-Friday World 28 Jun 2026
सुपरकंप्यूटर से करोड़ों गुना तेज, दस लाख गुना कम बिजली खपत – मध्य पूर्व के तनाव के बीच ईरान की वैज्ञानिक क्रांति, AI को भी पीछे छोड़ देगी नई तकनीक
नई दिल्ली, 28 जून 2026 – जब मध्य पूर्व में युद्धविराम के समझौते टूट रहे हैं और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव चरम पर है, उसी समय ईरान ने विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा चौंकाने वाला विकास किया है जो पूरी दुनिया को हिला देने वाला है। ईरान के वैज्ञानिकों ने जीवित मानवीय न्यूरॉन्स (मस्तिष्क कोशिकाओं) की मदद से एक ‘आर्टिफिशियल ब्रेन’ या बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस (BI) विकसित कर लिया है। इसे ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस भी कहा जा रहा है।
यह कोई साधारण कंप्यूटर सॉफ्टवेयर या AI प्रोग्राम नहीं है, बल्कि जीवित कोशिकाओं का एक नेटवर्क है जो मानव मस्तिष्क की तरह सोच सकता है, फैसले ले सकता है और अनुभव से सीख सकता है। ईरान की ब्रेन रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी टीम के प्रमुख अताउल्लाह पोर-अब्बासी ने इसे “विज्ञान के इतिहास में नया अध्याय” बताया है।
बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस की अद्भुत क्षमताएं
ईरान की टीम ने प्रयोगशाला में जीवित मानव न्यूरॉन्स को विकसित करके उन्हें एक जटिल नेटवर्क में जोड़ दिया है। ये कोशिकाएं आपस में संपर्क स्थापित कर विद्युतीय संकेतों का आदान-प्रदान करती हैं, ठीक वैसे जैसे असली मस्तिष्क में होता है।
प्रमुख फायदे:
1. अकल्पनीय गति: यह BI प्रोसेसर आधुनिक सुपरकंप्यूटरों से करोड़ों गुना तेज काम कर सकता है। जहां सिलिकॉन चिप्स पर आधारित AI को अरबों डेटा पर प्रशिक्षण की जरूरत पड़ती है, वहीं यह जीवित सिस्टम बहुत तेजी से अनुकूलन कर लेता है।
2. बहुत कम ऊर्जा खपत: सामान्य AI डेटा सेंटर और सुपरकंप्यूटर भारी मात्रा में बिजली खपत करते हैं। इसके विपरीत, यह बायोलॉजिकल सिस्टम मुट्ठी भर कैलोरी या न्यूनतम ऊर्जा पर चलता है – लगभग दस लाख गुना कम बिजली!
यह तकनीक ईरान को आर्थिक और सामरिक रूप से बड़ा लाभ दे सकती है, क्योंकि यह ऊर्जा कुशल है और पारंपरिक चिप्स पर निर्भर नहीं है।
AI बनाम BI: बड़ा अंतर
आजकल चर्चा में रहने वाला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिर्फ एक बेजान सॉफ्टवेयर प्रोग्राम है जो बड़े डेटा पर प्रशिक्षित होता है। वह मशीन है और उसके फैसले ट्रेनिंग डेटा पर आधारित होते हैं। वहीं, ईरान का बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस (BI) जीवित है। यह अपने अनुभवों से सीखता है, गलतियों को सुधारता है और पैरेलल प्रोसेसिंग में अद्भुत क्षमता रखता है।
ईरान की एक नॉलेज-बेस्ड कंपनी ने इस तकनीक का प्रारंभिक मॉडल सफलतापूर्वक विकसित कर लिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में रोबोटिक्स, साइबर वॉरफेयर, चिकित्सा और रक्षा क्षेत्र में क्रांति ला सकती है।
वैश्विक प्रभाव और अमेरिका की चिंता
इस विकास ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को गहरी चिंता में डाल दिया है। यदि यह तकनीक सैन्य क्षेत्र में इस्तेमाल हुई तो अत्यंत चतुर और अनुकूलनशील युद्ध मशीनें तैयार हो सकती हैं। एक तरफ यह दवाओं के विकास, मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के इलाज और न्यूरोसाइंस में मदद कर सकती है, तो दूसरी तरफ गलत हाथों में पड़ने पर यह भयानक हथियार साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह परमाणु कार्यक्रम से भी ज्यादा सामरिक महत्व रख सकती है, क्योंकि यह ऊर्जा कुशल और अत्यधिक शक्तिशाली है। अमेरिका और उसके सहयोगी इस विकास पर नजर रखे हुए हैं और इसे रोकने की रणनीति बना रहे हैं।
भारत के लिए प्रभाव और अवसर
भारत जैसे देशों के लिए यह विकास अवसर और चुनौती दोनों है। भारत अपने बायोटेक्नोलॉजी और AI मिशन के तहत ऐसी तकनीकों पर शोध बढ़ा सकता है। न्यूरोसाइंस और बायो-इंफॉर्मेटिक्स में भारतीय वैज्ञानिक पहले से अच्छा काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ स्वदेशी शोध को बढ़ावा देना आवश्यक है।
नैतिक और सुरक्षा चुनौतियां
इस तकनीक के साथ कई नैतिक प्रश्न भी जुड़े हैं – जीवित मानव कोशिकाओं का उपयोग, उनके अधिकार, सुरक्षा और दुरुपयोग की संभावना। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर नियम और नीतियां बनानी चाहिए ताकि यह मानवता के कल्याण के लिए इस्तेमाल हो।
यह विकास विज्ञान की नई सीमाओं को छू रहा है। यदि ईरान इसमें सफल हुआ है तो वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के लिए यह एक बड़ी घटना है। भविष्य में यह तकनीक कैसे विकसित होगी और इसका उपयोग कैसे होगा, यह देखना अत्यंत रोचक रहेगा।
ईरान का बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस मध्य पूर्व के मौजूदा तनाव को नई दिशा दे सकता है। यह सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की युद्धकला, चिकित्सा और अर्थव्यवस्था को बदलने वाली तकनीक साबित हो सकती है। विश्व को अब सतर्क रहना होगा ताकि यह तकनीक मानवता के खिलाफ न इस्तेमाल हो।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 28 Jun 2026