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Monday, 24 August 2026

मुंबई में ऑटो-टैक्सी हड़ताल: “60 साल की उम्र में मराठी कैसे सीखें, 15-20 हजार जुर्माना कैसे भरें?”

मुंबई में ऑटो-टैक्सी हड़ताल: “60 साल की उम्र में मराठी कैसे सीखें, 15-20 हजार जुर्माना कैसे भरें?”
-Friday World 25 Aug 2026
मुंबई की व्यस्त सड़कों पर सोमवार से ऑटो-रिक्शा और टैक्सी के पहिए थम गए। मराठी भाषा की अनिवार्यता के खिलाफ ड्राइवरों ने तीन दिन की हड़ताल शुरू कर दी है। कंदिवली लिंक रोड समेत कई इलाकों में प्रदर्शन हुए, सड़क जाम किए गए और यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। हड़ताल में शामिल ज्यादातर गैर-मराठी भाषी ड्राइवर हैं जो सालों से मुंबई में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं।

ड्राइवरों का सबसे बड़ा दर्द उम्र और शिक्षा का है। कई चालक 55 से 60 साल के हैं। एक ड्राइवर ने कहा, “हम कभी स्कूल नहीं गए। अगर पढ़े-लिखे होते तो ऑफिस में बैठते। अब इस उम्र में नई भाषा कैसे सीखें?” कई लोग टूटी-फूटी मराठी बोलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि फिर भी नोटिस और जुर्माने का डर बना हुआ है। 15 से 20 हजार रुपये के जुर्माने की अफवाहें फैली हुई हैं। रोजाना की कमाई से गुजारा करने वाले इन ड्राइवरों के लिए इतना बड़ा जुर्माना भारी बोझ है।

महाराष्ट्र सरकार ने व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों के लिए मराठी का कामकाजी ज्ञान अनिवार्य किया है। परिवहन विभाग का तर्क है कि यात्रियों से बेहतर संवाद और स्थानीय संस्कृति की रक्षा के लिए यह जरूरी है। आरटीओ अधिकारियों ने 20 अगस्त से जांच शुरू की। हजारों ड्राइवरों की जांच हुई और जो मराठी में पर्याप्त ज्ञान नहीं दिखा पाए, उन्हें नोटिस जारी किए गए। नोटिस के बाद एक महीने का समय सीखने के लिए दिया जाता है। अगर फिर भी नहीं सीख पाए तो लाइसेंस और बैज तीन महीने के लिए सस्पेंड हो सकता है। बार-बार उल्लंघन पर रद्द होने का प्रावधान भी है।

सरकार का पक्ष यह भी है कि पहले से ही प्रशिक्षण अभियान चलाया जा रहा है। लाखों ड्राइवरों ने मराठी कक्षाओं में हिस्सा लिया। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि हिंदी भाषी ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ बनने की जरूरत नहीं है। सिर्फ कामकाज के लिए पर्याप्त मराठी जानना काफी है। उन्होंने कहा कि समय पहले भी बढ़ाया जा चुका है और जरूरत पड़ने पर फिर बढ़ाया जाएगा। किसी के साथ भाषा के आधार पर अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।

फिर भी ड्राइवरों में भय बना हुआ है। कई प्रवासी चालक बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से आए हैं। वे कहते हैं कि मुंबई उनकी दूसरी घर है, लेकिन अचानक भाषा की शर्त उनके परिवार की रोजी-रोटी पर संकट ला सकती है। कुछ ड्राइवरों ने आरोप लगाया कि स्थानीय मराठी भाषी चालक भी उन्हें धमका रहे हैं। प्रदर्शन के दौरान कुछ जगहों पर अन्य ड्राइवरों को रोकने की कोशिशें भी हुईं।

इस हड़ताल का असर आम यात्रियों पर भी पड़ा। पश्चिमी उपनगरों में ऑटो मिलना मुश्किल हो गया। स्टेशन पहुंचने में देरी हुई, ऑफिस जाने वाले लोग परेशान हुए। मुंबई जैसे शहर में जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भरता बहुत ज्यादा है, तीन दिन की हड़ताल सामान्य जीवन को प्रभावित कर सकती है।

भाषा का मुद्दा महाराष्ट्र में हमेशा संवेदनशील रहा है। स्थानीय पहचान और संस्कृति की रक्षा एक तरफ, तो दूसरी तरफ कामगारों की आजीविका और व्यावहारिक कठिनाइयां। दोनों पक्षों के तर्क अपने-अपने स्थान पर सही लगते हैं। सरकार अगर पर्याप्त समय, आसान प्रशिक्षण और स्पष्ट दिशानिर्देश दे तो समाधान निकल सकता है। ड्राइवर भी स्थानीय भाषा सीखने की कोशिश करें तो आपसी समझ बढ़ेगी।

अभी हड़ताल जारी है। दोनों तरफ से बातचीत और स्पष्टता की जरूरत है। मुंबई की सड़कें फिर से सामान्य हों, ड्राइवर बिना डर के काम करें और यात्री आसानी से सफर कर सकें—यही सबकी इच्छा है। भाषा किसी को जोड़ने का माध्यम बने, तोड़ना का नहीं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 25 Aug 2026

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