-Friday World September 18,2026
मिडिल ईस्ट में वो हो रहा है जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक असंभव लगती थी। एक तरफ यमन के हूती विद्रोहियों की मिसाइलें सऊदी अरब की नींद उड़ा रही हैं, तो दूसरी तरफ इजरायल, जो कभी अरब दुनिया का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता था, आज उसी सऊदी के लिए ढाल बनने को तैयार खड़ा है। और इसी बीच अबू धाबी से आई एक खबर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है - कुवैत अगले 6 महीनों में इजरायल को मान्यता दे सकता है।
सऊदी अरब ने इजरायल से क्यों मांगी मदद?
रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने पिछले दिनों इजरायली अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक की है। एजेंडा सिर्फ एक था - हूती विद्रोहियों के लगातार बढ़ते ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों से कैसे बचा जाए।
हूती विद्रोही, जिन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है, ने पिछले दो सालों में सऊदी के तेल ठिकानों, हवाई अड्डों और राजधानी रियाद तक को निशाना बनाया है। अमेरिका का पैट्रियट सिस्टम कई बार नाकाम रहा है। वहीं इजरायल के पास आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो-3 जैसी दुनिया की सबसे एडवांस एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी है। सऊदी को समझ आ गया है कि इस्लामिक दुनिया के कई देश सिर्फ बयानबाजी कर रहे हैं, जमीन पर मदद कोई नहीं कर रहा।
इजरायल के लिए ये एक गोल्डन चांस है। अगर वह सऊदी को हूतियों से बचाने में कामयाब रहा, तो यह सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं, बल्कि रिश्तों की नई नींव होगी।
कुवैत का बड़ा धमाका: अब्राहम अकॉर्ड की छठी वर्षगांठ पर ऐतिहासिक ऐलान
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ी खबर UAE से आई। संयुक्त अरब अमीरात में इजरायल के राजदूत योसी शेली ने मंगलवार को इजरायली चैनल 'कान' को दिए इंटरव्यू में कहा कि कुवैत अगले छह महीनों में अब्राहम समझौते में शामिल हो सकता है।
यह बयान अब्राहम समझौते की छठी वर्षगांठ पर आया है। साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में UAE, बहरीन और मोरक्को ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। अगर कुवैत इसमें शामिल होता है, तो यह तेल अवीव के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।
कुवैत क्यों है सबसे मुश्किल किला?
मिडिल ईस्ट के ज्यादातर देशों में राजशाही है जहां अमीर का फैसला अंतिम होता है। लेकिन कुवैत अलग है। यहां संसद बहुत शक्तिशाली है। कुवैती संसद में इस्लामी और अरब राष्ट्रवादी गुटों का दबदबा है और दोनों के लिए ही इजरायल का विरोध एक वैचारिक सिद्धांत है। आज तक कुवैत ने इजरायल के साथ किसी भी तरह के सामान्यीकरण का सबसे मुखर विरोध किया है।
फिर बदलाव क्यों? इसका जवाब है - सत्ता का समीकरण। कुवैत की विदेश नीति का अंतिम फैसला जनता या संसद नहीं, बल्कि अमीर मेशाल अल-अहमद अल-जाबेर अल-सबा लेते हैं। जानकारों का मानना है कि ईरान के बढ़ते प्रभाव और क्षेत्रीय सुरक्षा के खतरे को देखते हुए कुवैती नेतृत्व अब व्यावहारिक फैसले लेना चाहता है। इजरायल के साथ आने से कुवैत को अमेरिकी और पश्चिमी देशों में सुरक्षा और टेक्नोलॉजी का बड़ा सपोर्ट मिल सकता है।
क्या सऊदी अरब भी करने जा रहा है हस्ताक्षर?
असली सवाल यही है। जानकार मानते हैं कि कुवैत अगर अब्राहम अकॉर्ड में आता है तो यह सऊदी अरब के लिए रास्ता साफ करने जैसा होगा। सऊदी अरब इस्लामिक दुनिया का लीडर है। अगर उसने इजरायल को मान्यता दी तो कई और छोटे खाड़ी देश खुद-ब-खुद इस कतार में आ जाएंगे।
इजरायल की रणनीति साफ है - पहले सुरक्षा, फिर व्यापार, और फिर मान्यता। हूतियों के खिलाफ मदद देकर वह सऊदी का भरोसा जीतना चाहता है। एक बार भरोसा बन गया तो दस्तखत तो सिर्फ एक औपचारिकता रह जाएगी।
मिडिल ईस्ट अब धर्म से ज्यादा सुरक्षा और बिजनेस की भाषा समझ रहा है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, यह कहावत अब इस क्षेत्र में सच होती दिख रही है। आने वाले छह महीने मिडिल ईस्ट का भविष्य तय करेंगे।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 18,2026
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