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Monday, 17 August 2026

"कागजों पर चल रहा स्कूल, हकीकत में 'चोरी': संजय सिंह के औचक निरीक्षण ने खोली सुल्तानपुर की शिक्षा व्यवस्था की पोल"

"कागजों पर चल रहा स्कूल, हकीकत में 'चोरी': संजय सिंह के औचक निरीक्षण ने खोली सुल्तानपुर की शिक्षा व्यवस्था की पोल"
-Friday World 17 Aug 2026
                    प्रतीकात्मक तस्वीर 
15 अगस्त 2026। पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था। तिरंगे लहर रहे थे, स्कूलों में राष्ट्रगान गूंज रहा था। लेकिन उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के जयसिंहपुर विधानसभा क्षेत्र के रोहिलपारा गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग थी। 

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद और उत्तर प्रदेश प्रभारी संजय सिंह अचानक रोहिलपारा प्राथमिक विद्यालय पहुंच गए। उनके साथ कोई प्रोटोकॉल नहीं, कोई पूर्व सूचना नहीं। जो देखा, उसने न सिर्फ सांसद को झकझोर दिया बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।

"यह स्कूल नहीं, खंडहर है"

संजय सिंह ने स्कूल परिसर से सीधा वीडियो जारी किया। वीडियो में जो दिखा वह सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को साफ दिखा देता है।

खिड़की से अंदर झांकते हुए संजय सिंह ने कहा: "देखिए, कमरों में ताले लटके हैं। टेबल-कुर्सियों पर इतनी धूल जमी है जैसे महीनों से किसी ने हाथ नहीं लगाया। चारों तरफ मकड़ी के जाले हैं। दीवारों पर रंग-पेंट का सामान रखा है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई का कोई नामोनिशान नहीं।"

उन्होंने आगे कहा, "यह विद्यालय कागजों पर चल रहा है। हकीकत में यह चोरी हो चुका है। बच्चों का भविष्य, शिक्षा का बजट, शिक्षकों की तनख्वाह सब कागजों में चल रहा है।"

ग्रामीणों का दर्द: मजबूरी में बंद कर दी पढ़ाई

वीडियो में स्थानीय ग्रामीण भी नजर आए। उनकी आंखों में गुस्सा और मायूसी दोनों थी। ग्रामीणों ने बताया कि स्कूल की बदहाली देखकर उन्होंने अपने बच्चों को यहां भेजना ही बंद कर दिया है। 

"साहब, यहां मास्टर साहब कभी कभार आते हैं। बच्चे आएं तो बैठे कहां? पीने का पानी नहीं, शौचालय बंद, छत टपकती है। इसलिए हम लोग बच्चों को 3 किलोमीटर दूर दूसरे गांव के स्कूल भेजते हैं," एक ग्रामीण ने कैमरे पर कहा।

दूसरे अभिभावक ने कहा, "सरकार हर साल कहती है स्कूल का कायाकल्प हुआ, फर्नीचर आया, स्मार्ट क्लास लगी। पर यहां तो 5 साल से यही हाल है।"

15 अगस्त पर तिरंगा भी नहीं लहराया

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी इस स्कूल में कोई गतिविधि नहीं थी। न तिरंगा, न प्रार्थना, न बच्चों की भीड़। जबकि सरकारी निर्देश है कि हर सरकारी स्कूल में स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया जाए। 

संजय सिंह ने इसी ओर इशारा करते हुए कहा, "जब देश आजादी मना रहा है, तब यहां लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर बंद पड़ा है। यह शिक्षा के साथ धोखा है। यह संविधान के साथ धोखा है।"

कागजों का खेल और जमीनी सच्चाई

उत्तर प्रदेश में 'ऑपरेशन कायाकल्प' के तहत हजारों स्कूलों को चमकाने का दावा किया जाता है। बजट में करोड़ों रुपये शिक्षा के लिए आवंटित होते हैं। एमडीएम, यूनिफॉर्म, किताबें, छात्रवृत्ति सबकी व्यवस्था कागजों पर दुरुस्त है।

