-Friday World Jul 18 2026
यूरोप से दूरी और इज़राइल पर घटता भरोसा, क्या अंकारा बन रहा है वॉशिंगटन का नया प्लान B?
पिछले कुछ महीनों से वॉशिंगटन और अंकारा के बीच अचानक बढ़ी गर्मजोशी ने दुनिया का ध्यान खींचा है। NATO के दो पुराने सहयोगी, जो बीते 5 सालों में F-35, S-400 और सीरिया को लेकर एक-दूसरे से खफा थे, अब फिर एक मेज पर बैठकर रणनीति बना रहे हैं।
मीडिया में दो वजहें सबसे ज्यादा बताई जा रही हैं। पहली, यूरोप के साथ ट्रंप प्रशासन का बढ़ता अविश्वास। दूसरी, इज़राइल को लेकर अमेरिकी घरेलू राजनीति में आया बदलाव। लेकिन इन दोनों वजहों के पीछे एक तीसरी वजह भी है जिसका नाम खुलकर नहीं लिया जा रहा: कुर्द।
आइए इस पूरे समीकरण को परत-दर-परत समझते हैं।
1. पहली बताई गई वजह: यूरोप पर भरोसा टूटा, तुर्की विकल्प बना
डोनाल्ड ट्रंप दूसरे कार्यकाल में "America First" को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। फरवरी 2026 में जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को लेकर सैन्य दबाव बढ़ाया, तब उम्मीद थी कि यूरोप के NATO सहयोगी साथ खड़े होंगे।
लेकिन हुआ उल्टा।
- इटली ने अमेरिकी विमानों को अपने अड्डों से ईरान की तरफ उड़ान भरने की इजाजत देने से मना कर दिया
- जर्मनी ने कहा कि वह इस संघर्ष में सीधे शामिल नहीं होगा
- फ्रांस ने राजनयिक रास्ते पर जोर दिया और सैन्य समर्थन से किनारा कर लिया
ट्रंप के लिए यह झटका था। उन्होंने अंकारा में एक बंद कमरे की बैठक में कहा कि "मुश्किल समय में जो साथ न दे, उस पर दांव नहीं लगाया जा सकता।"
इसके साथ टैरिफ वॉर ने भी जख्म गहरे किए। यूरोपीय संघ पर नए टैरिफ लगाने के बाद अमेरिका-यूरोप के आर्थिक रिश्ते भी तनाव में हैं। ऐसे में वॉशिंगटन को एक ऐसा सहयोगी चाहिए जो 3 चीजें दे सके:
1. NATO का सदस्य हो
2. मध्य पूर्व के बिल्कुल पास हो
3. अमेरिका की बात मानने को तैयार हो
इस लिस्ट में तुर्की सबसे ऊपर आता है। तुर्की के पास इंसिर्लिक एयरबेस है, भूमध्य सागर से काला सागर तक पहुंच है, और सबसे जरूरी, उसकी सीमा सीधे ईरान, इराक और सीरिया से लगती है।
2. दूसरी बताई गई वजह: इज़राइल से "स्पेशल रिलेशनशिप" में दरार
अमेरिका-इज़राइल रिश्ते को 70 साल से "अटूट" कहा जाता था। लेकिन 2024 के गाजा युद्ध और उसके बाद की नेतन्याहू सरकार की नीतियों ने अमेरिकी राजनीति में दरार डाल दी।
इज़राइल के अखबार हारेट्ज़ ने हाल में लिखा कि "स्पेशल रिलेशनशिप का दौर खत्म हो रहा है।" इसके पीछे आंकड़े भी हैं:
- 58 प्रतिशत डेमोक्रेट मानते हैं कि अमेरिका इज़राइल का जरूरत से ज्यादा साथ दे रहा है। 2 साल पहले यह 45 प्रतिशत था
- 62 प्रतिशत डेमोक्रेट चाहते हैं कि अमेरिका फिलिस्तीनियों का समर्थन बढ़ाए
- लगभग 60 प्रतिशत अमेरिकी यहूदी भी नेतन्याहू की सरकार से असहमत हैं
