-Friday World 19 Jun 2026
तस्वीर झकझोर देने वाली है। काले पड़ चुके लोहे के रैक, जले हुए तार, और पिघली हुई EVM की कतारें। ये सिर्फ मशीनें नहीं जलीं। जला है एक भरोसा। वह भरोसा जो कहता था कि मेरा एक वोट सरकार बदल सकता है।
आपने जो कहा, "लोकतंत्र की हत्या की यह जली हुई चिता EVM बहुत कुछ कह रही है", यह लाइन अब सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस आग की तस्वीर है जो गोदाम में लगी या किसी के मन में लगी। फर्क क्या पड़ता है? राख दोनों जगह बनती है।
1. यह तस्वीर बोलती क्या है?
इस फोटो में जली हुई EVM और VVPAT मशीनें दिख रही हैं। शायद किसी गोदाम में आग लगी। शायद किसी ने लगाई। कारण जो भी हो, प्रतीक बहुत बड़ा है।
लोकतंत्र मशीनों से नहीं चलता। लोकतंत्र चलता है जनता के विश्वास से। जब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, जब संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने लगे, तब सबसे बड़ा नुकसान EVM का नहीं होता। नुकसान होता है उस नागरिक का जो अगली बार लाइन में लगने से पहले दस बार सोचेगा।
EVM सिर्फ प्लास्टिक और चिप का डिब्बा है। मगर इस डिब्बे में 96 करोड़ लोगों की उम्मीद बंद थी। आज वह उम्मीद राख के ढेर में बदली पड़ी है।
2. EVM आई ही क्यों थी? बैलेट का दौर भूल गए?
1990 से पहले चुनाव बैलेट पेपर से होते थे। तब क्या होता था?
*बूथ कैप्चरिंग*: बाहुबली पूरी की पूरी मतपेटी उठा ले जाते थे। हज़ारों फर्जी ठप्पे लगा दिए जाते थे।
*गिनती में खेल*: 3 दिन तक गिनती चलती थी। हर राउंड में विवाद। फिर से गिनती के नाम पर दबाव।
*खर्च और वक्त*: करोड़ों बैलेट छापो। ट्रकों में ढोओ। फिर कचरे में फेंक दो।
EVM इन सबका जवाब बनकर आई। 1982 में केरल में पहला प्रयोग। 2004 से पूरे देश में लोकसभा चुनाव EVM से।
वादा था तीन चीज़ों का:
- *तेज़ी*: शाम 6 बजे वोटिंग बंद, रात 12 बजे तक नतीजे।
- *पारदर्शिता*: एक आदमी, एक बटन, एक वोट। हज़ार ठप्पे मारना बंद।
- *किफायत*: बार बार कागज़ छापने का खर्च खत्म।
दुनिया ने माना कि भारत ने कमाल कर दिया। 10 लाख बूथ। एक दिन में चुनाव। यह तकनीकी क्रांति थी।
3. फिर चिता जलने की नौबत क्यों आई?
मशीन खराब नहीं थी। भरोसा खराब हुआ। और भरोसा टूटने की 4 बड़ी वजहें हैं:
*पहली वजह: तकनीक और जनता के बीच दूरी*
बैलेट दिखता था। मुहर लगती थी। डिब्बे में डालते थे। आंखों के सामने सील लगता था। EVM के अंदर क्या होता है? आम वोटर नहीं जानता। जो दिखता नहीं, उस पर शक स्वाभाविक है। चुनाव आयोग लाख कहे कि मशीन स्टैंडअलोन है, इंटरनेट से नहीं जुड़ती, हैक नहीं हो सकती। मगर जब समझ ही न हो तो भरोसा कैसे हो?
*दूसरी वजह: हार का ठीकरा*
कड़वी सच्चाई यह है कि EVM पर सवाल हमेशा हारने वाला उठाता है। 2014, 2019 में विपक्ष ने उठाए। राज्यों में जब वही विपक्ष जीता तो EVM माता बन गई। 2009 में BJP हारी तो उसने सवाल उठाए थे। यह चयनात्मक हमला जनता को कन्फ्यूज़ करता है। उसे लगता है कि मुद्दा EVM नहीं, कुर्सी है।
*तीसरी वजह: संस्थाओं की साख*
EVM चुनाव आयोग चलाता है। अगर लोगों को लगे कि आयोग ही दबाव में है, तो मशीन पर शक लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। जब नियुक्ति पर सवाल हों, तो नतीजों पर सवाल उठेंगे ही।
*चौथी वजह: VVPAT का आधा अधूरा सच*
2019 से हर EVM के साथ VVPAT लगा। आप बटन दबाते हैं, 7 सेकंड की पर्ची दिखती है। तसल्ली होती है कि वोट सही गया। मगर सिर्फ 5 बूथ की पर्चियां ही गिनी जाती हैं। मांग है 50% या 100% गिनती की। आयोग कहता है कि वक्त बढ़ जाएगा। जनता कहती है कि भरोसे से बड़ा वक्त नहीं। यह टकराव आग में घी डालता है।
4. क्या EVM सच में हैक हो सकती है? फैक्ट क्या है
चुनाव आयोग के दावे सुनिए:
1. EVM में वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप है। एक बार कोड डाला, फिर बदला नहीं जा सकता।
2. मशीन किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ती। न ब्लूटूथ, न वाई-फाई, न इंटरनेट।
3. बटन दबाने और नतीजे में महीनों का गैप होता है। बीच में मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम में सील रहती हैं।
4. 2017 में आयोग ने हैकाथॉन की खुली चुनौती दी थी। कोई राजनीतिक दल हैक करके नहीं दिखा पाया।
आज तक लाखों VVPAT पर्चियां EVM के नतीजों से मिलाई गई हैं। एक भी केस में अंतर नहीं मिला। यह डेटा है।
मगर शक करने वाले पूछते हैं: अगर निर्माण के समय ही खेल हो तो? अगर स्ट्रॉन्ग रूम से मशीन बदल दी जाए तो? इन सवालों का जवाब सिर्फ तकनीक से नहीं, पारदर्शी प्रक्रिया से मिलेगा।
5. दुनिया ने क्या किया? सबक क्या है?
