- Friday World Oct 26,2026
बचपन से हम सुनते आए हैं - दूध मतलब संपूर्ण आहार, दूध मतलब अमृत, दूध मतलब सबकुछ। माँ कहती थी एक गिलास दूध पी लो तो दिन भर की ताकत मिल जाएगी। लेकिन आज उसी दूध की बात करें तो कहना पड़ेगा - भाई, तुम्हें पता भी है इस सफेद तरल में कितना काला सच घुला है?
देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट खुद कह चुकी है कि देश में बिक रहा मिलावटी दूध एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है और राज्यों को इस पर तुरंत लगाम लगानी चाहिए। सवाल सिर्फ मिलावट का नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ी की जान का है।
मांग 5% बढ़ी, तो ईमानदारी 50% घटी
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। साल 2024-25 में हमारा कुल उत्पादन लगभग 24.7 करोड़ टन था, जो दुनिया के कुल दूध का 25% है। इसमें सबसे बड़ा योगदान उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र का है - ये 5 राज्य मिलकर 54% दूध देते हैं।
देश की आबादी के साथ दूध की मांग हर साल 5% बढ़ रही है। दूध से दही, मक्खन, घी, पनीर, मिठाई सब बनता है। बस इसी बढ़ती मांग को कुछ लालची व्यापारियों ने नोट छापने की मशीन बना लिया।
FSSAI की रिपोर्ट ने उड़ाए होश
कुछ समय पहले फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने देश के 33 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से दूध के सैंपल उठाए। नतीजा डराने वाला था - 70% सैंपल फेल हो गए। उनमें पानी ही नहीं, बल्कि डिटर्जेंट, यूरिया, फेट और कास्टिक सोडा जैसा अखाद्य जहर मिला। 50 सैंपल में तो घटिया स्किम्ड मिल्क पाउडर और ग्लूकोज मिलाकर दूध को गाढ़ा दिखाया गया था।
मुंबई का हाल देखिए। रोज की जरूरत 40 लाख लीटर है। भैंस के 300 तबेलों से सिर्फ 4 लाख लीटर मिलता है। बाकी 36 लाख लीटर सरकारी और प्राइवेट डेयरियों पर निर्भर है। पिछले साल जांच में पता चला कि 30 लाख लीटर पैकेट वाले दूध में से 8 लाख लीटर में मिलावट थी।
तरीका क्या था? नामी डेयरी की आधी या एक लीटर वाली थैली को ऊपर से हल्का फाड़ो, एक तिहाई शुद्ध दूध निकाल लो, उसकी जगह 90% गंदा पानी, 10% दूध और सफेदी के लिए साबुन बनाने वाला कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट डाल दो। फिर थैली को फिर से इस तरह पैक कर दो कि ग्राहक को शक भी न हो। कहीं-कहीं तो गटर और नाले का पानी और बिना खुशबू वाला शैम्पू भी मिलाया गया।
सिर्फ मुंबई नहीं, पूरा भारत इसकी चपेट में
यह धंधा सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं। गुजरात, दिल्ली, बुलंदशहर, गाजियाबाद, राजस्थान और उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में लाखों लीटर सिंथेटिक दूध रोज बेचा जा रहा है। यह हमारी बदनसीबी है कि सबसे ज्यादा मिलावट उसी चीज में हो रही है जो सबसे ज्यादा जरूरी है।
ये माफिया क्या करते हैं? बाजार से खाली दूध की थैलियाँ खरीदते हैं, उन्हें एक कोने से काटकर एक तिहाई असली दूध निकाल लेते हैं और नकली दूध भर देते हैं। कई बार तो एक बार इस्तेमाल हुई थैलियों को धोए बिना ही गंदा दूध भरकर बेच दिया जाता है।
गाय-भैंस पर भी जुल्म, इंसान पर भी
यह काला धंधा जानवरों से शुरू होता है। पुणे के एक पशु कल्याण संगठन ने दो साल तक पूरे देश में स्टडी की। पता चला कि ज्यादा दूध के लिए गाय, भैंस, बकरी को ऑक्सी-टॉक्सिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इससे हार्मोन तेजी से एक्टिव होते हैं और थन में जल्दी दूध उतर आता है, लेकिन साथ में खून और हड्डी के तत्व भी दूध में आ जाते हैं।
बछड़े को जबरदस्ती माँ से अलग कर दिया जाता है, दूध न देने वाले जानवरों को लाठी और लोहे की जंजीर से पीटा जाता है और सूख जाने पर सीधे कत्लखाने भेज दिया जाता है।
शरीर पर क्या असर होता है?
कास्टिक सोडा और यूरिया से पेट और आंतों में घाव हो जाते हैं, चमड़ी के रोग, हाथ-पैरों में सूजन, दिल, फेफड़े और आंखों की रोशनी पर असर। सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों को होता है। बाल रोग विशेषज्ञ कहते हैं कि केमिकल वाला दूध पीने से बच्चों के आंत, लिवर, किडनी खराब होते हैं, दिमाग का विकास रुक जाता है और कोमल हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचता है।
सबसे बड़ी समस्या - असली और नकली दूध में फर्क करना बहुत मुश्किल है। फैट नापने वाला लैक्टोमीटर भी कास्टिक सोडा, यूरिया और डिटर्जेंट वाले सिंथेटिक दूध को नहीं पकड़ पाता। NDRI करनाल के वैज्ञानिकों ने एक विशेष उपकरण बनाने का दावा किया है, लेकिन उसे अभी सरकारी मान्यता और देशव्यापी इस्तेमाल की जरूरत है।
एक तरफ सरकार श्वेत क्रांति से दूध की नदियाँ बहाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ कुछ स्वार्थी तत्व सफेद जहर की नदियाँ बहा रहे हैं। सौराष्ट्र में तो हालात ऐसे हैं कि दूध में मिलावट का धंधा शराब के धंधे से भी ज्यादा खतरनाक बन गया है।
सवाल ये है कि क्या हम आज भी उसी भरोसे से एक गिलास दूध अपने बच्चे को पिला सकते हैं?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 26,2026
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