- Friday World Jul 17 2026
ईरान के खिलाफ लंबी लड़ाई अमेरिका को पड़ेगी भारी, चीन को मिलेगा मौका और दुनिया झेलेगी 100 डॉलर वाले तेल का झटका
दुनिया इस वक्त एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, लगातार हो रहे हवाई हमले और उसकी गूंज अब सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रही। इसका असर वॉशिंगटन के पेंटागन से लेकर दिल्ली के पेट्रोल पंप तक महसूस किया जा रहा है।
इसी बीच अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री मार्क एस्पर का एक बयान सुर्खियों में है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि 'अमेरिका ईरान के खिलाफ सिर्फ हवाई हमलों के जरिए यह युद्ध नहीं जीत सकता'। उनका तर्क सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक भी है। एस्पर के मुताबिक लगातार बमबारी से अमेरिका का हथियारों का भंडार तेजी से खाली हो रहा है, अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं और सबसे बड़ा खतरा यह है कि इससे अमेरिका की चीन से निपटने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।
1. सिर्फ आसमान से नहीं जीते जाते युद्ध: एस्पर की चेतावनी
मार्क एस्पर, जो डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका के रक्षा मंत्री रह चुके हैं, उन्हें सैन्य मामलों का गहरा जानकार माना जाता है। उनका हालिया इंटरव्यू और बयान सीधे तौर पर मौजूदा अमेरिकी रणनीति पर सवाल उठाता है।
एस्पर का कहना है कि हवाई हमले एक सीमित उद्देश्य के लिए ठीक हैं। दुश्मन के ठिकानों को नुकसान पहुंचाना, उसकी ताकत तोड़ना। लेकिन किसी देश को झुकाने, उसकी नीति बदलवाने या लंबे संघर्ष में जीत हासिल करने के लिए सिर्फ हवाई शक्ति काफी नहीं होती।
उन्होंने इशारा किया कि पिछले कुछ हफ्तों में जो बमबारी हुई है उसने अमेरिका के प्रिसिजन गाइडेड मिसाइल, ड्रोन और हवाई गोला-बारूद के स्टॉक पर भारी दबाव डाल दिया है। पेंटागन के अंदर ही इस बात की चर्चा है कि कई अहम हथियारों का रिजर्व तय सीमा से नीचे चला गया है।
एस्पर ने चेताया, "आप एक मोर्चे पर गोला-बारूद खत्म कर देंगे, तो दूसरे मोर्चे पर क्या करेंगे? युद्ध सिर्फ एक जगह नहीं लड़े जाते।"
2. खाली हो रहा है अमेरिका का शस्त्रागार
इस पूरे विवाद की सबसे अनदेखी कहानी यही है। टीवी पर बम गिरते हुए दिखते हैं, लेकिन कैमरा के पीछे फैक्ट्रियों, सप्लाई चेन और बजट का गणित चल रहा है।
पेंटागन के अधिकारियों ने पिछले दिनों माना था कि यूक्रेन युद्ध के बाद से ही अमेरिका के कई हथियारों का स्टॉक कम हुआ है। अब ईरान के खिलाफ ऑपरेशन ने उस कमी को और गहरा कर दिया है।
कहां दिक्कत आ रही है:
- लंबी दूरी की मिसाइलें: टॉमहॉक और जेडीएएम जैसे प्रिसिजन हथियार महंगे हैं और इन्हें बनाने में महीनों लगते हैं। एक बार इस्तेमाल होने के बाद इन्हें तुरंत रिप्लेस नहीं किया जा सकता।
- एयर डिफेंस सिस्टम: अमेरिकी बेस और सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए पैट्रियट मिसाइलों का इस्तेमाल बढ़ा है। इनका स्टॉक भी सीमित है।
- बजट का बोझ: अरबों डॉलर सिर्फ कुछ हफ्तों की बमबारी में खर्च हो गए। यह पैसा ट्रेनिंग, नए हथियारों की खरीद और तकनीक के अपग्रेड से कट रहा है।
एस्पर की सबसे बड़ी चिंता यही है। उनका मानना है कि अगर अमेरिका अपना सारा ध्यान और संसाधन एक जगह लगा देगा, तो उसकी ग्लोबल डिटरेंस कमजोर हो जाएगी।
3. असली टारगेट चीन है, और वहीं पर खतरा
यहां बात सबसे दिलचस्प हो जाती है। एस्पर ने बार-बार कहा कि अमेरिका का असली स्ट्रेटेजिक प्रतिद्वंद्वी ईरान नहीं, चीन है।
उनका सवाल सीधा है: "अगर हम अपने गोदाम ईरान पर खाली कर देंगे, तो ताइवान या इंडो-पैसिफिक में चीन के खिलाफ खड़े होने के लिए हमारे पास क्या बचेगा?"
