Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Thursday, 25 June 2026

"रामनाथ गोयनका: भारतीय पत्रकारिता के शेर और जनसंघ के सांसद – एक अनकही विरासत"

"रामनाथ गोयनका: भारतीय पत्रकारिता के शेर और जनसंघ के सांसद – एक अनकही विरासत"
-Friday World 25 Jun 2026
इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक ने 1971 में विदिशा से जनसंघ का झंडा बुलंद किया, जो आज भाजपा की नींव है। स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और राष्ट्रवाद की अमर कहानी।

भारतीय मीडिया की दुनिया में रामनाथ गोयनका (1904-1991) एक ऐसा नाम है जो साहस, संघर्ष और अटूट राष्ट्रभक्ति का पर्याय बन गया। वे केवल एक समाचारपत्र समूह के मालिक नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा सदस्य, उद्योगपति और राजनीतिज्ञ भी थे। 1971 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से **भारतीय जनसंघ** के टिकट पर सांसद चुने जाना उनकी बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाता है। आज जब हम भाजपा को देखते हैं, तो याद रखना चाहिए कि जनसंघ उसी का पुनर्गठित रूप है। गोयनका जी की यह राजनीतिक पारी न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत यात्रा का हिस्सा है, बल्कि भारतीय राजनीति और मीडिया के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

प्रारंभिक जीवन और राष्ट्रवादी जड़ें

रामनाथ गोयनका का जन्म 3 अप्रैल 1904 को बिहार के दरभंगा जिले में हुआ। बचपन से ही वे राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित रहे। महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1920 के दशक में वे मद्रास (चेन्नई) पहुंचे, जहां व्यापार की दुनिया में कदम रखा लेकिन दिल हमेशा देश सेवा में रमा रहा।

1930 के दशक में उन्होंने *इंडियन एक्सप्रेस* अखबार की कमान संभाली। तब यह एक छोटा सा अखबार था, लेकिन गोयनका जी ने इसे देशव्यापी साम्राज्य में बदल दिया। 14 संस्करणों वाला यह समूह भारत का सबसे बड़ा अंग्रेजी दैनिक बन गया। उनका मंत्र था – “Journalism with Courage”। ब्रिटिश राज के खिलाफ ‘Heart Strings and Purse Strings’ जैसे लेख लिखकर उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू की।

स्वतंत्रता के बाद वे संविधान सभा के सदस्य बने। संविधान निर्माण में उनका योगदान याद किया जाता है, खासकर प्रेस और कराधान से जुड़े मुद्दों पर। वे गांधीवादी मूल्यों से जुड़े रहे लेकिन समय के साथ राष्ट्रवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए।

 1971: विदिशा से जनसंघ की जीत – एक साहसिक फैसला

1971 का लोकसभा चुनाव इंदिरा गांधी के लिए ‘गरिबी हटाओ’ के नारे के साथ याद किया जाता है। कांग्रेस की लहर में भी रामनाथ गोयनका ने **भारतीय जनसंघ** का चुनाव लड़ने का साहस किया। मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से उन्होंने कांग्रेस के मनिभाई पटेल को हराकर सांसद बने। यह जीत महज एक सीट की नहीं थी, बल्कि एक विचारधारा की जीत थी।

जनसंघ, जिसकी स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी, हिंदुत्व, एकात्म राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक गौरव और मजबूत भारत की वकालत करता था। गोयनका जी जैसे उद्योगपति और मीडिया हस्ती का जनसंघ से जुड़ना पार्टी को नई ऊर्जा और विश्वसनीयता प्रदान करता था। उन्होंने संसद में प्रेस की स्वतंत्रता, आर्थिक सुधारों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की।

उनका यह कदम कांग्रेस से दूरी का प्रतीक भी था। शुरू में कांग्रेस से जुड़े रहने के बावजूद, वे प्रेस पर अंकुश और कुछ नीतियों से असहमत थे। 1971 की उनकी जीत ने साबित किया कि मीडिया जगत के लोग भी राजनीतिक मैदान में उतरकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकते हैं।

 इमरजेंसी: प्रेस की आजादी का महानायक

गोयनका जी की सबसे बड़ी परीक्षा 1975 की इमरजेंसी आई। इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल में प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गई। ज्यादातर अखबार झुक गए, लेकिन *इंडियन एक्सप्रेस* नहीं। गोयनका जी ने अरुण शौरी जैसे संपादक के साथ मिलकर साहसिक पत्रकारिता की मिसाल पेश की।

अखबार की छपाई में खाली जगह छोड़कर उन्होंने सेंसरशिप का विरोध जताया। अदालत में लड़ाई लड़ी और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की। उनकी इस लड़ाई ने जनसंघ और अन्य विपक्षी दलों को मजबूत किया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसमें जनसंघ के कई नेता शामिल थे। गोयनका जी की अखबार ने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार उजागर करने में भूमिका निभाई।

यह दौर साबित करता है कि गोयनका जी पत्रकारिता को व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का माध्यम मानते थे।

जनसंघ से भाजपा तक: विचारधारा की निरंतरता

भारतीय जनसंघ 1951 में स्थापित हुआ था। 1977 में जनता पार्टी में विलय के बाद 1980 में **भारतीय जनता पार्टी (BJP)** के रूप में पुनर्गठित हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं ने इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। गोयनका जी का 1971 में जनसंघ से जुड़ना इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज भाजपा जिस राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करती है, उसके बीज जनसंघ में थे। गोयनका जी जैसे लोग, जो उद्योग, मीडिया और राजनीति को जोड़ते थे, इस विचारधारा को मजबूत करते थे। वे साबित करते थे कि सच्चा राष्ट्रवाद किसी एक दल तक सीमित नहीं, बल्कि देश की सेवा का भाव है।

 विरासत: मीडिया, नैतिकता और साहस

रामनाथ गोयनका की विरासत आज भी जीवित है। *इंडियन एक्सप्रेस* आज भी स्वतंत्र पत्रकारिता का प्रतीक है। उनके बाद परिवार ने समूह को आगे बढ़ाया, लेकिन मूल भावना – साहस और सत्य – बनी रही।

वे सिखाते हैं:
- मीडिया सत्ता का चौथा स्तंभ है, लेकिन इसे सत्ता के सामने झुकना नहीं चाहिए।

- राजनीति में आने वाले मीडिया व्यक्ति देश के हित को प्राथमिकता दें।

- विचारधारा से ऊपर कुछ नहीं – चाहे जनसंघ हो या कोई अन्य।

- आर्थिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव साथ-साथ चल सकते हैं।

उनका जीवन संघर्षों से भरा था – ब्रिटिश राज, स्वतंत्र भारत की चुनौतियां, इमरजेंसी। लेकिन हर मोड़ पर उन्होंने सिर ऊंचा रखा।

 एक युग पुरुष

रामनाथ गोयनका केवल एक अखबार मालिक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के रक्षक थे। 1971 की विदिशा सीट उनकी राजनीतिक साहसिकता का प्रमाण है। जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा में उनका योगदान उन हजारों अज्ञात योद्धाओं की याद दिलाता है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना हिस्सा डाला।

आज जब हम मीडिया की स्वतंत्रता, राजनीतिक विविधता और राष्ट्रवाद पर बहस करते हैं, तो गोयनका जी की कहानी प्रेरणा देती है। वे साबित करते हैं कि एक व्यक्ति का साहस पूरे देश की दिशा बदल सकता है।

“पत्रकारिता साहस के बिना अधूरी है।” – रामनाथ गोयनका

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 25 Jun 2026