मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान (MBZ) ने इरान के हमलों के जवाब में सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देशों को संयुक्त सैन्य कार्रवाई के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन सभी प्रमुख नेताओं ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इस घटनाक्रम के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की UAE की कथित गुप्त यात्रा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया UAE दौरे ने क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर गहरी चर्चा छेड़ दी है।
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट: क्या कहती है?
मई 2026 में प्रकाशित ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी में अमेरिका-इजरायल अभियान शुरू होने के बाद इरान ने खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। UAE पर सैकड़ों हमले हुए, जिनमें大部分 को रोका गया, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ गई।
UAE के राष्ट्रपति MBZ ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) समेत कतर, बहरीन और अन्य खाड़ी नेताओं से फोन पर संपर्क किया और इरान के बढ़ते प्रभाव तथा क्षेत्रीय अस्थिरता के खिलाफ संयुक्त सैन्य जवाबी कार्रवाई का प्रस्ताव रखा।
हालांकि, अधिकांश नेताओं ने साफ कहा — “यह हमारा युद्ध नहीं है”। सऊदी अरब और कतर जैसे देशों ने कूटनीतिक समाधान और डी-एस्केलेशन पर जोर दिया। UAE को ज्यादातर अकेले ही जवाबी कदम उठाने पड़े, जिससे इरान के साथ तनाव और बढ़ गया।
यह घटना खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के भीतर गहर रहे मतभेदों को उजागर करती है। कुछ देश इजरायल-अमेरिका के साथ निकटता बढ़ाने के पक्ष में हैं, जबकि अन्य दीर्घकालिक स्थिरता और इरान के साथ संतुलन बनाए रखना चाहते हैं।
नेतन्याहू की गुप्त अबू धाबी यात्रा
इसी दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने UAE की एक गुप्त यात्रा की। इजरायली पीएमओ के बयान के अनुसार, मार्च 2026 में अल-ऐन शहर में MBZ से मुलाकात हुई, जिसे “इजरायल-UAE संबंधों में ऐतिहासिक प्रगति” बताया गया।
UAE ने हालांकि इस यात्रा की आधिकारिक पुष्टि नहीं की और कुछ रिपोर्टों को खारिज भी किया। अब्राहम समझौतों (2020) के बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा, खुफिया जानकारी, प्रौद्योगिकी और व्यापार सहयोग पहले से ही मजबूत हो चुका है। इरान के संदर्भ में यह सहयोग और प्रासंगिक हो गया है।
मोदी का UAE दौरा: भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चिंता
मई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का UAE दौरा इस पूरे संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर तनाव और संभावित तेल आपूर्ति व्यवधान को देखते हुए भारत ने UAE के साथ रणनीतिक समझौते किए:
- रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में UAE से तेल भंडारण बढ़ाने का समझौता (30 मिलियन बैरल तक)।
- LPG की स्थिर आपूर्ति पर करार।
- ऊर्जा सुरक्षा और वैकल्पिक मार्गों पर चर्चा।
प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि “हॉर्मुज को खुला, सुरक्षित और मुक्त रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।” भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और खाड़ी क्षेत्र से लगभग 60% तेल प्राप्त करता है। इरान-खाड़ी तनाव के कारण तेल की कीमतें बढ़ने और आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा भारत की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर है।
UAE भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले ही अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है। यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
क्षेत्रीय समीकरण: अवसर या जोखिम?
UAE की अकेली लड़ाई की स्थिति कई सवाल खड़े करती है:
1. GCC में विभाजन: सऊदी अरब जैसे देश कूटनीति पर जोर दे रहे हैं, जबकि UAE अधिक आक्रामक रुख अपनाता दिख रहा है।
2. इरान का जवाब: इरान ने UAE समेत खाड़ी देशों को निशाना बनाया, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
3. अब्राहम समझौतों का भविष्य: इजरायल के साथ UAE का सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन अन्य अरब देश सतर्क हैं।
4. वैश्विक प्रभाव: हॉर्मुज पर तनाव से पूरी दुनिया प्रभावित होती है। भारत, यूरोप और एशिया की ऊर्जा सुरक्षा दांव पर है।
विश्लेषकों का मानना है कि खाड़ी देश अब “यह हमारा युद्ध नहीं” की नीति से आगे बढ़कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के नए तरीके तलाश रहे हैं। कुछ देश इजरायल के साथ गुप्त सहयोग बढ़ा रहे हैं, जबकि अन्य चीन और रूस जैसे वैकल्पिक शक्तियों से संतुलन बना रहे हैं।
स्थिरता की तलाश
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट, नेतन्याहू की कथित गुप्त यात्रा और मोदी के UAE दौरे ने एक बात साफ कर दी है — मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। UAE सक्रिय भूमिका निभा रहा है, लेकिन GCC में पूर्ण एकता नहीं है।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती भी है और अवसर भी। अगर खाड़ी देश स्थिरता बनाए रखते हैं और हॉर्मुज सुरक्षित रहता है, तो भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी हो सकेंगी। लेकिन कोई भी बड़ा संघर्ष भारत की अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति और विकास को प्रभावित कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब कूटनीति से काम लेना चाहिए। युद्ध से कोई भी पक्ष नहीं जीतता — न जीतने वाले और न देखने वाले। UAE, सऊदी, कतर, इजरायल और इरान — सभी को संवाद की मेज पर लाना होगा।
भारत जैसे देश शांतिपूर्ण समाधान और ऊर्जा सुरक्षा दोनों पर जोर देते हुए अपनी राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेंगे। आने वाले दिनों में मध्य पूर्व के इन घटनाक्रमों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 2 Jun 2026