लेकिन रोहिलपारा का उदाहरण बताता है कि जमीनी स्तर पर निगरानी के नाम पर कुछ नहीं है। 
- शिक्षक: उपस्थिति रजिस्टर में नाम होंगे, लेकिन क्लास में कौन?
- बुनियादी सुविधाएं: फंड आया, सामान खरीदा गया दिखाया जाएगा, लेकिन उपयोग कहां?
- नामांकन: बच्चों के नाम दर्ज होंगे, लेकिन वे स्कूल आते ही नहीं।

यही कारण है कि संजय सिंह ने इसे "कागजी स्कूल" कहा।

संजय सिंह का हमला: "शिक्षा माफिया हावी"

वीडियो जारी करने के बाद संजय सिंह ने सोशल मीडिया पर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: "भाजपा सरकार शिक्षा को चौपट कर रही है। स्कूल बंद हैं, पर वसूली चालू है। गरीब का बच्चा अनपढ़ रहे, यही इनकी नीति है।"

उन्होंने मांग की कि:
1. रोहिलपारा स्कूल की तुरंत जांच कराकर दोषी अधिकारियों और शिक्षकों पर कार्रवाई हो
2. स्कूल को 15 दिन में दुरुस्त कर बच्चों की पढ़ाई शुरू कराई जाए
3. पूरे सुल्तानपुर जिले के सभी प्राथमिक विद्यालयों का औचक निरीक्षण हो

उन्होंने यह भी कहा कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर ऐसे "भूतहा स्कूलों" की लिस्ट बनाएंगे और सदन में मुद्दा उठाएंगे।

शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल

रोहिलपारा की घटना अकेली नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का आईना है।

 1. जवाबदेही का अभाव: खंड शिक्षा अधिकारी से लेकर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी तक, किसी को पता नहीं कि स्कूल चल रहा है या नहीं। निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति।

 2. समुदाय की दूरी: जब अभिभावकों का स्कूल से भरोसा उठ जाए तो सरकारी तंत्र अकेला कुछ नहीं कर सकता। स्कूल और समाज के बीच का रिश्ता टूट चुका है।

 3. बजट बनाम परिणाम: हर साल शिक्षा का बजट बढ़ता है, पर लर्निंग आउटकम गिरता है। पैसा कहां जा रहा है, यह सबसे बड़ा सवाल है।

 4. राजनैतिक इच्छाशक्ति: चुनाव में शिक्षा मुद्दा नहीं बनती। सड़क, बिजली, मंदिर बनते हैं। पर क्लासरूम की दीवारें गिरती रहती हैं।

आगे का रास्ता क्या?

संजय सिंह के इस औचक निरीक्षण के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है। सूत्रों के मुताबिक बीएसए को रिपोर्ट तलब की गई है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई सिर्फ कैमरा आने पर ही क्यों?

शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके लिए 3 चीजें जरूरी हैं:

सोशल ऑडिट: गांव की शिक्षा समिति को असली ताकत दी जाए। वही तय करे कि स्कूल चल रहा है या नहीं।

डिजिटल निगरानी: हर स्कूल में बायोमेट्रिक और सीसीटीवी, जिसका डेटा सीधे राज्य स्तर पर जाए।

अभिभावक की भागीदारी: हर महीने अभिभावक बैठक अनिवार्य हो। स्कूल का पैसा और परफॉर्मेंस सार्वजनिक हो।

 आजादी का मतलब सिर्फ झंडा नहीं

15 अगस्त हमें याद दिलाता है कि आजादी का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा से मुक्ति भी है। 

रोहिलपारा प्राथमिक विद्यालय की बंद दीवारें और धूल से सनी कुर्सियां चीख-चीख कर कह रही हैं कि अगर गांव का स्कूल नहीं बचा तो गांव का भविष्य नहीं बचेगा।

संजय सिंह का यह वीडियो एक व्यक्ति का विरोध नहीं है। यह उस हर बच्चे की आवाज है जो पढ़ना चाहता है, लेकिन उसके पास स्कूल नहीं है।

अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। क्या रोहिलपारा का ताला खुलेगा? या यह भी फाइलों में दब जाएगा? आने वाले दिन इसका जवाब देंगे।


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 17 Aug 2026

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