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Tuesday, 3 November 2026

ट्रंप को बड़ा झटका! मिड-टर्म चुनाव में इंडियन-अमेरिकन्स ने पलटी बाजी, 62% वोट डेमोक्रेट्स की ओर

ट्रंप को बड़ा झटका! मिड-टर्म चुनाव में इंडियन-अमेरिकन्स ने पलटी बाजी, 62% वोट डेमोक्रेट्स की ओर
-Friday World Nov 4,2026 
न्यूयॉर्क / नई दिल्ली। अमेरिका की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आने वाला है। जो इंडियन-अमेरिकन मतदाता 2024 में डोनाल्ड ट्रंप के साथ खड़े थे, वही मतदाता अब उनसे मुंह मोड़ रहे हैं। ताजा सर्वे ने रिपब्लिकन पार्टी की नींद उड़ा दी है।

कार्नेगी एंडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस और पोलिंग फर्म यू-गव के ताजा सर्वे के मुताबिक, मिड-टर्म चुनाव में इंडियन-अमेरिकन्स का झुकाव अब साफ तौर पर डेमोक्रेट्स की तरफ हो गया है। यह सिर्फ एक छोटा बदलाव नहीं है, यह एक बड़ी राजनीतिक क्रांति का संकेत है।

यह सर्वे 7 अक्टूबर से 27 अक्टूबर के बीच 1000 इंडियन-अमेरिकन मतदाताओं के बीच ऑनलाइन किया गया। नतीजे चौंकाने वाले हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं?

हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए पूछे गए सवाल में 62% से ज्यादा इंडियन-अमेरिकन्स ने कहा कि वे डेमोक्रेट उम्मीदवार को वोट देंगे। वहीं सिर्फ 19% ने रिपब्लिकन उम्मीदवार को चुनने की बात कही।

सैनेट के लिए भी तस्वीर लगभग वैसी ही है। वहां 63% इंडियन-अमेरिकन्स डेमोक्रेट्स के साथ हैं, जबकि रिपब्लिकन्स के साथ सिर्फ 21% हैं।

मतलब साफ है - हर 10 में से 6 से ज्यादा इंडियन-अमेरिकन अब डेमोक्रेट्स के साथ हैं। ट्रंप की पार्टी के साथ हर 10 में से सिर्फ 2 लोग बचे हैं। बाकी लोग अभी असमंजस में हैं या किसी तीसरे विकल्प की ओर देख रहे हैं।

2024 के राष्ट्रपति चुनाव में यही समुदाय ट्रंप के पक्ष में बड़ी संख्या में खड़ा हुआ था। उस समय कई लोगों ने माना था कि ट्रंप की सख्त नीतियां, बिजनेस फ्रेंडली माहौल और भारत के प्रति नरम रवैया इंडियन-अमेरिकन्स को पसंद आएगा। लेकिन 2 साल के अंदर ही तस्वीर पूरी तरह बदल गई।

क्यों बदले इंडियन-अमेरिकन्स? 5 बड़ी वजहें

 1. H-1B वीजा और इमिग्रेशन का डर

इंडियन-अमेरिकन्स के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है वीजा। अमेरिका में ज्यादातर भारतीय H-1B वीजा, ग्रीन कार्ड और स्टूडेंट वीजा पर आए हैं। ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में H-1B फीस में भारी बढ़ोतरी, वीजा नियमों में सख्ती और डिपोर्टेशन की खबरों ने समुदाय को डरा दिया है।

लोग कहते हैं - हमने अमेरिका को अपना घर माना, बच्चों को यहीं पढ़ाया, बिजनेस यहीं खड़ा किया। अब अगर हर दिन वीजा का डर सताएगा, तो हम किसके साथ जाएंगे? यही डर अब वोट में बदल रहा है।

