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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 17 August 2026

"आसमान में खामोश कहर: अंसारुल्लाह ने FPV ड्रोन तकनीक से रच दिया युद्ध का नया इतिहास"

"आसमान में खामोश कहर: अंसारुल्लाह ने FPV ड्रोन तकनीक से रच दिया युद्ध का नया इतिहास"
- Friday World 17 Aug 2026
युद्ध की परिभाषा हर दशक में बदलती है। कभी तलवार और घोड़े थे, फिर बंदूक और टैंक आए, उसके बाद मिसाइल और फाइटर जेट। अब 21वीं सदी की सबसे बड़ी क्रांति FPV ड्रोन के रूप में हमारे सामने है। 

यमन में पिछले कई सालों से संघर्ष कर रहे अंसारुल्लाह आंदोलन यानी हूती मुजाहिदीन ने अब पारंपरिक युद्ध के ढांचे को तोड़ते हुए बेहद घातक FPV ड्रोन तकनीक को अपनी युद्धनीति का स्थायी हिस्सा बना लिया है। पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल यमन के अंदर विरोधी गुटों के खिलाफ किया जा चुका है।

यह वही तकनीक है जिसने रूस-यूक्रेन युद्ध का रुख बदल दिया। जिसे लेबनान के हिजबुल्लाह ने अपनाकर दक्षिणी लेबनान में इजराइली सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। अब अंसारुल्लाह ने भी इसे अपना लिया है और यमन के पहाड़ों, वादियों और रेगिस्तान में "खामोश शिकारी" मंडराने लगे हैं।

इस ड्रोन की सबसे खतरनाक विशेषता यह है कि यह कई घंटों तक टार्गेट के ऊपर बिल्कुल शांत अवस्था में मंडराता रहता है। जैसे ही दुश्मन की गाड़ी, बंकर या सैनिकों का दस्ता दिखाई देता है, यह पल भर में हमला करके तबाही मचा देता है।

FPV ड्रोन: तकनीक और ताकत

FPV यानी "First Person View"। मतलब ऑपरेटर जमीन पर बैठकर ऐसे ड्रोन उड़ाता है जैसे वह खुद ड्रोन के अंदर बैठा हो और सामने का नजारा लाइव देख रहा हो।

लेकिन अंसारुल्लाह द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा FPV ड्रोन सिर्फ कैमरा वाला ड्रोन नहीं है। यह "Loitering Munition" है। यानी "मंडराने वाला गोला बारूद"।

इसकी खासियतें:
 1. घंटों की निगरानी: एक बार उड़ान भरने के बाद यह 2 से 4 घंटे तक हवा में रुक सकता है और मौके का इंतजार कर सकता है।
 2. अल्ट्रा साइलेंट: आवाज इतनी कम कि 50 मीटर दूर खड़ा सैनिक भी इसे सुन नहीं पाता।
 3. सर्जिकल स्ट्राइक: हाई-डेफिनिशन कैमरा और थर्मल सेंसर की वजह से यह रात में भी टैंक, तोप या व्यक्ति को सटीक निशाना बना सकता है।
 4. कम लागत: एक आधुनिक मिसाइल 10 लाख डॉलर की होती है। वहीं एक FPV ड्रोन 500 से 2000 डॉलर में तैयार हो जाता है।

5. रडार से बचाव: छोटा आकार और कम ऊंचाई पर उड़ान की वजह से इसे पकड़ना बेहद मुश्किल।

यही कारण है कि इसे आधुनिक युद्ध का "एके-47" कहा जा रहा है।

रूस-यूक्रेन से लेबनान और अब यमन तक का सफर

2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो दोनों तरफ से हजारों FPV ड्रोन इस्तेमाल हुए। वीडियो वायरल हुए जिसमें 500 डॉलर का ड्रोन 50 लाख डॉलर के टैंक को उड़ा रहा था। उस युद्ध ने साबित कर दिया कि अब युद्ध मैदान में संख्या नहीं, तकनीक जीतती है।

