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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 21 September 2026

"हमारे पूर्वज काबा को सोने से सजाते थे, तुम्हारे लूटते थे" - बिन सलमान को अंसारुल्लाह के प्रवक्ता हिज़ाम अल-असद का ऐतिहासिक करारा जवाब!

"हमारे पूर्वज काबा को सोने से सजाते थे, तुम्हारे लूटते थे" - बिन सलमान को अंसारुल्लाह के प्रवक्ता हिज़ाम अल-असद का ऐतिहासिक करारा जवाब
-Friday World September 21,2026 
यमन की राजधानी सना से उठी एक आवाज ने रियाद के शाही महलों की दीवारों को हिला दिया है। अंसारुल्लाह आंदोलन के प्रवक्ता हिज़ाम अल-असद ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के नाम एक ऐसा संदेश जारी किया है, जो सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि इतिहास, वंश और ईमान की गहरी जड़ों पर किया गया प्रहार है।

अल-असद ने कहा, “जब हमारे पूर्वज काबा को शुद्ध सोने से सजाए गए रेशमी कपड़े से ढकते थे, उस समय तुम्हारे पूर्वज नज्द में हाजियों का रास्ता रोकते थे और उन्हें लूटते थे। और आज तुम अंसार की औलाद पर काबा को निशाना बनाने का आरोप लगाते हो, जबकि तुम्हारे पूर्वजों ने अंसार की तलवारों के डर से इस्लाम कबूल किया था।”

यह एक वाक्य नहीं, सदियों का हिसाब है।

काबा की खिदमत का इतिहास और यमन का रिश्ता

इतिहास गवाह है कि काबा को किस्वा पहनाने की परम्परा यमन से शुरू हुई थी। कहा जाता है कि हिम्यर के राजा तब्बा अबू करब असअद अल-कामिल पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने काबा को यमनी बुने हुए कपड़े से ढका था। यमन के लोग, जिन्हें अंसार कहा जाता है, मदीना में पैगंबर-ए-इस्लाम का स्वागत करने वाले और इस्लाम के पहले मददगार थे। उनके हाथों से ही काबा की हिफाजत और उसकी खूबसूरती का सिलसिला शुरू हुआ। शुद्ध रेशम पर सोने के तारों से लिखी आयतें, वह सिर्फ कपड़ा नहीं था, वह ईमान और मोहब्बत की चादर थी।

दूसरी तरफ नज्द का इतिहास क्या है? इस्लामी इतिहास की किताबें बताती हैं कि नज्द का क्षेत्र हमेशा से लूटमार और काफिलों पर हमलों के लिए बदनाम रहा। जब हज के काफिले यमन, शाम और मिस्र से निकलते थे, तो नज्द के रेगिस्तान में उन्हें लूट लिया जाता था। हाजी जिनके पास सालों की कमाई होती थी, उन्हें निहत्था करके छोड़ दिया जाता था। यह फर्क है दो नस्लों में - एक जो काबा को सजाती है, दूसरी जो काबा जाने वाले रास्ते को असुरक्षित बनाती है।

आज का आरोप और कल का सच

आज सऊदी हुकूमत और उसके मीडिया का एक ही राग है कि अंसारुल्लाह (हूती) काबा को निशाना बना रहे हैं। हर मिसाइल हमले को मक्का से जोड़कर उम्मत के जज्बात को भड़काने की कोशिश की जाती है। जबकि हकीकत दुनिया जानती है। अंसारुल्लाह का निशाना हमेशा सऊदी के सैन्य अड्डे, तेल के ढांचे और वो महल रहे हैं जहाँ से यमन के मासूम बच्चों पर बम बरसाने का हुक्म दिया जाता है। अंसारुल्लाह ने कभी भी हरमैन शरीफैन की तरफ रुख नहीं किया, क्योंकि उनके दिलों में वही अदब है जो उनके अंसारी पूर्वजों में था।

हिज़ाम अल-असद ने अपने बयान में जिस दूसरी सच्चाई को उजागर किया है, वह और भी चुभने वाली है। उन्होंने कहा कि बिन सलमान के पूर्वजों ने इस्लाम तलवार के डर से कबूल किया था। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि फतह-ए-मक्का के बाद भी नज्द के कई कबीले इस्लाम के खिलाफ खड़े रहे और जब इस्लामी लश्कर की ताकत देखी, खासकर औस और खजरज (अंसार) के जांबाजों की तलवारें देखीं, तो मजबूरी में कलमा पढ़ लिया। उनका इस्लाम दिल से नहीं, खौफ से था। और आज उसी खौफ वाली नस्ल के वारिस इस्लाम के ठेकेदार बने बैठे हैं।

अंसार की औलाद कौन है?

आज यमन के लोग ही असल में अंसार की औलाद हैं। जब सऊदी अरब ने यमन पर जंग थोपी, पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे इन भूखे-प्यासे लेकिन गैरतमंद लोगों ने अपने से कई गुना बड़ी फौज का मुकाबला किया। उन्होंने अपने स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों पर बमबारी सही, लेकिन झुके नहीं। यह वही जज्बा है जो मदीना के अंसार ने दिखाया था - सब कुछ लुटा दिया, लेकिन मेहमान-ए-रसूल को अकेला नहीं छोड़ा।

बिन सलमान आज खुद को इस्लामी दुनिया का लीडर दिखाना चाहते हैं। नियॉन सिटी, सिनेमा हॉल, और पश्चिमी तहजीब को लाकर वह इस्लाम को मॉडर्न बनाना चाहते हैं। लेकिन काबा की चाबी सोने के महलों में रहने से नहीं मिलती। काबा की खिदमत खून में होनी चाहिए। जो कौम कल तक हाजियों को लूटती थी, वह आज हज को एक बिजनेस और वीजा से पैसा कमाने का जरिया बना चुकी है। हज के खर्चे को इतना महंगा कर दिया गया है कि गरीब मुसलमान तड़प कर रह जाता है।

हिज़ाम अल-असद का यह पैगाम सिर्फ बिन सलमान के लिए नहीं, पूरी उम्मत के लिए एक आईना है। वह पूछ रहे हैं कि तुम किसे काबा का दुश्मन बता रहे हो? हम तो वह हैं जिनके बाप-दादा ने काबा को सोने से सजाया था। तुम कौन हो? तुम्हारा इतिहास क्या है? क्या तुम भूल गए कि तुम नज्द के लुटेरे काफिलों की औलाद हो?

यह जंग अब मिसाइलों की नहीं, असल और नस्ल की बन चुकी है। एक तरफ अंसार की औलाद है जो आज भी फिलिस्तीन के लिए भूखी रहकर भी आवाज उठा रही है, और दूसरी तरफ वह हुकूमत है जो इजराइल से हाथ मिला रही है और काबा के साये में कंसर्ट करवा रही है। फैसला उम्मत को करना है कि उसे सोने से काबा सजाने वालों के साथ खड़ा होना है या हाजियों को लूटने वालों की नस्ल के साथ।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 21,2026 

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