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August 08, 2026
इलाहाबाद का खोया गौरव: जब शिक्षा का मंदिर कोमा में चला गया
इलाहाबाद का खोया गौरव: जब शिक्षा का मंदिर कोमा में चला गया
-Friday World 9 Aug 2026
इलाहाबाद से कुछ तस्वीरें देखिए। ये 500 रुपये में किराए पर पकड़कर लाए गए लोग नहीं हैं। ये वे युवा हैं जिनके कंधों पर देश के भविष्य का निर्माण करने की जिम्मेदारी है। इनके चेहरे पर सपने हैं, आँखों में जिज्ञासा है और कंधों पर वह बोझ है जो कभी इस शहर को भारत की शिक्षा राजधानी बनाता था।
कल रात राहुल गांधी ने इलाहाबाद की शिक्षा की बदहाली का एक बड़ा मसला उठाया। यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं था। यह उस शहर की याद थी जो कभी पूरे उत्तर भारत के मेधावी छात्रों का तीर्थ हुआ करता था। एक दौर था जब आईएएस अधिकारी बनने का सपना देखने वाले युवा इलाहाबाद पहुँचते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना सिर्फ डिग्री नहीं, सम्मान का प्रतीक माना जाता था। आज जिस तरह जेएनयू के बारे में कहा जाता है कि वहाँ प्रवेश मिल गया तो या तो आईएएस बनेगा या विदेश में बस जाएगा, लगभग वही छवि कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की थी। “ऑक्सफोर्ड ऑफ द ईस्ट” कहा जाने वाला यह विश्वविद्यालय न सिर्फ किताबों का, बल्कि विचारों, बहस और राष्ट्र निर्माण का केंद्र था।
हमारे एक मित्र हैं जो इलाहाबाद के ही हैं। वे बताते हैं कि 1990 के दशक से पहले प्रयागराज में 80 प्रतिशत मकान मालिक ऐसे होते थे जो अपने घरों में एक कमरा सिर्फ इसलिए रखते थे कि कोई गरीब या दूर का बच्चा वहाँ रहकर पढ़ सके और अच्छी जिंदगी पा सके। किराया गौण था। वे जितना किराया लेते थे, उससे कहीं ज्यादा बच्चों को खिला-पिला देते थे। घर के मालिक को लगता था कि वह सिर्फ कमरा नहीं दे रहा, बल्कि देश के भविष्य में निवेश कर रहा है। शायद वह नेहरू का इलाहाबाद था—जहाँ व्यक्तिगत संपत्ति से ऊपर राष्ट्र का हित था। नेहरू ने अपना घर आनंद भवन देश को समर्पित कर दिया था। उसी भावना से यह शहर भी शिक्षा को अपना धर्म मानता था।
फिर समय बदला। 1990 के बाद इलाहाबाद धीरे-धीरे अपना सम्मान खोने लगा। विश्वविद्यालय का गौरव धूल धूसरित होने लगा। भाजपा के मुरली मनोहर जोशी जैसे लोगों ने विश्वविद्यालय के प्रशासन और शैक्षिक माहौल को प्रभावित किया। बाद में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला, लेकिन इज्जत वापस नहीं आई। यूपी से कांग्रेस सरकार के जाने के साथ ही इलाहाबाद की शिक्षा की बीमारी शुरू हुई और आज वह कोमा में है। अब इस शहर का नाम कुम्भ की भगदड़ या गंगा स्नान तक सिमट गया है। शिक्षा का वह पुराना वैभव गायब हो चुका है।
आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय की हालत देखकर दिल दुखता है। पुरानी इमारतें अभी भी खड़ी हैं, लेकिन उनके अंदर की जान निकल चुकी लगती है। लाइब्रेरी में किताबें धूल खा रही हैं, कक्षाओं में चर्चा की जगह चुप्पी है और परिसर में वह बौद्धिक हलचल गायब है जो कभी पूरे देश को प्रभावित करती थी। युवा अभी भी यहाँ आते हैं, लेकिन कई बार निराशा लेकर लौटते हैं। सपने अभी भी हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने वाला माहौल नहीं बचा।
ये तस्वीरें सिर्फ चेहरों की नहीं हैं। ये उस खोए हुए गौरव की याद दिलाती हैं जब मकान मालिक किराए से ज्यादा स्नेह देते थे, जब विश्वविद्यालय में प्रवेश पाकर छात्र गर्व से सीना चौड़ा करते थे और जब इलाहाबाद सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि विचारों का केंद्र था। आज जब देश युवाओं की ताकत पर आगे बढ़ने की बात करता है, तो यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—क्या हम उन शहरों और संस्थानों को फिर से जीवित कर पाएँगे जिन्होंने कभी राष्ट्र के सबसे चमकते सितारे पैदा किए थे?
इलाहाबाद की कहानी सिर्फ एक विश्वविद्यालय की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहाँ शिक्षा कभी सेवा थी, व्यवसाय नहीं। जहाँ ज्ञान का आदान-प्रदान सिर्फ डिग्री के लिए नहीं, बल्कि समाज और देश को बेहतर बनाने के लिए होता था। अगर हम इन युवाओं के कंधों पर देश का भविष्य रखना चाहते हैं, तो पहले उन कंधों को मजबूत करने वाले संस्थानों को फिर से खड़ा करना होगा। इलाहाबाद का सम्मान वापस लौटाना होगा। नहीं तो बाकी सब प्रभु की लीला ही रह जाएगी।
ये युवा इंतजार कर रहे हैं। शहर इंतजार कर रहा है। इतिहास इंतजार कर रहा है। सवाल सिर्फ यह है कि हम कितनी जल्दी उस खोए हुए गौरव को फिर से जगाने के लिए तैयार हैं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 9 Aug 2026
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