- Friday World 4 Jun 2026
विकासपुर। नाम सुनते ही आँखों में चमक आ जाती थी। नेता जी ने कहा था — “यहाँ सोना उगेगा। सूरज से बिजली बनेगी। हर घर चमकेगा। 5-खंड का सपना पूरा होगा।”
तालियाँ बजीं। कैमरे चमके। नारा लगा — “अब रुकेगा नहीं, झुकेगा नहीं।”
फिर एक दिन टेंडर निकला। सेठ जी आए। सूट-बूट वाले। वादा किया — “जंगल साफ़ कर देंगे, पर रोशनी दे देंगे।”
पहला अध्याय: जब कुल्हाड़ी चली तो परछाई भी नहीं बची
विकासपुर के चारों तरफ जो हरे-भरे पेड़ थे, जिनकी छाया में बुजुर्ग ताश खेलते थे, जिनकी टहनियों पर चिड़िया स्कूल चलाती थीं — वो सब “फाइल संख्या 302” में “बायोमास” बन गए।
गिनती किसने की? किसी ने नहीं। पर गाँव के मास्टर जी कहते हैं — “बेटा, इतने पेड़ थे कि अगर हर पेड़ पर एक चिड़िया बैठे, तो पूरा आसमान काला हो जाए।”
अब आसमान साफ़ है। इतना साफ़ कि दोपहर में ज़मीन तपने लगी। कुएँ सूखने लगे। पर नेता जी ने कहा — “पर्यावरण-वर्यावरण बाद में, पहले विकास।”
सोलर पैनल लगे। कतार के कतार। दूर से देखो तो लगे समंदर। पास जाओ तो लगे शीशे का रेगिस्तान। उद्घाटन हुआ। लड्डू बंटे। अख़बार में हेडलाइन — “विकासपुर बना सूरज का सिकंदर”।
दूसरा अध्याय: आँधी आई, और ‘सिकंदर’ कागज़ का निकला
फिर एक दिन आँधी आई। विकासपुर में तो हर साल आती है। बुजुर्ग कहते हैं — “यहाँ की मिट्टी को आँधी पहचानती है।”
पर इस बार आँधी को नए मेहमान मिले — कांच के पैनल, लोहे के फ्रेम।
सुबह हुई तो नज़ारा बदला हुआ था। जहाँ “सूरज का सिकंदर” खड़ा था, वहाँ अब टूटे कांच की किरचें थीं। फ्रेम ऐसे मुड़े थे जैसे किसी ने गुस्से में तार से खिलौना बना दिया हो। मेगावाट का सपना, किलोवाट में भी नहीं बचा।
इंजीनियर साहब बोले — “डिज़ाइन तो 150 किमी/घंटा झेलने का था।”
गाँव के काका बोले — “बेटा, आँधी को तुम्हारी ड्राइंग कौन दिखाएगा?”
तीसरा अध्याय: बीमा बाबू की एंट्री और खजाने की चाबी
अब शुरू हुआ असली खेल। सेठ जी के दफ्तर से फाइल निकली — “प्राकृतिक आपदा, बीमा क्लेम।”
बीमा किसका? कंपनी का। पैसा किसका? पहले कंपनी देगी, फिर “री-इंश्योरेंस” के नाम पर बड़ी सरकारी कंपनियों से लेगी। बड़ी कंपनियों का घाटा कौन भरेगा? वही पुराना जवाब — “खजाना”।
और खजाना किसका? विकासपुर के उस लड़के का जो सुबह 6 बजे उठकर “अग्निवीर” की दौड़ लगाता है, पर 4 साल बाद “संविदा” का ठप्पा लेकर घर लौट आता है।
नेता जी ने नई क्रोनोलॉजी समझाई — “पहले नौकरी परमानेंट होती थी, अब ‘स्किल’ चाहिए। पहले पेंशन मिलती थी, अब ‘अनुभव’ मिलेगा।”
यानी, “तुम देश सेवा करो, हम फ़ाइल सेवा करेंगे।”
चौथा अध्याय: सिक्के के दो पहलू — एक उछलता है, दूसरा गिरता है
उधर समंदर में सेठ जी का जहाज़ भी कभी-कभी “तकनीकी खराबी” से बैठ जाता है। तेल फैलता है, मछली मरती है। फिर वही बीमा बाबू, वही क्लेम, वही खजाना।
इधर विकासपुर का रुपया रोज़ सुबह उठकर देखता है — “डॉलर भैया आज कितने ऊपर हैं?”
रुपया गिरता है। नेता जी कहते हैं — “डॉलर मज़बूत हो रहा है।”
गाँव का अर्थशास्त्री, जो 5वीं फेल है, पूछता है — “मालिक, हम कब मज़बूत होंगे?”
जवाब नहीं आता। बस नई हेडलाइन आ जाती है — “अगले साल 7-खंड का सपना।”
पाँचवाँ अध्याय: जंगल वाले, पहाड़ वाले, सवाल वाले
विकासपुर से हज़ार किमी दूर, जहाँ अब भी जंगल बचे हैं, वहाँ भी “फाइल 302” पहुँच गई है। वहाँ के लोग पूछते हैं — “ये ज़मीन हमारी, पेड़ हमारे, फिर ‘विकास’ तुम्हारा कैसे?”
जवाब में बैरिकेड लगते हैं।
लद्दाख की तरफ एक वैज्ञानिक हैं। बर्फ से पानी बनाते हैं। उन्होंने कहा — “थोड़ा हिमालय भी बचाओ।”
उन्हें मेहमाननवाज़ी मिली — हवालात की।
कहानी वही है, किरदार नए हैं।
आखिरी बात: आँधी बार-बार आएगी
विकासपुर की आँधी ने सिर्फ़ सोलर नहीं उड़ाया। उसने एक सवाल उड़ा दिया — हवा में टांग दिया:
“अगर हर नुकसान की भरपाई खजाने से होगी, तो फ़ायदा किसकी जेब में जाएगा?”
“अगर नौकरी ‘संविदा’ होगी, तो ज़िम्मेदारी ‘परमानेंट’ किसकी होगी?”
“अगर पेड़ कटने पर ऑक्सीजन नहीं मिलता, तो ‘5-खंड’ के सपने में साँस कौन लेगा?”
आँधी चली गई है। किरचें अब भी बिखरी हैं। कांच चमकता है, पर उसमें अब चेहरा नहीं दिखता — सिर्फ़ सवाल दिखते हैं।
विकासपुर इंतज़ार कर रहा है। अगली आँधी का नहीं, अगले जवाब का।
— छापो, बांटो, दीवार पर लिखो। बस किरचें समेट लेना, किसी के पाँव में न लग जाएं।
और हाँ, अगला अध्याय आप लिखिएगा। क्योंकि कलम जब तक सवाल पूछेगी, खजाने की चाबी किसी एक जेब में नहीं रहेगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 4 Jun 2026