Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Tuesday, 4 August 2026

जंग और हमलों के साये में भी अटूट आस्था: कर्बला में 2.6 करोड़ जायरीनों ने रचा अरबईन का ऐतिहासिक रिकॉर्ड

जंग और हमलों के साये में भी अटूट आस्था: कर्बला में 2.6 करोड़ जायरीनों ने रचा अरबईन का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
- Friday World 4 Aug 2026
इराक के पवित्र शहर कर्बला में इस साल अरबईन का समापन दुनियाभर में गहरे गम और अटूट आस्था के साथ हुआ। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के चालीसवें दिन मनाया जाने वाला यह महान आयोजन एक बार फिर साबित कर गया कि सच्ची आस्था किसी भी तूफान से बड़ी होती है। इस वर्ष ईरान पर अमेरिका-इजरायल की जंग और अरबईन से ठीक दो दिन पहले इराक पर सऊदी-अमेरिकी हमलों के बावजूद लगभग 2.6 करोड़ (छब्बीस मिलियन) जायरीनों ने इमाम हुसैन अ.स. की दरगाह पर हाजिरी दी। यह संख्या अपने आप में एक नया रिकॉर्ड है और मानव इतिहास की सबसे बड़ी शांतिपूर्ण सभाओं में से एक मानी जा रही है।

अरबईन सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि न्याय, बलिदान और सत्य के पक्ष में खड़े होने का जीवंत संदेश है। आशूरा के चालीस दिन बाद करबला की धरती पर लाखों-करोड़ों लोग पैदल यात्रा कर पहुंचते हैं। नजफ से कर्बला तक करीब अस्सी किलोमीटर का रास्ता इस बार भी काले कपड़ों में लिपटे जायरीनों से पट गया। रास्ते भर मुकेब (सेवा शिविर) में मुफ्त खाना, पानी, दवा और आराम की व्यवस्था देखकर हर कोई भावुक हो जाता है। इराकी लोगों की मेहमाननवाजी और स्वयंसेवकों की सेवा इस आयोजन की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

इस साल की चुनौतियां असाधारण थीं। फरवरी से चली आ रही क्षेत्रीय जंग और जुलाई के अंत में हुए हमलों ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया था। फिर भी श्रद्धालुओं का सैलाब थमा नहीं। ईरान, भारत, पाकिस्तान, लेबनान, अफ्रीका, यूरोप और दुनिया के सैकड़ों देशों से आए लोग दिखा रहे थे कि इमाम हुसैन का संदेश सीमाओं से परे है। कई जायरीन लंबी दूरी पैदल तय कर रहे थे, गर्मी और थकान झेलते हुए भी “लबbaik या हुसैन” के नारे लगा रहे थे। कर्बला की गलियों, हरम के आसपास और दोनों मस्जिदों के बीच का मंजर इस बात का गवाह बना कि आस्था किसी बम या युद्ध से नहीं रुकती।

दुनियाभर में शिया समुदाय और इमाम हुसैन के प्रेमी इस अरबईन को गहरे दर्द के साथ याद कर रहे हैं। कई जगहों पर मातम की महफिलें, जुलूस और दुआएं हुईं। लोग कह रहे हैं कि जब दुनिया में अन्याय और हिंसा का माहौल हो, तब करबला की याद और भी प्रासंगिक हो जाती है। इमाम हुसैन ने सिखाया था कि सच्चाई के लिए खड़ा होना ही असली जीत है, चाहे संख्या कम हो या परिस्थितियां कठिन। 2.6 करोड़ लोगों की हाजिरी इसी शिक्षा का जीवंत प्रमाण है।

इराकी प्रशासन और सुरक्षा बलों ने इस विशाल भीड़ के प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रयास किए। स्वास्थ्य सेवाएं, यातायात व्यवस्था और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बावजूद कई जगहों पर भीड़ का दबाव साफ दिखा। फिर भी ज्यादातर रिपोर्टों में शांतिपूर्ण वातावरण की बात कही गई। स्वयंसेवक रात-दिन सेवा में जुटे रहे। छोटे बच्चे पानी बांट रहे थे, बुजुर्ग दुआएं दे रहे थे और महिलाएं भी सक्रिय रूप से शामिल थीं। यह दृश्य देखकर लगता है कि करबला सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि इंसानियत का स्कूल है।

इस अरबईन ने एक बार फिर याद दिलाया कि धार्मिक आस्था राजनीतिक या सैन्य तनावों से ऊपर उठ सकती है। जबकि क्षेत्र में युद्ध और हमलों की खबरें छाई हुई थीं, लाखों लोग शांति और प्रेम का संदेश लेकर निकले। कई पर्यवेक्षक इसे विश्व की सबसे बड़ी गैर-हिंसक सभा बता रहे हैं। पिछले वर्षों में भी करोड़ों की संख्या पहुंचती रही है, लेकिन इस साल की परिस्थितियां देखते हुए 2.6 करोड़ का आंकड़ा विशेष महत्व रखता है।

अरबईन समाप्त हो गया, लेकिन इसका संदेश जारी रहेगा। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद सिर्फ गम मनाने तक सीमित नहीं। यह हर साल हमें याद दिलाती है कि अन्याय के सामने झुकना नहीं, बल्कि खड़ा होना चाहिए। कर्बला की धरती पर जमा हुए करोड़ों दिल इसी बात की गवाही दे रहे हैं। दुनियाभर के अजादारों के लिए यह अरबईन दर्दनाक जरूर रहा, लेकिन आस्था की जीत का भी प्रतीक बन गया।

अब जब जायरीन घर लौट रहे हैं, तो उनके साथ करबला की यादें, आंसू और इमाम हुसैन का संदेश भी जा रहा है। यह संदेश साफ है—आस्था कभी हार नहीं मानती। चाहे जंग हो या हमले, इमाम हुसैन के प्रेमी हमेशा हाजिर रहेंगे।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 4 Aug 2026

#Arbaeen2026 #Karbala #ImamHussain #ArbaeenPilgrimage #FaithUnbroken #ShiaIslam #IraqPilgrims #Hussaini #MillionStrong #PeacefulGathering