 2. महंगाई और नौकरी का संकट

2024 में ट्रंप ने कहा था - मैं महंगाई खत्म कर दूंगा। लेकिन हकीकत में ग्रॉसरी, किराया, हेल्थ इंश्योरेंस और बच्चों की पढ़ाई का खर्च बढ़ता ही गया। टेक सेक्टर में छंटनी ने भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स को सबसे ज्यादा प्रभावित किया।

न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया, टेक्सास, इलिनोइस जैसे राज्यों में जहां भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं, वहां लोगों का कहना है - हमारी सैलरी वही है, खर्च दोगुना हो गया है। डेमोक्रेट्स कम से कम हेल्थकेयर, एजुकेशन और मिडिल क्लास के लिए कुछ राहत की बात तो करते हैं।

 3. नस्लीय टिप्पणियां और असुरक्षा

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणियों और हमलों की खबरें बढ़ी हैं। सोशल मीडिया पर भारतीयों को टारगेट किया गया। कई भारतीय मूल के लोगों को लगा कि रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं की भाषा ने इस माहौल को बढ़ावा दिया।

इंडियन-अमेरिकन समुदाय बेहद शांतिप्रिय और मेहनती माना जाता है। वो नहीं चाहता कि उसके बच्चे स्कूल में नस्ल की वजह से परेशान हों। डेमोक्रेट्स की समावेशी राजनीति उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगती है।

 4. भारत-अमेरिका रिश्तों में खटास

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत पर टैरिफ बढ़ाने, व्यापार में सख्ती बरतने और पाकिस्तान को लेकर दिए गए कुछ बयानों ने भी भारतीय समुदाय को नाराज किया। लोगों को लगा कि जो ट्रंप 2024 में भारत के दोस्त थे, वही ट्रंप अब व्यापार युद्ध में भारत को ही निशाना बना रहे हैं।

इंडियन-अमेरिकन्स को अपनी दोहरी पहचान पर गर्व है - वो अमेरिकन भी हैं और भारतीय भी। जब उनके मूल देश पर ही दबाव पड़ता है, तो उन्हें बुरा लगता है।

5. युवा वोटरों की नई सोच

सर्वे में सबसे बड़ा बदलाव युवा इंडियन-अमेरिकन्स में देखा गया। 18 से 35 साल के युवा अब रिपब्लिकन की पारंपरिक राजनीति से दूर जा रहे हैं। उन्हें जलवायु परिवर्तन, महिलाओं के अधिकार, गन कंट्रोल, और शिक्षा में समानता जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण लगते हैं। ये मुद्दे डेमोक्रेट्स के एजेंडे के ज्यादा करीब हैं।

युवा कहते हैं - हमें सिर्फ मंदिर और दिवाली की फोटो नहीं चाहिए, हमें भविष्य की सुरक्षा चाहिए।

ट्रंप-नेतन्याहू फैक्टर: विदेश नीति का असर

ऊपर की तस्वीर में दिख रहे ट्रंप और नेतन्याहू की जोड़ी भी इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन गई है। ट्रंप का इजरायल के प्रति खुला समर्थन और मिडिल ईस्ट में युद्ध की राजनीति ने कई इंडियन-अमेरिकन्स को असहज किया है।

कई भारतीय-अमेरिकन परिवारों का मानना है कि अमेरिका को अब युद्ध में पैसा लगाने के बजाय अपने देश के स्कूल, अस्पताल और सड़कों पर पैसा लगाना चाहिए। ट्रंप-नेतन्याहू की हर मुलाकात के बाद युद्ध की आशंका बढ़ती है, और इसका असर तेल के दाम, शेयर बाजार और नौकरियों पर पड़ता है।

डेमोक्रेट्स इस मुद्दे को भुना रहे हैं। वो कह रहे हैं - हम युद्ध नहीं, शांति चाहते हैं। हम अमेरिका को फिर से अमेरिका बनाएंगे, दुनिया का पुलिसमैन नहीं।