चीन पिछले 10 सालों से अपने हथियारों का उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा रहा है। वह जानता है कि अमेरिका के पास दुनिया भर में जिम्मेदारियां हैं। अगर अमेरिका पश्चिम एशिया में फंस जाता है, तो चीन को दक्षिण चीन सागर और ताइवान में अपनी चाल चलने का मौका मिल सकता है।
यही वजह है कि अमेरिकी रक्षा विश्लेषक अब "दो मोर्चे वाली लड़ाई" की थ्योरी पर बहस कर रहे हैं। क्या अमेरिका एक साथ ईरान और चीन दोनों को संभाल पाएगा? एस्पर का जवाब है - मौजूदा स्टॉक और बजट के साथ नहीं।
4. तेल का बम: 100 डॉलर वाला क्रूड और महंगाई की आंधी
युद्ध का दूसरा मोर्चा आर्थिक है, और यहां निशाने पर पूरी दुनिया है। इस तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बना है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज।
दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी 33 किलोमीटर चौड़े समुद्री रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, ईरान, यूएई, कुवैत, इराक का तेल यहीं से दुनिया तक पहुंचता है। जैसे ही संघर्ष शुरू हुआ, शिपिंग कंपनियों ने यहां से गुजरना कम कर दिया। बीमा महंगा हो गया, रूट बदले गए।
नतीजा सबके सामने है:
- जुलाई की शुरुआत से अब तक ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 16% बढ़ चुकी है। यह अब 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है।
- विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर होर्मुज कुछ हफ्ते और बंद रहा या उसमें रुकावट आई, तो तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकता है।
100 डॉलर वाले तेल का मतलब क्या होगा?
1. भारत जैसे देशों पर दबाव: हम अपनी 85% से ज्यादा तेल की जरूरत आयात करते हैं। तेल महंगा मतलब पेट्रोल-डीजल महंगा, ट्रांसपोर्ट महंगा, और हर चीज महंगी।
2. अमेरिका में भी मुश्किल: रिपोर्ट्स हैं कि अमेरिका का खुद का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व 1984 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। महंगाई दोबारा सिर उठा सकती है और फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरें कम करना मुश्किल हो जाएगा।
3. ग्लोबल मंदी का खतरा: महंगा तेल मतलब कंपनियों की लागत बढ़ेगी, उपभोक्ताओं की जेब कटेगी। यूरोप पहले से मंदी से जूझ रहा है। एक महंगा झटका पूरी रिकवरी को पटरी से उतार सकता है।
5. हवाई हमलों की सीमा और युद्ध की सच्चाई
इतिहास गवाह है कि सिर्फ हवाई शक्ति से कोई युद्ध नहीं जीता गया। वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक अमेरिका ने आसमान से बम बरसाए, लेकिन जमीन पर नतीजा अलग रहा।
ईरान का भूगोल भी अमेरिका के लिए चुनौती है। यह एक बड़ा देश है, पहाड़ी इलाका है, और उसके पास मिसाइलों और ड्रोन का बड़ा जखीरा है। वह पलटवार कर सकता है - इजरायल पर, अमेरिकी बेस पर, या खाड़ी में शिपिंग पर।
एस्पर का तर्क यही है कि अगर लक्ष्य रेजीम चेंज या ईरान को पूरी तरह घुटने टेकवाना है, तो उसके लिए ग्राउंड स्ट्रेटेजी, डिप्लोमेसी और लंबे समय की प्रतिबद्धता चाहिए। और वो सब बिना खाली खजाने और खाली गोदामों के मुमकिन नहीं।
6. भारत और दुनिया के लिए इसका क्या मतलब है
भारत के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार है।
- नेगेटिव: महंगा तेल, महंगाई, सप्लाई चेन में दिक्कत, पश्चिम एशिया में रह रहे 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा।
- पॉजिटिव: अगर रूस और ईरान से रियायती तेल का रास्ता खुला रहा, तो भारत को कुछ राहत मिल सकती है। साथ ही डिफेंस और एनर्जी में आत्मनिर्भरता की जरूरत और तेज होगी।
वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया दो खेमों में बंटती जा रही है। एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी, दूसरी तरफ चीन, रूस और ईरान। ऐसे में कोई भी लंबा संघर्ष सिर्फ बम और बारूद का खेल नहीं रहेगा। यह आर्थिक युद्ध, तकनीक की जंग और सप्लाई चेन की लड़ाई बन जाएगा।
जीत का नया फॉर्मूला क्या है?
मार्क एस्पर का बयान एक चेतावनी है, हार मान लेने की बात नहीं। वह कह रहे हैं कि 21वीं सदी के युद्ध 20वीं सदी के तरीके से नहीं लड़े जा सकते।
बम गिराना आसान है, लेकिन उसके बाद क्या? भंडार कैसे भरेंगे? अर्थव्यवस्था कैसे संभलेगी? और सबसे जरूरी, दुश्मन नंबर एक को कैसे रोका जाएगा?
अमेरिका के सामने अब तीन रास्ते हैं। पहला, संघर्ष को जल्दी खत्म करके डिप्लोमेसी की तरफ जाना। दूसरा, हथियारों का उत्पादन युद्धस्तर पर बढ़ाना, जिसमें सालों लगेंगे। तीसरा, मौजूदा रास्ते पर चलकर अपने संसाधन खत्म करना और चीन के लिए जगह बनाना।
तेल के दाम और बाजार पहले ही बता रहे हैं कि दुनिया तीसरा विकल्प अफोर्ड नहीं कर सकती।
आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि यह तनाव एक सीमित झड़प बनकर रह जाता है, या फिर एक ऐसा लंबा संघर्ष जिसमें जीतने वाला कोई नहीं होगा, और हारने वाला पूरी दुनिया।
एक बात साफ है - 21वीं सदी में कोई भी महाशक्ति सिर्फ फाइटर जेट और बमों के दम पर नहीं चल सकती। उसे फैक्ट्री, खजाना, कूटनीति और धैर्य तीनों चाहिए। और अभी अमेरिका के पास इन तीनों की कमी दिख रही है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Jul 17 2026
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