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Sunday, 28 June 2026

खेल पलटा : खाड़ी देशों का ईरान के साथ सुरक्षा समझौता – अमेरिका की निर्भरता का अंत?

खेल पलटा : खाड़ी देशों का ईरान के साथ सुरक्षा समझौता – अमेरिका की निर्भरता का अंत?
-Friday World 28 Jun 2026
मिडल ईस्ट की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ आता दिख रहा है। कतर के प्रधानमंत्री ने हाल ही में दिए संकेतों में साफ किया है कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश अब ईरान के साथ सुरक्षा संबंधी समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह विकास न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के समीकरण बदल रहा है, बल्कि दशकों से चली आ रही अमेरिकी प्रभुत्व की निर्भरता को भी चुनौती दे रहा है। खाड़ी देश अब अपनी सुरक्षा और हितों के लिए स्वतंत्र फैसले लेने की राह पर बढ़ रहे हैं, जो पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण मायने रखता है।

क्यों आ रहा है यह बड़ा बदलाव?

पिछले कई दशकों तक खाड़ी देश – सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन, ओमान और कतर – अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से अमेरिका पर निर्भर रहे हैं। अमेरिकी नौसेना बेड़े, सैन्य अड्डे और सुरक्षा गारंटी ने इन देशों को ईरान जैसे पड़ोसी की चुनौतियों से बचाया। लेकिन हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला है। 

ईरान के साथ हालिया शांति वार्ता, अमेरिका की मध्य पूर्व में कम होती सक्रियता और चीन-रूस जैसे नए खिलाड़ियों का उदय इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं। कतर के प्रधानमंत्री का बयान इस दिशा में एक औपचारिक संकेत माना जा रहा है। कतर स्वयं ईरान के साथ मजबूत आर्थिक संबंध रखता है और दोनों देश गैस फील्ड्स को साझा करते हैं। अब सुरक्षा क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने की बात हो रही है।

क्षेत्रीय सुरक्षा का नया स्वरूप

यदि खाड़ी देश ईरान के साथ सुरक्षा समझौते करते हैं तो इसका असर कई स्तरों पर पड़ेगा:

1. ईरान-खाड़ी संबंधों में सुधार: दशकों पुरानी शत्रुता और अविश्वास की दीवार में दरार पड़ेगी। हुरmuz जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले तेल निर्यात पर खतरा कम होगा, जिससे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

2. अमेरिकी प्रभाव में कमी: अमेरिका के लिए यह एक बड़ा झटका होगा। 1991 के गल्फ वॉर से लेकर आज तक अमेरिका ने खाड़ी में अरबों डॉलर निवेश किया है। यदि GCC देश खुद ईरान के साथ समझौता करते हैं तो वाशिंगटन की रणनीतिक जरूरत कम हो जाएगी।

3. चीन और रूस की बढ़ती भूमिका: चीन पहले से ही ईरान और सऊदी अरेबिया के बीच मध्यस्थता कर चुका है। अब सुरक्षा क्षेत्र में भी बीजिंग और मॉस्को की भागीदारी बढ़ सकती है।

आर्थिक आयाम

खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था तेल और गैस पर टिकी है। ईरान के साथ तनाव कम होने से क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा, पर्यटन फलेगा और नई परियोजनाएं शुरू होंगी। सऊदी अरब का विजन 2030 और UAE का डाइवर्सिफिकेशन प्रोग्राम इन परिस्थितियों में और मजबूत हो सकता है।

भारत के लिए भी यह बेहद महत्वपूर्ण है। भारत खाड़ी देशों से 60% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। यदि क्षेत्र में स्थिरता बढ़ी तो तेल की कीमतें स्थिर रहेंगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही, 90 लाख से ज्यादा भारतीय खाड़ी देशों में काम करते हैं – उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

चुनौतियां भी कम नहीं

यह बदलाव आसान नहीं होगा। 

• कुछ खाड़ी देशों (खासकर सऊदी अरब) में ईरान के प्रति गहरा अविश्वास है। 

• इजराइल के साथ अब्राहम समझौते वाले देशों में विरोध की संभावना है। 

• अमेरिका भी अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए कूटनीतिक दबाव डाल सकता है।

फिर भी, कतर जैसे देशों का सक्रिय रुख दर्शाता है कि खाड़ी राष्ट्र अब परिपक्व हो चुके हैं और वे खुद अपनी किस्मत खुद लिखना चाहते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ

2015 के ईरान न्यूक्लियर डील से लेकर 2020 के अब्राहम एक्सॉर्ड्स तक मिडल ईस्ट की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए। 2022-23 में ईरान-सऊदी संबंधों में चीन की मध्यस्थता से जो दरवाजे खुले, उसी की निरंतरता आज दिख रही है। कतर हमेशा से मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है – चाहे अफगानिस्तान हो या गाजा संकट। अब वह सुरक्षा क्षेत्र में भी वही भूमिका निभाने को तैयार है।

 भविष्य की संभावनाएं

यदि यह सुरक्षा समझौता होता है तो:

- हुरmuz जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित हो जाएगा।

- क्षेत्रीय सैन्य खर्च कम हो सकता है, जिससे विकास कार्यों पर फोकस बढ़ेगा।

- आतंकवाद और प्रॉक्सी वॉर की घटनाएं घटेंगी।

- नया मल्टी-पोलर मिडल ईस्ट उभरेगा।

भारत जैसे देशों को फायदा होगा क्योंकि विविधता भरी कूटनीति का लाभ मिलेगा। भारत पहले से ही ईरान (चाबहार), सऊदी, UAE और इजराइल के साथ संतुलित संबंध रखता है।

एक नई शुरुआत?

कतर के प्रधानमंत्री के संकेत मिडल ईस्ट की राजनीति में “नई सुबह” का प्रतीक बन सकते हैं। दशकों तक चली “अमेरिका पर निर्भरता” की नीति अब “स्वतंत्र सुरक्षा सहयोग” की ओर मुड़ रही है। यह बदलाव न सिर्फ खाड़ी देशों की परिपक्वता दर्शाता है, बल्कि विश्व व्यवस्था के बहुध्रुवीय भविष्य की भी झलक दिखाता है।

हालांकि यात्रा अभी लंबी है, लेकिन दिशा साफ हो चुकी है। मिडल ईस्ट अब पुरानी दुश्मनियों से आगे निकलकर नए सहयोग के युग में प्रवेश कर रहा है। अगर यह प्रयास सफल हुआ तो आने वाले दशक में क्षेत्र शांति, स्थिरता और समृद्धि का नया केंद्र बन सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 28 Jun 2026