इसके बाद लेबनान के हिजबुल्लाह ने इस तकनीक को अपनाया। 2023-2024 में दक्षिणी लेबनान में इजराइली सीमा चौकियों पर हुए FPV हमलों ने इजराइल को मजबूर कर दिया कि वह अपनी पूरी सीमा सुरक्षा प्रणाली बदल दे।

अब बारी अंसारुल्लाह की है। सैन्य सूत्रों के अनुसार अंसारुल्लाह ने पहली बार FPV ड्रोन का इस्तेमाल यमन के मआरिब और ताइज प्रांतों में विरोधी ताकतों के खिलाफ किया। हमले में कई सैन्य वाहन और कमांड सेंटर नष्ट हुए।

अंसारुल्लाह के एक कमांडर ने बयान में कहा: "हमारे पास अब आसमान में आंख है। दुश्मन अब कहीं भी सुरक्षित नहीं है।"

यमन के भूगोल में FPV ड्रोन क्यों है सबसे घातक हथियार?

यमन का इलाका पहाड़ी, पथरीला और रेगिस्तानी है। यहां टैंक और बख्तरबंद गाड़ियों की आवाजाही लगभग नामुमकिन है। सड़कें कम हैं, घात लगाकर हमले आम हैं।

ऐसे भूगोल में FPV ड्रोन अंसारुल्लाह के लिए वरदान बन गया है।

 1. गुरिल्ला युद्ध को नई धार: अंसारुल्लाह पहले से ही गुरिल्ला युद्ध में माहिर है। FPV ने उन्हें "आसमान से देखने वाली आंख" दे दी। अब वे दुश्मन की चाल को घंटों पहले भांप लेते हैं।

 2. नाकेबंदी का तोड़: सऊदी अरब और अन्य देशों की नाकेबंदी के कारण यमन में महंगे हथियार लाना मुश्किल है। लेकिन FPV ड्रोन के पुर्जे छोटे होते हैं और इन्हें स्थानीय स्तर पर असेंबल किया जा सकता है। ईरान से तकनीकी मदद की बात भी सामने आती है।

 3. मनोबल तोड़ने वाला हथियार: जब सैनिक को हर 10 मिनट में लगे कि ऊपर कोई उसे देख रहा है, तो उसका फोकस टूट जाता है। FPV ड्रोन का सबसे बड़ा असर मनोवैज्ञानिक है।

 4. शहरी युद्ध में सटीकता : पारंपरिक हवाई हमले में आम नागरिक मारे जाते हैं। FPV की सटीकता से सिर्फ सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया जा सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय आलोचना कम होती है।

लाल सागर और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर

अंसारुल्लाह पहले से ही लाल सागर में इजराइल और पश्चिमी देशों के जहाजों को निशाना बना रहे हैं। बैलिस्टिक मिसाइल और बड़े ड्रोन का इस्तेमाल हो चुका है।

अब अगर FPV ड्रोन को जहाजों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया तो खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। FPV ड्रोन समुद्र की सतह से 10-15 मीटर ऊपर उड़कर जहाज के कमजोर हिस्से को निशाना बना सकता है। इसका बचाव करना बेहद मुश्किल होगा।

इस वजह से अमेरिका, ब्रिटेन और भारत की नौसेना के लिए लाल सागर में नई चुनौती खड़ी हो गई है।

सऊदी अरब और यूएई भी अब अपनी सीमा पर "एंटी-ड्रोन गन" और "जैमर सिस्टम" लगाने में जुट गए हैं।

दुनिया के लिए 3 बड़े सबक

पहला सबक: युद्ध सस्ता हो गया है
पहले युद्ध लड़ने के लिए अरबों डॉलर का बजट चाहिए था। अब एक छोटा संगठन भी कुछ हजार डॉलर में ऐसी तकनीक बना सकता है जो करोड़ों की सेना को परेशान कर दे।