*जर्मनी*: 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM को असंवैधानिक बताया। तर्क था कि आम नागरिक पूरी प्रक्रिया को समझ न पाए तो वह चुनाव पारदर्शी नहीं है। जर्मनी बैलेट पर लौट गया।
*नीदरलैंड, आयरलैंड*: हैकिंग के डर से EVM हटा दी।
*ब्राज़ील, फिलीपींस*: भारत की तरह EVM इस्तेमाल करते हैं और संतुष्ट हैं।
*अमेरिका*: हर राज्य का अपना सिस्टम। कहीं पेपर बैलेट, कहीं स्कैनिंग मशीन, कहीं EVM।
भारत की चुनौती सबसे अलग है। 96 करोड़ वोटर। दूर दराज़ के इलाके। बूथ कैप्चरिंग का इतिहास। बैलेट पर लौटना आसान नहीं। मगर जर्मनी का तर्क भी वज़नदार है: चुनाव सिर्फ सही नहीं होना चाहिए, सही दिखना भी चाहिए।
6. जली हुई चिता का मतलब क्या है?
यह तस्वीर दो बातें कहती है।
पहली: अगर यह हादसा है, तो हमारी चुनावी तैयारियों पर सवाल है। करोड़ों की मशीनें ऐसे कैसे जल गईं? सुरक्षा कहां थी?
दूसरी: अगर यह साज़िश है, तो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। कोई इतना बौखलाया हुआ है कि वह पूरी व्यवस्था को ही आग लगाना चाहता है।
दोनों सूरतों में नुकसान लोकतंत्र का है। क्योंकि जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है। मशीनें फिर बन जाएंगी। भरोसा टूट गया तो उसे कौन जोड़ेगा?
7. अब रास्ता क्या है? भरोसा कैसे लौटे?
आग बुझाने के लिए पानी चाहिए, भाषण नहीं। 5 ठोस कदम ये हो सकते हैं:
*1. दिखाओ, सिर्फ बताओ मत*
EVM की फर्स्ट लेवल चेकिंग, रैंडमाइज़ेशन, मॉक पोल, सीलिंग। ये सब हर दल के एजेंट के सामने हो। पूरी वीडियोग्राफी हो। वेबसाइट पर लाइव डाला जाए। जब प्रक्रिया दिखेगी, तो शक घटेगा।
*2. VVPAT गिनती बढ़ाओ*
5 बूथ बहुत कम हैं। सुप्रीम कोर्ट 25% या 50% बूथ की गिनती का आदेश दे सकता है। हां, नतीजे 2 दिन लेट आएंगे। मगर 5 साल के लिए भरोसा पक्का हो जाएगा। यह सौदा महंगा नहीं है।
*3. चुनाव आयोग को मज़बूत करो*
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस की समिति हो। सुप्रीम कोर्ट यह सुझाव दे चुका है। जब नियुक्ति निष्पक्ष दिखेगी, तो फैसले निष्पक्ष लगेंगे।
*4. तकनीकी ऑडिट हर चुनाव से पहले*
IIT, IISc जैसे स्वतंत्र संस्थानों से EVM का सैंपल ऑडिट करवाया जाए। रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
*5. राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तय हो*
बिना सबूत EVM को चोर कहना बंद हो। अगर हैक का दावा है तो आयोग की चुनौती स्वीकार करो। हार को EVM पर नहीं, अपनी कमियों पर डालने की हिम्मत दिखाओ।
8. आखिरी बात: चिता ठंडी करनी होगी
यह जली हुई EVM की तस्वीर एक चेतावनी है। लोकतंत्र की हत्या एक दिन में नहीं होती। वह रोज़ थोड़ी थोड़ी होती है। जब नेता सवाल से भागते हैं। जब संस्थाएं चुप रहती हैं। जब नागरिक व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर भरोसा कर लेता है।
जनता का विश्वास बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग की कि वह पारदर्शी रहे। कोर्ट की कि वह निगरानी रखे। मीडिया की कि वह सच दिखाए। दलों की कि वे एजेंट ट्रेन करें। और आपकी, हमारी कि हम आंख बंद करके न यकीन करें, न शक करें। सवाल पूछें। जवाब मांगें। प्रक्रिया का हिस्सा बनें।
क्योंकि EVM जल सकती है। दूसरी बन जाएगी। मगर अगर भरोसे की चिता जल गई, तो राख से लोकतंत्र वापस नहीं आएगा।
उसे बचाना है। आज। अभी। वरना कल यह राख हमारे हाथों में होगी। और हम पूछ रहे होंगे कि गलती किसकी थी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 19 Jun 2026