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Monday, 20 July 2026

दिल्ली के युवा आंदोलन पर अत्याचार: लोकतंत्र मे असहमति अपराध नही है। असहमति को कुचलना असली अपराध है।

दिल्ली के युवा आंदोलन पर अत्याचार: लोकतंत्र मे असहमति अपराध नही है। असहमति को कुचलना असली अपराध है।
-Friday World Jul 20 2026 
दिल्ली की सड़कें एक बार फिर युवा ऊर्जा से गूंज रही हैं। लेकिन इस बार यह ऊर्जा सिर्फ नारों की नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता की है। परीक्षा पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्याएं, शिक्षा व्यवस्था का सत्यानाश और युवाओं के सपनों का अपमान – इन मुद्दों पर उबलते हुए हजारों युवा “चलो संसद” मार्च के लिए जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए। मांग सिर्फ एक थी: शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और शिक्षा सुधार। लेकिन सत्ता का जवाब क्या मिला? लाठीचार्ज, टियर गैस के गोले और बर्बर दमन।

यह कोई साधारण प्रदर्शन नहीं था। “कॉकroach जनता पार्टी” (CJP) जैसे युवा-प्रेरित आंदोलन ने सोशल मीडिया से सड़कों तक सफर तय किया। सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् ने भूख हड़ताल की, छात्रों की आवाज बने। लेकिन सत्ता ने इसे “अराजकता” का नाम देकर कुचलने की कोशिश की। जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़ते युवाओं पर पुलिस ने लाठियां बरसाईं, आंसू गैस के गोले दागे। युवा चोटिल हुए, आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए और मीडिया का बड़ा हिस्सा चुप रहा।

 युवाओं का गुस्सा: शिक्षा व्यवस्था की नाकामी

भारत में लाखों छात्र हर साल NEET, JEE जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सपना होता है डॉक्टर बनने का, इंजीनियर बनने का, देश की सेवा करने का। लेकिन पेपर लीक, घोटाले और महंगी कोचिंग इंडस्ट्री ने इस सपने को चूर-चूर कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल के वर्षों में 20 से ज्यादा छात्रों ने परीक्षा संबंधी तनाव और असफलता के कारण आत्महत्या कर ली। परिवार बर्बाद हो गए, सपने टूट गए।

CJP आंदोलनकारियों ने इन मुद्दों को उठाया। वे सिर्फ इस्तीफा नहीं, बल्कि ठोस सुधार चाहते थे – पेपर लीक रोकने के लिए बेहतर सुरक्षा, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सपोर्ट, शिक्षा को व्यावसायिककरण से मुक्त करना। यह युवा पीढ़ी की आवाज थी जो कह रही थी: “हमारे भविष्य से खेलबाड़ बंद करो।”

 पुलिस कार्रवाई: लोकतंत्र का कलंक

20 जुलाई 2026 को “चलो संसद” मार्च के दौरान जो हुआ, वह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। अनुमति न मिलने के बावजूद हजारों युवा शांतिपूर्वक इकट्ठा हुए। लेकिन पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया – **लाठीचार्ज, टियर गैस**। वीडियो फुटेज में युवा भागते दिखे, कुछ गिरे, कुछ चोटिल हुए।

संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है। लेकिन सत्ता जब घिरती है तो पहले संवाद का रास्ता बंद करती है, फिर दमन का सहारा लेती है। क्या युवाओं की मांगें इतनी खतरनाक थीं कि उन्हें गैस के गोले से रोका जाना जरूरी था? क्या लाठी मारकर शिक्षा सुधार रुक जाएगा?

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल को भी अस्पताल में भर्ती कर जबरन रोकने की कोशिश की गई। एक व्यक्ति जो अपने शरीर को हथियार बनाकर सत्याग्रह कर रहा था, उसे भी सहन नहीं किया गया। यह गांधीवादी परंपरा का अपमान है।

 गोदी मीडिया का मौन: सच्चाई का गला घोंटना

देश के बड़े-बड़े न्यूज चैनल और अखबार इस घटना पर पर्याप्त कवरेज नहीं दे रहे। कुछ तो इसे “छोटी घटना” बता रहे हैं या पूरी तरह अनदेखा कर रहे। जबकि सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं – युवा चिल्ला रहे हैं, पुलिस लाठियां चला रही है।

“गोदी मीडिया” का आरोप यहीं सही साबित होता दिख रहा है। जब सत्ता के खिलाफ आवाज उठती है तो कई मीडिया हाउस चुप हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई दब नहीं सकती। युवा आज सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात सीधे देश तक पहुंचा रहे हैं।

 लोकतंत्र की असली पहचान: संवाद, न कि दमन

लोकतंत्र में विरोध की आवाज को कुचला नहीं जाता, सुना जाता है। महात्मा गांधी, डॉ. अंबेडकर, जयप्रकाश नारायण – सभी ने आंदोलनों के जरिए बदलाव लाया। आज के युवा भी वही कर रहे हैं। वे हिंसा नहीं, जवाबदेही चाहते हैं।

प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज की हम कड़ी निंदा करते हैं। यह न सिर्फ युवाओं का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का। सरकार को चाहिए कि:

- शिक्षा मंत्री इस्तीफा दें या जवाबदेही तय करें।
- पेपर लीक की स्वतंत्र जांच हो।
- छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू हों।
- प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित किया जाए।

युवा शक्ति: भारत का भविष्य

यह आंदोलन सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं। पूरे देश के युवा जुड़ रहे हैं। वे “कॉकroach” वाली व्यंग्यात्मक छवि को हथियार बनाकर सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं। यह पीढ़ी शिक्षित, जागरूक और असहिष्णु है – भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ।

इतिहास गवाह है कि जब युवा एकजुट होते हैं तो बदलाव अनिवार्य हो जाता है। 1970 के दशक के छात्र आंदोलन हो या हाल के किसान आंदोलन – युवा ऊर्जा ने हमेशा सत्ता को झुकाया है।

 आगे का रास्ता: संवाद और सुधार

दमन से समस्या हल नहीं होती, बल्कि गहराती है। सरकार को युवाओं की पीड़ा समझनी चाहिए। शिक्षा राष्ट्र का आधार है। अगर युवा टूट गए तो देश का भविष्य क्या होगा?

हम सभी नागरिकों, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों और छात्रों से अपील करते हैं – इस आंदोलन के साथ खड़े हों। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद करें। मीडिया से अपील है कि निष्पक्ष कवरेज दें।

लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता अपनी गलतियों को सुधारने का साहस दिखाती है। लाठी और गैस से नहीं, संवाद से समस्याओं का हल निकलता है।

दिल्ली के इन युवाओं को सलाम। वे न सिर्फ अपने भविष्य, बल्कि पूरे देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए लड़ रहे हैं। आंदोलन जारी रहे, लेकिन शांतिपूर्ण रहे। सत्ता सुन ले – युवा अब चुप नहीं रहेंगे।


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Jul 20 2026 

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