रिपब्लिकन में समर्थन अब भी मजबूत है, लेकिन कुल मिलाकर दोनों पार्टियों में इज़राइल को लेकर एकतरफा समर्थन कम हुआ है। F-35 की डिलीवरी, हथियारों की बिक्री और UN में वीटो, हर मुद्दे पर अब कांग्रेस में सवाल उठते हैं।
अमेरिका के रणनीतिकारों के लिए इसका मतलब साफ है। अगर इज़राइल पर घरेलू दबाव बढ़ता है, तो ईरान के खिलाफ मोर्चे के लिए अमेरिका को दूसरा क्षेत्रीय साथी चाहिए। और वो साथी तुर्की हो सकता है।
3. वो वजह जो खुलकर नहीं बताई जा रही: कुर्द फैक्टर
यहीं पर कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा शुरू होता है। कुर्द पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी बिना देश वाली कौम है। तकरीबन 3.5 से 4 करोड़ कुर्द तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में फैले हुए हैं।
अमेरिका का कुर्दों से रिश्ता पुराना है।
- 1991 में सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका ने इराकी कुर्दों को समर्थन दिया
- 2014 से 2019 तक ISIS के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका ने सीरियाई कुर्द YPG को हथियार और ट्रेनिंग दी
- इराक में कुर्द क्षेत्र को स्वायत्तता मिली, लेकिन बगदाद और तेहरान दोनों इसे खतरा मानते हैं
सद्दाम ने 1980-90 के दशक में कुर्द आंदोलन को बर्बरता से कुचला था। तुर्की में भी 2015 के बाद PKK के खिलाफ अर्दोगान सरकार ने सख्त कार्रवाई की।
अब सवाल है कि अमेरिका को फिर कुर्दों की याद क्यों आई?
भू-राजनीति का गणित सीधा है। ईरान को घेरने के लिए अमेरिका को जमीन चाहिए। इराक से अमेरिकी सेना धीरे-धीरे कम हो रही है। सीरिया में अमेरिकी मौजूदगी सीमित है और सीरिया की सीमा ईरान से नहीं लगती।
बचता है तुर्की। तुर्की की पूर्वी सीमा सीधे ईरान से लगती है। अगर अमेरिका को ईरान के खिलाफ किसी स्थानीय ताकत की जरूरत पड़ी, तो तुर्की के कुर्द सबसे नजदीक हैं।
इसीलिए ट्रंप का तुर्की से "प्यार" बढ़ा है। डील का फॉर्मूला मोटे तौर पर ऐसा दिखता है: अमेरिका तुर्की को F-16 अपग्रेड, आर्थिक मदद और NATO में ज्यादा अहमियत देगा। बदले में तुर्की अमेरिका को अपने अड्डे, खुफिया जानकारी और क्षेत्रीय प्रभाव देगा। और कुर्द मुद्दे पर दोनों एक लाइन पर रहेंगे।
यहां जोखिम भी बहुत बड़ा है। अगर तुर्की के अंदर कुर्द आंदोलन फिर तेज हुआ, तो अर्दोगान सरकार के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी। विश्लेषकों का मानना है कि अगर तुर्की-अमेरिका डील कुर्दों के खिलाफ गई, तो तुर्की के कुर्द पहले हथियार उठा सकते हैं। और अगर डील कुर्दों के हक में गई, तो अर्दोगान के लिए घरेलू राजनीति मुश्किल हो जाएगी।
4. ईरान का एंगल: पहले ही खेल बिगाड़ चुका है
पिछले 2 साल में ईरान ने इराकी कुर्द क्षेत्र में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। तेहरान का तर्क है कि इराकी कुर्दिस्तान का इस्तेमाल इज़राइल और अमेरिका जासूसी के लिए कर रहे हैं।
