-Friday World Oct 10th 2026
इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना चल रहा था। मोहर्रम की 9 तारीख थी। राजधानी समेत देश के सबसे बड़े पवित्र शहर को मिलिट्री छावनी में बदल दिया गया था। टैंकों की आवाज, सायरन और बूटों की खट-खट के बीच एक फरमान जारी हुआ - पूरे शहर में धारा 144, चार लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी।
जो रात आने वाली थी, वह आम रात नहीं थी। वह आशूर की रात थी। गम, मजलिस और मातम की रात। और अगला दिन हक और बातिल के फैसले का दिन। तानाशाही हुकूमत जानती थी कि अगर लोग इस रात घरों से बाहर निकले, तो सड़कों पर सैलाब आ जाएगा। इसलिए कर्फ्यू और धारा 144 का जाल बिछाया गया।
इसी घुटन में एक छोटा सा ऑडियो पैगाम रिकॉर्ड हुआ। उस वक्त न व्हाट्सएप था, न फेसबुक, न यूट्यूब। कैसेट थी, जिसे हाथों-हाथ कॉपी किया जाता था। लेकिन वह पैगाम आग की तरह पूरे देश में फैल गया, यहां तक कि महल की दीवारों तक पहुंच गया।
पहला पैगाम - आवाम के नाम
पैगाम में सिर्फ इतना कहा गया था:
"ए मेरी कौम! आज की रात और कल का दिन घर में रहना हराम (.मना) है। जो घर में रहेगा, वह जिंदा लाश है। जो बाहर निकलेगा, वही जिंदा है।"
बस, और कुछ नहीं। लेकिन इस एक जुमले में इतनी ताकत थी कि पूरा शहर सड़कों पर आ गया। लाखों हाथों में मोमबत्तियां, आंखों में आंसू, लब पर एक ही नारा। न टैंक रोक पाए, न बंदूकें।
दूसरा पैगाम - फौज के नाम, जो इतिहास बन गया
उसी रात दूसरा पैगाम जारी हुआ। यह पैगाम बंदूक के सामने खड़े जवानों के नाम था। और आज के हर दौर के हर सिपाही के लिए एक आईना है।
पैगाम कुछ यूं था:
> "ए मेरे देश के जवानों! ए मेरी मिट्टी की वर्दी पहनने वाले बेटो!
> मैं जानता हूं तुम नौकरी करते हो। तुम इस सरकार से तनख्वाह लेते हो। और तनख्वाह लेने वाले का हक है कि वह अपने मालिक से वफादार रहे। मैं तुम्हारी इस वफादारी की इज्जत करता हूं।
> लेकिन मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूं, मेरी बात गौर से सुनना...
> यह वर्दी तुम्हें किसने दी है? इस वर्दी का कपड़ा किसके पसीने से बना है? तुम्हारी राइफल में जो गोली है, वह किसके खून-पसीने के टैक्स से आई है? यह तुम्हारी मां है, यह आवाम है, यह देश है।
> सरकार आती-जाती है, तानाशाह आते-जाते हैं, लेकिन यह देश, यह मिट्टी, यह आवाम हमेशा रहती है।
> तुम्हें हक है कि तुम सरकार के नौकर रहो, यह तुम्हारी मजबूरी हो सकती है। लेकिन तुम्हें यह भी हक है कि तुम एक जालिम हुकूमत से इस्तीफा दे दो।
> मैं तुम्हें हुक्म नहीं दे रहा। मैं तुम्हें आजाद कर रहा हूं।
> तुम आजाद हो!
> तुम्हें फैसला करना है कि तुम्हें किस तरफ खड़ा होना है। क्या तुम उस तख्त के साथ खड़े होना चाहते हो जो कल गिरने वाला है? या तुम उस कौम के साथ खड़े होना चाहते हो, जो आज सड़कों पर अपने बच्चों के भविष्य के लिए रो रही है?
> एक तरफ एक शख्स का महल है, दूसरी तरफ तुम्हारी मां, तुम्हारी बहन, तुम्हारा भाई, जो मोमबत्ती लेकर खड़ा है।
> अगर तुम गोली चलाओगे, तो वह तुम्हारी ही मां के सीने पर लगेगी।
> और अगर तुम अपनी पोस्ट छोड़कर अपनी आवाम के साथ आ जाओगे, तो इतिहास तुम्हें गद्दार नहीं, इस देश का सबसे वफादार बेटा लिखेगा।
> यह तुम्हारी अजादारी है, यह तुम्हारा इम्तिहान है। अब तुम तय करो, तुम किसके हो?"
और फिर क्या हुआ?
कहते हैं कि इस पैगाम को सुनते ही आधी से ज्यादा फौज ने अपनी-अपनी पोस्ट छोड़ दी। किसी ने राइफल जमीन पर रख दी, किसी ने टोपी उतार दी, और जाकर आवाम के साथ खड़ा हो गया। वह रात सिर्फ मातम की रात नहीं रही, वह इंकलाब की रात बन गई।
आज के लिए सबक
यह कहानी 45 साल पुरानी है, लेकिन इसका पैगाम आज भी जिंदा है। दुनिया की हर फौज, हर पुलिस, हर वर्दी के लिए यह एक सवाल है। वर्दी सरकार की होती है, लेकिन वफादारी हमेशा देश और आवाम की होती है।
जब हुकूमत और आवाम आमने-सामने हो, तो फौज को तय करना होता है कि वह महल की रखवाली करेगी या मिट्टी की।
और जो फौज मिट्टी के साथ खड़ी होती है, वही हमेशा के लिए अमर हो जाती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 10th 2026
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