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Thursday, 22 October 2026

फ़्रांस में सड़कों पर उतरा सैलाब, मीडिया कह रहा है 'अप्रवासी दंगा', पर सच कुछ और है! फ्रांसीसी नागरिक बोले - हमें जंग नहीं, सादी जिंदगी चाहिए श्रीमान राष्ट्रपति!

फ़्रांस में सड़कों पर उतरा सैलाब, मीडिया कह रहा है 'अप्रवासी दंगा', पर सच कुछ और है! फ्रांसीसी नागरिक बोले - हमें जंग नहीं, सादी जिंदगी चाहिए श्रीमान राष्ट्रपति!
-Friday World Oct 22,2026 
पेरिस: फ़्रांस इस वक्त इतिहास के सबसे बड़े नागरिक आंदोलनों में से एक से गुजर रहा है। पिछले हफ्ते पेरिस से शुरू हुए प्रदर्शन अब लिमोज, मार्सिले, बोर्डो, ल्योन से लेकर 600 से ज्यादा शहरों तक फैल चुके हैं। सरकार कह रही है कि यह छात्रों का विरोध है, मुख्यधारा का मीडिया इसे 'अप्रवासी समस्या' और 'लूटपाट' के रूप में दिखाने में लगा है, लेकिन जमीन पर खड़े लाखों फ्रांसीसी नागरिकों की आवाज कुछ और ही है।

उनकी एक ही मांग है - "हमें सिर्फ एक सादी जिंदगी चाहिए, हमारी सरकार जंगों की फंडिंग बंद करे!"

मीडिया का नैरेटिव vs जमीन की हकीकत

पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से लेकर कई पश्चिमी चैनलों ने इन प्रदर्शनों को "इमिग्रेशन पॉलिसी की विफलता" बताया है। कहा जा रहा है कि विविधता और अप्रवासियों के कारण फ्रांस जल रहा है।

लेकिन फ्रांस के CGT यूनियन की प्रमुख सोफी बिनेट का बयान इस झूठ को उजागर करता है। उन्होंने कहा, "हमारी मांगों पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया गया है।" प्रदर्शनकारी छात्र हों, शिक्षक हों या आम मजदूर, सभी की मांगें एक ही हैं:

1. महंगाई पर लगाम: मिडल ईस्ट में जारी जंग के कारण फ्रांस में फ्यूल की कीमतें 3% से ज्यादा बढ़ गई हैं, एनर्जी कॉस्ट ने घर का बजट तोड़ दिया है।
2. पब्लिक सर्विस में सुधार: स्कूलों की बिल्डिंग जर्जर हैं, क्लास में वेंटिलेशन तक नहीं, टीचरों की कमी है।
3. युद्ध में पैसा नहीं: फ्रांस की जनता नहीं चाहती कि उनके टैक्स का पैसा पर्शियन गल्फ या किसी और जंग में हथियारों पर खर्च हो। राष्ट्रपति मैक्रों खुद मानते हैं कि महंगाई का कारण "पर्शियन गल्फ में हो रहा युद्ध है जिसमें फ्रांस शामिल नहीं था", फिर भी सरकार का बजट 63.4 बिलियन यूरो डिफेंस के लिए रखा गया है।

प्रदर्शनकारी हाथों में तख्तियां लिए हैं जिन पर लिखा है - "PAIX", "NON À LA GUERRE", "peace no war simple life"- यानी शांति चाहिए, जंग नहीं, सादी जिंदगी चाहिए।

सरकार सुनने को तैयार नहीं

17 अक्टूबर को हुए राष्ट्रीय प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने यूनियन नेताओं से मुलाकात की, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं दिया। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टीवी पर आकर "शांति और व्यवस्था" की अपील की, लूटपाट करने वालों को सजा देने की बात कही, लेकिन जनता की मुख्य मांग - जंग की फंडिंग बंद करो और जीवन यापन की लागत कम करो - पर एक शब्द नहीं बोला।

नतीजा यह है कि फ्रांस सरकार की उधारी लागत बढ़कर 5% पर पहुंच गई है, जो जुलाई 2002 के बाद सबसे ज्यादा है। 2500 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है, लेकिन आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा।

श्रीमान राष्ट्रपति, अपने लोगों को सुनिए

फ्रांस के लोग आज यह पूछ रहे हैं कि जब उनके स्कूलों में 3000 सब्स्टीट्यूट टीचरों की कमी है, जब अस्पतालों में स्टाफ नहीं है, तो सरकार अरबों यूरो बाहर की जंगों में क्यों झोंक रही है?

यह अप्रवासी समस्या नहीं है, यह फ्रांसीसी जनता के भविष्य की समस्या है। लिमोज का 142 साल पुराना टाउन हॉल जल रहा है, यह गुस्सा अप्रवासियों का नहीं, बल्कि वर्षों से अनदेखी झेल रहे आम फ्रांसीसी का है।

अगर सरकार ने अभी भी अपने नागरिकों को अनदेखा किया और मीडिया के बनाए "अप्रवासी दंगे" के नैरेटिव में छिपने की कोशिश की, तो यह आंदोलन 2018 के Yellow Vest आंदोलन से भी बड़ा बन जाएगा। फ्रांस की सड़कें कह रही हैं - क्रांति या मौत नहीं, सिर्फ सम्मान के साथ जीने का हक चाहिए।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 22,2026 

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