ईरान के इन हमलों से इराकी कुर्द कमजोर हुए हैं। अब अमेरिका के पास इराक के जरिए ईरान पर दबाव बनाने का विकल्प कम बचा है। इसलिए ध्यान तुर्की की तरफ शिफ्ट हुआ है।
ईरान भी इसे समझता है। तेहरान ने कई बार चेतावनी दी है कि अगर तुर्की की जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हुआ तो जवाबी कार्रवाई होगी।
5. तुर्की के लिए फायदे और फंसने का डर
अर्दोगान के लिए अमेरिका से नजदीकी के 3 फायदे हैं:
1. अर्थव्यवस्था: तुर्की की लीरा कमजोर है। अमेरिकी निवेश और व्यापार से राहत मिल सकती है
2. रक्षा: F-16 अपग्रेड और NATO में अहम भूमिका से सेना मजबूत होगी
3. क्षेत्रीय ताकत: सीरिया और काकेशस में तुर्की का प्रभाव बढ़ेगा
लेकिन फंसने का डर भी उतना ही बड़ा है:
1. अगर अमेरिका कुर्दों को फिर कार्ड की तरह इस्तेमाल करता है तो तुर्की के अंदर गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन सकती है
2. रूस से रिश्ते खराब होंगे। S-400 के बाद रूस तुर्की का बड़ा साथी बना था
3. मुस्लिम दुनिया में तुर्की की छवि को नुकसान हो सकता है अगर उसे "अमेरिका-इज़राइल का साथी" कहा गया
6. आगे क्या हो सकता है? 3 संभावित सिनेरियो
सिनेरियो 1: सीमित सहयोग
अमेरिका और तुर्की खुफिया जानकारी और बेस के इस्तेमाल पर डील करते हैं। कुर्द मुद्दे को जानबूझकर ठंडा रखा जाता है। ईरान पर दबाव बढ़ता है लेकिन सीधी लड़ाई नहीं होती।
सिनेरियो 2: कुर्द कार्ड खुलता है
अगर अमेरिका-ईरान तनाव युद्ध में बदलता है, तो अमेरिका सीरियाई और तुर्की कुर्द समूहों को फिर से सक्रिय कर सकता है। इससे तुर्की के अंदर अस्थिरता बढ़ेगी और अर्दोगान के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
सिनेरियो 3: डील टूटती है
अगर अर्दोगान को लगता है कि अमेरिका कुर्दों को ज्यादा छूट दे रहा है, तो वह फिर रूस और चीन की तरफ झुक सकता है। 2019 में भी ऐसा ही हुआ था।
नया शीत युद्ध, नए मोहरे
अमेरिका-तुर्की की नई नजदीकी सिर्फ दो देशों की दोस्ती नहीं है। यह पश्चिम एशिया के पूरे पावर बैलेंस को बदलने की कोशिश है।
यूरोप पर अविश्वास और इज़राइल पर घटता भरोसा, ये दो वजहें मीडिया में हैं। लेकिन जमीन पर खेल कुर्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। कुर्द न तो मोहरा बनना चाहते हैं, न ही फिर से कुचले जाना चाहते हैं।
अर्दोगान के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही है। अमेरिका का साथ दें तो कुर्द भड़केंगे। कुर्दों को दबाएं तो अमेरिका नाराज होगा।
ट्रंप के लिए तुर्की एक "प्लान B" है। लेकिन प्लान B अगर फेल हुआ तो पूरे क्षेत्र में आग लग सकती है। क्योंकि इस बार लड़ाई सिर्फ सरकारों की नहीं होगी, यह कौमों की, सरहदों की और 100 साल पुराने अधूरे वादों की लड़ाई होगी।
और इस लड़ाई के केंद्र में वही लोग होंगे जिनका अपना कोई देश आज तक नहीं बना: कुर्द।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Jul 18 2026