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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Saturday, 31 October 2026

October 31, 2026

ट्रंप की खार्ग द्वीप पर कब्जे की धमकी से खाड़ी में भूचाल! ईरान बोला - अमेरिकी सैनिक आए तो आग में जलेंगे

ट्रंप की खार्ग द्वीप पर कब्जे की धमकी से खाड़ी में भूचाल! ईरान बोला - अमेरिकी सैनिक आए तो आग में जलेंगे
-Friday World Oct 31,2026 
वॉशिंगटन / तेहरान - दुनिया की नजरें एक बार फिर फारस की खाड़ी पर टिकी हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा छाया युद्ध अब सीधे टकराव की कगार पर पहुंच गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सबसे अहम तेल ठिकाने - खार्ग द्वीप (Kharg Island) पर कब्जे और उसे पूरी तरह तबाह करने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में ईरान के संसद स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची की तरफ से आया सख्त बयान ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है।

क्या है खार्ग द्वीप और क्यों है इतना अहम?

खार्ग द्वीप ईरान के तट से करीब 24 किलोमीटर दूर फारस की खाड़ी के उत्तर में स्थित है। यह कोई आम द्वीप नहीं है, यह ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

- ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90% यहीं से होता है।
- यहाँ विशाल ऑयल टर्मिनल, स्टोरेज टैंक और पाइपलाइन नेटवर्क है
- यह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास है, जहाँ से दुनिया के 20% तेल की सप्लाई गुजरती है।

इसे उड़ाने या इस पर कब्जा करने का मतलब है ईरान की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला देना और साथ ही पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में आग लगा देना।

#ट्रंप ने क्या धमकी दी?

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social और Financial Times को दिए इंटरव्यू में कई बार यह बात दोहराई है।

पिछले हफ्ते ट्रंप ने लिखा, “हमने खार्ग द्वीप पर ईरान के सभी मिलिट्री टारगेट्स को पूरी तरह तबाह कर दिया है। मैंने अभी तेल के #इंफ्रास्ट्रक्चर को नहीं छुआ है। लेकिन अगर ईरान या कोई और होर्मुज #जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में रुकावट डालेगा, तो मैं तुरंत अपना फैसला बदल दूंगा।”

एक और पोस्ट में उन्होंने और बड़ी धमकी दी, “अगर जल्द ही कोई डील नहीं हुई, तो हम अपनी इस प्यारी ‘यात्रा’ को खत्म करते हुए उनके सभी #पावर प्लांट्स, ऑयल वेल्स और #खार्ग द्वीप (और शायद सभी #वाटर डिसेलिनेशन प्लांट्स) को पूरी तरह उड़ा देंगे, जिन्हें हमने अभी तक जानबूझकर नहीं छुआ है।” 

ट्रंप ने यहां तक कहा, “Maybe we take Kharg Island, maybe we don't. We have a lot of options.” यानी शायद हम #खार्ग द्वीप ले लें, शायद नहीं। हमारे पास बहुत सारे विकल्प हैं। 

#पेंटागन के मुताबिक, अमेरिका ने पहले ही 2500 अतिरिक्त मरीन और एम्फीबियस असॉल्ट शिप USS Tripoli (LHA-7) को खाड़ी में भेजने का आदेश दिया है। कुल 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट को हाई अलर्ट पर रखा गया है।

#ईरान का जवाब - आए तो आग में जला देंगे!

#ट्रंप की धमकी के बाद #तेहरान में जबरदस्त गुस्सा है।

#ईरानी संसद के #स्पीकर मोहम्मद बाकिर कालिबाफ ने कहा, “हमारे सैनिक अमेरिकी सैनिकों के जमीन पर आने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उन्हें आग में जला दें और उनके क्षेत्रीय साझेदारों को हमेशा के लिए सजा दें।” 6378

#विदेश मंत्री #अब्बास अराघची से जुड़े सूत्रों और सरकारी मीडिया में आए बयानों में कहा गया है कि पाकिस्तान में बातचीत की खबरें सिर्फ अमेरिका की सैन्य तैनाती को छुपाने का बहाना हैं। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर खार्ग द्वीप पर हमला हुआ तो वह “सभी संयम छोड़ देगा” और फारस की खाड़ी में बारूदी सुरंगें बिछा देगा, खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमला करेगा।

#कालिबाफ ने कहा, “गलत रणनीति और आवेगी फैसले पूरे बोर्ड को बदतर बना देंगे, ऊर्जा ढांचे और बाजारों को विस्फोटित कर देंगे और एक अंतहीन दलदल बना देंगे जिसमें आप सालों तक फंसे रहेंगे। आप एक अलग ईरान देखेंगे।”

#क्या कब्जा करना इतना आसान है? एक्सपर्ट्स ने कहा - डिजास्टर होगा

अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ खुद ट्रंप की इस योजना को खतरनाक बता रहे हैं।

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वली नस्र ने कहा, “खार्ग को लेना मतलब उसे तबाह करना है और ईरान बड़े पैमाने पर जवाब देगा। ईरानी जमीन लेना और उसका तेल टर्मिनल तबाह करना ईरान में प्रतिरोध की जंग की शुरुआत होगी।”

एक पूर्व वरिष्ठ अमेरिकी सैन्य अधिकारी ने कहा, “यह एक आपदा का इंतजार है।”

