग्य की बात यह कि जो नेता कभी “मोदी के विकल्प” बनने का सपना देखते थे, आज उसी NDA के अंदर “मार्गदर्शक” की भूमिका निभाने को तैयार हैं। राजनीति में उम्र तो बस एक नंबर है, लेकिन “मार्गदर्शक मंडल” में शामिल होना अक्सर सत्ता से अलविदा कहने का शानदार तरीका होता है।
नीतीश कुमार आजकल कहाँ हैं?
अप्रैल 2026 में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और राज्यसभा के लिए शपथ ली। अब वे बिहार से राज्यसभा सांसद हैं। मंत्रीमंडल? नहीं, बिहार का नया मंत्रीमंडल सम्राट चौधरी (बीजेपी) के नेतृत्व में चल रहा है, जिसमें नीतीश के बेटे निशांत कुमार भी शामिल हैं।
पिता सत्ता से “मार्गदर्शन” मोड में चले गए और बेटा कैबिनेट में जगह बना रहा – परिवारवाद का यह नया रूप भी कम दिलचस्प नहीं। नीतीश कुमार अब दिल्ली में हैं, जहां वे JD(U) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हुए हैं और NDA की रणनीतियों पर “सलाह” दे रहे हैं।
LK आडवाणी से मुलाकात: पुरानी यादें या नया संदेश?
नीतीश कुमार ने LK आडवाणी से मुलाकात की थी – यह खबर पुरानी नहीं है, बल्कि बिहार रत्न वाले दौर की याद दिलाती है। जब आडवाणी को भारत रत्न मिला, नीतीश दिल्ली पहुंचे और गुरु-शिष्य वाली मुलाकात हुई। लेकिन आज के संदर्भ में यह मुलाकात प्रतीकात्मक लगती है। आडवाणी खुद “मार्गदर्शक” की भूमिका में रहे, और अब नीतीश भी उसी राह पर। क्या यह संकेत है कि नीतीश भी अब “वयोवृद्ध” सलाहकार बनकर खुश हैं?
मार्गदर्शक मंडल में कौन-कौन?
बीजेपी का मार्गदर्शक मंडल (जिसे अक्सर “रिटायरमेंट होम” कहा जाता है) पहले ही कई दिग्गजों को समेट चुका है – LK आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जॉर्ज फर्नांडीस (स्वर्गीय) जैसे नाम। अब नीतीश कुमार का नाम भी चर्चाओं में है।
राजनीतिक गलियारों में कयासबाजी जोरों पर है कि नीतीश को भी इसी मंडल में शामिल किया जाएगा, जहां अनुभव की बातें होंगी लेकिन फैसले दूसरे लोग लेंगे। व्यंग्य यह कि जो नेता कभी अपनी पार्टी की कमान संभालते थे, अब “सलाहकार” बनकर दूसरों के फैसलों पर मुस्कुराते नजर आएंगे।
नीतीश का सफर: सुशासन से “मार्गदर्शन” तक
नीतीश कुमार ने बिहार को साइकिल, बिजली, सड़क और सुशासन का सपना दिखाया। अपराध, भ्रष्टाचार और पिछड़ेपन की छवि को बदलने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। लेकिन राजनीतिक उलटफेर उनके नाम का पर्याय बन गए – NDA छोड़ा, फिर जोड़ा, महागठबंधन बनाया, फिर तोड़ा। “पलटी मार” का यह खेल इतना लगातार चला कि जनता भी थक गई।
2025-26 के चुनावों के बाद जब बीजेपी ने अपना दबदबा बढ़ाया, नीतीश को “सम्मानजनक” निकास दिया गया – राज्यसभा टिकट और “मार्गदर्शक” का तमगा। व्यंग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री (सम्राट चौधरी) बना, और नीतीश “राष्ट्रीय” भूमिका में चले गए। कुछ लोग इसे “शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण” कह रहे हैं, तो कुछ “चुपके से कुर्सी छीन ली गई”।
क्या दिल्ली में नया अध्याय लिखेंगे?
राज्यसभा में नीतीश कुमार अब राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलेंगे। JD(U) की राष्ट्रीय राजनीति को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। लेकिन सवाल उठता है – क्या 75+ की उम्र में नई शुरुआत संभव है? या यह बस एक सम्मानजनक विदाई है?
ट्रेन चलाने वाले इंजन को अब “मार्गदर्शक” बना दिया गया है। बिहार में विकास के जो काम हुए, उनका श्रेय अब नया मुख्यमंत्री ले रहा है। नीतीश के समर्थक कहते हैं कि उनका अनुभव राष्ट्रीय स्तर पर काम आएगा। आलोचक हंसते हुए कहते हैं – “अब सलाह दो, फैसला हम लेंगे”।
राजनीतिक सबक और भविष्य
नीतीश कुमार की कहानी भारतीय राजनीति का आईना है। जो नेता खुद को indispensable समझते हैं, उन्हें भी एक दिन “मार्गदर्शक” बना दिया जाता है। बिहार में अब नई पीढ़ी (सम्राट चौधरी, निशांत कुमार आदि) सत्ता संभाल रही है। नीतीश का विरासत तो रहेगा, लेकिन सक्रिय सत्ता से दूरी साफ है।
क्या वे केंद्र में कोई मंत्री पद लेंगे? या JD(U) को नई दिशा देंगे? या बस राज्यसभा में भाषण देकर संतोष कर लेंगे? समय बताएगा। फिलहाल तो “पूर्ण विराम” का यह अध्याय व्यंग्य से भरा हुआ है – जो कभी बिहार का मालिक था, आज दिल्ली में सलाहकार बनकर बैठा है।
नीतीश कुमार का यह कदम बिहार की राजनीति का अंत नहीं, बल्कि एक दौर का समापन जरूर है। दिल्ली में नया अध्याय खुलेगा या पुरानी कहानी का अंतिम पन्ना – यह तो आने वाले दिनों की सियासी हलचल तय करेगी। लेकिन एक बात तय है: बिहार अब नीतीश युग से आगे निकल चुका है, चाहे नीतीश इसे “मार्गदर्शन” कहें या “नया अध्याय”।
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता – सिर्फ स्थायी हित होते हैं। और नीतीश कुमार ने इस सिद्धांत को बेहद खूबसूरती से निभाया है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 8 Jun 2026