दूसरा सबक: प्रॉक्सी युद्ध का नया मॉडल
ईरान ने दिखाया है कि वह अपने सहयोगियों को हाई-टेक लेकिन कम लागत वाले हथियार देकर पूरे क्षेत्र में प्रभाव बढ़ा सकता है। अंसारुल्लाह इसका सबसे ताजा उदाहरण है।

तीसरा सबक: डिफेंस सिस्टम फेल हो रहे हैं
अमेरिका का पैट्रियट मिसाइल सिस्टम भी FPV जैसे छोटे और सस्ते ड्रोन को रोकने में नाकाम है। क्योंकि एक मिसाइल की कीमत में 100 ड्रोन आ जाते हैं।

इसका तोड़ क्या है?

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार FPV ड्रोन से बचने के लिए "मल्टी-लेयर डिफेंस" चाहिए।

 1. इलेक्ट्रॉनिक जैमर: ड्रोन और ऑपरेटर के बीच का रेडियो सिग्नल काट देना।

2. डायरेक्टेड एनर्जी वेपन: लेजर और हाई-पावर माइक्रोवेव जो हवा में ही ड्रोन को जला दें।

3. AI रडार: जो चिड़िया और ड्रोन में फर्क कर सके।

4. शॉटगन और नेट गन: पास आने पर आखिरी बचाव।

लेकिन ये सभी सिस्टम बहुत महंगे हैं और इन्हें हर चौकी पर लगाना संभव नहीं।

मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय कानून

यमन पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट से गुजर रहा है। लाखों लोग भूखे हैं, अस्पताल बंद हैं।

FPV ड्रोन के आने से जमीनी लड़ाई और तेज होने की आशंका है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि नई तकनीक के इस्तेमाल से आम नागरिकों को निशाना बनाने का खतरा बढ़ गया है।

सवाल यह है कि क्या दुनिया FPV ड्रोन के इस्तेमाल पर कोई अंतरराष्ट्रीय नियम बनाएगी? या यह भी क्लस्टर बम की तरह एक अनियंत्रित हथियार बन जाएगा?

विशेषज्ञों की राय

रक्षा विश्लेषक कर्नल रिटा. संजय पांडे कहते हैं: "अंसारुल्लाह का FPV अपनाना इस बात का संकेत है कि भविष्य की जंगें स्टेट बनाम स्टेट नहीं होंगी। बल्कि स्टेट बनाम सशस्त्र समूह होंगी। और उन समूहों के पास भी आधुनिक तकनीक होगी।"

मध्य पूर्व मामलों के जानकार डॉ. फैजल अहमद का कहना है: "यह सिर्फ यमन की लड़ाई नहीं है। यह इस बात का परीक्षण है कि 21वीं सदी में कमजोर देश तकनीक के जरिए शक्तिशाली देशों को कैसे चुनौती दे सकते हैं।"

 युद्ध का भविष्य बदल चुका है*

अंसारुल्लाह द्वारा FPV ड्रोन को अपनाना एक छोटी खबर नहीं है। यह युद्ध के इतिहास में एक मील का पत्थर है।

जिस तरह 1947 में परमाणु बम ने युद्ध बदल दिया, जिस तरह 1990 में ड्रोन ने युद्ध बदला, उसी तरह 2025-26 में FPV ड्रोन युद्ध की पूरी परिभाषा बदल देगा।

अब युद्ध में जीत उसके पास नहीं होगी जिसके पास सबसे बड़ा टैंक है। जीत उसके पास होगी जिसके पास सबसे स्मार्ट और सस्ता ड्रोन है।

यमन के आसमान में मंडरा रहा यह खामोश शिकारी हमें याद दिलाता है कि तकनीक किसी की मोहताज नहीं होती। वह या तो सुरक्षा देती है या विनाश।

अब गेंद दुनिया के बड़े देशों के पाले में है। क्या वे इस नई हकीकत को स्वीकार करेंगे या पुरानी किताबों से युद्ध लड़ते रहेंगे?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 17 Aug 2026


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