रिपब्लिकन पार्टी के लिए खतरे की घंटी

इंडियन-अमेरिकन्स भले ही अमेरिका की कुल आबादी का सिर्फ 1.5% हों, लेकिन वो सबसे अमीर और सबसे ज्यादा शिक्षित समुदायों में से एक हैं। उनकी वोटिंग ताकत 7-8 स्विंग राज्यों में निर्णायक हो सकती है।

जॉर्जिया, पेंसिल्वेनिया, मिशिगन, एरिजोना, नेवादा जैसे राज्यों में चुनाव अक्सर 1-2% वोट से जीते-हारे जाते हैं। वहां अगर 62% भारतीय डेमोक्रेट्स को वोट दे दें, तो रिपब्लिकन उम्मीदवार की हार पक्की है।

रिपब्लिकन रणनीतिकार अब परेशान हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि 2024 में जो समुदाय उनके साथ था, वो 2026 में क्यों छिटक गया। पार्टी के अंदर ही अब बहस शुरू हो गई है - क्या इमिग्रेशन पर सख्त रुख हमें भारी पड़ रहा है?

डेमोक्रेट्स की खुशी, लेकिन चुनौती भी

डेमोक्रेट्स के लिए यह सर्वे खुशखबरी है, लेकिन यह जीत की गारंटी नहीं है। सर्वे में हिस्सा लेने वाले कई लोगों ने कहा कि वे डेमोक्रेट्स से खुश नहीं हैं, बल्कि रिपब्लिकन्स से नाराज हैं। मतलब यह वोट प्यार का नहीं, गुस्से का है।

अगर डेमोक्रेट्स ने जीत के बाद भी H-1B, ग्रीन कार्ड बैकलॉग और महंगाई पर काम नहीं किया, तो यही वोटर 2028 में फिर पलट सकते हैं।

डेमोक्रेट उम्मीदवारों को अब इंडियन-अमेरिकन्स के बीच जाकर सिर्फ वादे नहीं, ठोस प्लान बताना होगा।

भारत में इस सर्वे की गूंज

नई दिल्ली में भी इस सर्वे पर नजर रखी जा रही है। भारत सरकार के लिए यह जानना जरूरी है कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग किस दिशा में जा रहे हैं। क्योंकि यही लोग भारत-अमेरिका रिश्तों का पुल हैं।

अगर अमेरिका की संसद में डेमोक्रेट्स की संख्या बढ़ती है, तो भारत-अमेरिका व्यापार, रक्षा सौदे और टेक्नोलॉजी सहयोग पर भी असर पड़ेगा।

आगे क्या होगा?

मिड-टर्म चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए हमेशा अग्निपरीक्षा होते हैं। अगर इस बार डेमोक्रेट्स हाउस और सैनेट में जीत जाते हैं, तो ट्रंप के आखिरी 2 साल बेहद मुश्किल हो जाएंगे। हर कानून पर रोक लगेगी, हर फैसले पर जांच होगी।

और अगर इंडियन-अमेरिकन्स का यह झुकाव चुनाव के दिन भी बरकरार रहा, तो यह साबित हो जाएगा कि 2024 का ट्रंप प्रेम सिर्फ एक लहर थी, स्थायी बदलाव नहीं।

एक बात तो तय है - इंडियन-अमेरिकन अब सिर्फ एक मूक दर्शक नहीं हैं। वो अब अमेरिका की राजनीति के किंगमेकर बन चुके हैं। जो पार्टी उन्हें नजरअंदाज करेगी, वो चुनाव हारेगी।

मंगलवार की वोटिंग बताएगी कि सर्वे का यह आंकड़ा हकीकत में बदलता है या नहीं। लेकिन एक बात साफ है - ट्रंप को अब सिर्फ नारे नहीं, काम करके दिखाना होगा। वरना 62% का यह आंकड़ा 2028 में और भी बड़ा हो सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Nov 4,2026 

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