- Friday World 1 Jun 2026
नई दिल्ली। जामिया मिलिया इस्लामिया, भारत की एक प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालय, लोकतंत्र, समावेशिता और बहुलवाद के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। यहीं से पत्रकारिता की डिप्लोमा हासिल करने वाली एक महिला आज देश की सबसे चर्चित और विवादास्पद एंकर बन चुकी हैं। उनका नाम है अंजना ओम कश्यप। एक समय जामिया ने उन्हें ‘डिस्टिंग्विश्ड अलुम्नी अवॉर्ड’ देकर सम्मानित भी किया था, लेकिन आज वही अंजना दिन-रात polarizing बहसों, तीखे सवालों और आलोचकों द्वारा ‘नफरत का कारोबार’ कहे जाने वाले कंटेंट के लिए जानी जाती हैं।
यह कहानी सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय मीडिया की विडंबना की भी है।
जामिया से शुरू हुआ सफर
अंजना ओम कश्यप का जन्म 12 जून 1975 को झारखंड (तत्कालीन बिहार) के रांची में हुआ। पिता डॉ. ओमप्रकाश तिवारी आर्मी डॉक्टर थे। मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाली अंजना की प्रारंभिक शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल, रांची से हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से बॉटनी में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में करियर बनाने का फैसला किया।
2000 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता (PG Diploma in Journalism) की डिग्री ली। जामिया के मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (MCRC) ने उन्हें प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखने का मंच दिया। बाद में 2017 में जामिया ने ही उन्हें Distinguished Alumni Award से नवाजा। उस समय अंजना आज तक की चर्चित एंकर बन चुकी थीं। अवॉर्ड फंक्शन में उन्होंने मीडिया छात्रों को टिप्स भी दिए।
जामिया जैसी संस्था, जो अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ी अपनी पहचान के लिए जानी जाती है, ने एक हिंदू पृष्ठभूमि की महिला छात्रा को सम्मान दिया। यह संस्था के लोकतांत्रिक और समावेशी चरित्र को दर्शाता था। लेकिन आज कई आलोचक इसी तथ्य को विडंबना बताते हैं।
नाम और पहचान: अंजना तिवारी से अंजना ओम कश्यप तक
अंजना का मूल नाम अंजना तिवारी था। पति मंगेश तिवारी (आईपीएस अधिकारी) से विवाह के बाद उन्होंने ‘ओम कश्यप’ जोड़ा। यूपी-बिहार की पंडित परंपरा से जुड़ी यह महिला मीडिया में अपनी तीखी आवाज और आक्रामक स्टाइल के लिए मशहूर हुईं। दूरदर्शन से शुरूआत, फिर न्यूज 24 और आखिरकार आज तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था।
उन्होंने NGO में लीगल काउंसलर के रूप में भी काम किया। लेकिन पत्रकारिता ने उन्हें स्टार बना दिया। ‘हल्ला बोल’, राजनीतिक डिबेट्स और ब्रेकिंग न्यूज में उनकी धारदार आवाज ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। लाखों दर्शक उन्हें पसंद करते हैं, तो उतने ही आलोचना भी।
‘नफरत का कारोबार’ या साहसी पत्रकारिता?
आलोचक अंजना पर आरोप लगाते हैं कि वे हिंदुत्व एजेंडा को बढ़ावा देने, मुस्लिम समुदाय को टारगेट करने और ध्रुवीकरण पैदा करने वाले कंटेंट के जरिए टीआरपी हासिल करती हैं। उनके कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाली भाषा, मेहमानों का चयन और सवालों की तीखापन अक्सर विवादों में रहता है। सोशल मीडिया पर उन्हें “झूठ फैलाने वाली”, “प्रोपगैंडा एंकर” जैसे शब्दों से नवाजा जाता है।
दूसरी ओर, उनके समर्थक उन्हें “राष्ट्रीय हित की आवाज”, “बोल्ड पत्रकार” और “जनता की बात रखने वाली” कहते हैं। वे तर्क देते हैं कि मुख्यधारा के मीडिया में लंबे समय तक एक तरफा नैरेटिव चला, अंजना ने उसका मुकाबला किया। राम मंदिर, CAA-NRC, Article 370 जैसे मुद्दों पर उनकी कवरेज को वे “सच्चाई उजागर करना” मानते हैं।
जामिया मिलिया इस्लामिया के संदर्भ में यह सवाल स्वाभाविक है: क्या एक संस्था जो ‘इस्लामिया’ नाम के साथ सेकुलर लोकतंत्र की मिसाल बनती है, अपनी पूर्व छात्रा की पत्रकारिता शैली को लेकर कुछ महसूस करती है? या फिर शिक्षा संस्थान सिर्फ शिक्षा देते हैं, बाद का सफर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है?
मीडिया, राजनीति और ध्रुवीकरण का खेल
आज के ट्रायल-बाय-मीडिया युग में अंजना ओम कश्यप जैसी एंकर्स सिर्फ न्यूज नहीं, ओपिनियन भी बेचती हैं। उनके कार्यक्रमों में मेहमान अक्सर दो खेमों में बंटे दिखते हैं – एक तरफ “राष्ट्रवादी”, दूसरी तरफ “लीब्रल/वामपंथी/पसमांदा”। इस बाइनरी ने दर्शकों को भी बांट दिया है।
कुछ सवाल जो उठते हैं:
- क्या जामिया जैसी संस्था से शिक्षा लेने के बाद भी धार्मिक-राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना संभव है?
- क्या टीआरपी और राजनीतिक दबाव ने पत्रकारिता को नफरत फैलाने का हथियार बना दिया है?
- अंजना की सफलता व्यक्तिगत मेहनत है या सिस्टम द्वारा चुने गए नैरेटिव का हिस्सा?
अंजना खुद को हमेशा “निष्पक्ष” बताती रही हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि वे सिर्फ सवाल पूछती हैं, जवाब दर्शक तय करते हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि सवालों में ही पूर्वाग्रह छिपा होता है।
विडंबना का सार
जामिया मिलिया इस्लामिया ने अंजना को डिग्री दी, सम्मान दिया। आज वही अंजना उन मूल्यों की आलोचना करती दिखती हैं जो जामिया का आधार माने जाते हैं – सेकुलरिज्म, अल्पसंख्यक अधिकार आदि। यह विडंबना है या फिर लोकतंत्र की खूबसूरती कि एक संस्था अपनी छात्रा को आलोचना का अधिकार भी देती है?
पत्रकारिता का काम सत्य की खोज है, न कि नफरत का प्रचार। लेकिन वर्तमान समय में दोनों के बीच की लाइन धुंधली हो चुकी है। अंजना ओम कश्यप इस धुंधले माहौल की सबसे चमकती मिसाल हैं – जहां एक तरफ करोड़ों दर्शक उन्हें अपना हीरो मानते हैं, दूसरी तरफ लाखों उन्हें विलेन।
अंतिम विचार
अंजना तिवारी से अंजना ओम कश्यप बनने का सफर सामान्य नहीं। जामिया की बेंच से आज तक के स्टूडियो तक पहुंचना संघर्ष का परिणाम है। लेकिन सफलता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। दिन-रात स्क्रीन पर जो कुछ बोला जाता है, उसका समाज पर असर पड़ता है।
जामिया ने उन्हें सम्मान दिया था। अब समय है कि समाज भी तय करे – क्या अंजना ओम कश्यप सच्ची पत्रकारिता कर रही हैं या सिर्फ नफरत का कारोबार? जवाब आसान नहीं, लेकिन सवाल जरूरी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 1 Jun 2026