कारण साफ है - खार्ग द्वीप के किनारे ईरान ने महीनों से एंटी-पर्सनल माइंस, एंटी-आर्मर माइंस और कंधे पर रखकर चलाए जाने वाले MANPADS मिसाइल बैटरियां बिछा रखी हैं। मेनलैंड ईरान की पहाड़ियों से सिर्फ 16 मील दूर से ही उस पर सीधी मिसाइलें दागी जा सकती हैं। अमेरिकी सेना कुछ घंटों में द्वीप पर कब्जा तो कर सकती है, लेकिन उसे होल्ड करना लगभग नामुमकिन होगा।

वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने खुद भी भारी अमेरिकी जवानों की मौत के डर से खार्ग पर कब्जे की योजना को पहले एक बार ठुकरा दिया था और कहा था “They'll be sitting ducks” - वे बैठे हुए निशाने बन जाएंगे। 42b8

#दुनिया पर असर क्या होगा?

तेल की कीमतें:* अगर खार्ग द्वीप का टर्मिनल बंद हुआ तो ब्रेंट क्रूड 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।

होर्मुज बंद:* ईरान होर्मुज को बंद कर सकता है, जिससे भारत समेत पूरी दुनिया की एनर्जी सप्लाई पर असर पड़ेगा।

 तीसरा विश्व युद्ध का डर: ईरान ने खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सहयोगी देशों - सऊदी अरब, यूएई, बहरीन पर हमले की धमकी दी है।

फिलहाल ट्रंप ने कहा है कि ईरान में एक “ज्यादा समझदार सरकार” के साथ गंभीर बातचीत चल रही है और 10 दिन तक एनर्जी प्लांट्स पर हमला रोकने की बात भी कही है। लेकिन साथ ही सैनिकों की तैनाती जारी है। यानी एक तरफ कूटनीति और दूसरी तरफ बंदूक - दोनों एक साथ चल रहे हैं।

आगे क्या होगा? क्या खार्ग द्वीप फारस की खाड़ी का नया क्यूबा बनेगा या फिर बातचीत से रास्ता निकलेगा? पूरी दुनिया की नजरें अब 6 अप्रैल तक घोषित सीजफायर डेडलाइन पर हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 31,2026 

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October 31, 2026

वादी-ए-कश्मीर में नई बहार: CM उमर अब्दुल्ला ने पत्रकार निधि राजदान से रचाई शादी, तलाक के 3 महीने बाद शुरू हुई ‘नई जर्नी’

वादी-ए-कश्मीर में नई बहार: CM उमर अब्दुल्ला ने पत्रकार निधि राजदान से रचाई शादी, तलाक के 3 महीने बाद शुरू हुई ‘नई जर्नी’
-Friday World Oct 31,2026
श्रीनगर / नई दिल्ली - जम्मू-कश्मीर की सियासत और मीडिया की दुनिया से एक दिल को छू लेने वाली खबर सामने आई है।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (56) ने वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान (49) के साथ शादी कर ली है। दोनों ने 30 अक्टूबर को स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत निकाह/विवाह को कानूनी रूप दिया और 31 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर इसका ऐलान किया।

उमर अब्दुल्ला ने X पर लिखा - “A new journey began yesterday 💍 @Nidhi” वहीं निधि राजदान ने उसी तस्वीर के साथ लिखा - “It’s done bro 💍 @OmarAbdullah”। यह कैप्शन देखते ही सोशल मीडिया पर बधाइयों का सैलाब आ गया।

सूत्रों के मुताबिक, श्रीनगर के डल झील के पास हरि निवास में एक निजी समारोह हुआ, जिसमें दोनों परिवारों के करीबी लोग मौजूद रहे। इसके बाद 31 अक्टूबर शाम को नई दिल्ली के पृथ्वीराज रोड स्थित कश्मीर हाउस में एक छोटा रिसेप्शन भी रखा गया। शादी में उमर के पिता फारूक अब्दुल्ला, मां मॉली अब्दुल्ला, बहनें और निधि के माता-पिता वरिष्ठ पत्रकार एम.के. राजदान और सारला राजदान शामिल हुए।

#तलाक के 3 महीने बाद नया अध्याय

यह शादी ऐसे समय पर हुई है जब ठीक 3 महीने पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने उमर अब्दुल्ला का उनकी पूर्व पत्नी पायल अब्दुल्ला से तलाक मंजूर किया था।

31 जुलाई 2026 का ऐतिहासिक फैसला:जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की बेंच ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी दी थी।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया था कि दोनों पक्षों ने सभी मतभेद सुलझा लिए हैं और एक-दूसरे के खिलाफ चल रहे सभी कानूनी केस वापस लेने पर सहमत हैं। अदालत ने इसी समझौते के आधार पर शादी को खत्म करने का आदेश दिया।

यह मामला काफी लंबा चला था। उमर ने 2016 में पहली बार तलाक की अर्जी दी थी, जिसे निचली अदालत और फिर दिसंबर 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उमर सुप्रीम कोर्ट गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में दोनों को मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने को कहा था, जिसके बाद यह समझौता हुआ।

#1994 से 2009 तक का सफर: पायल से अलगाव

उमर अब्दुल्ला और पायल नाथ की मुलाकात दिल्ली के द ओबेरॉय होटल में नौकरी के दौरान हुई थी। दोनों ने सितंबर 1994 में शादी की थी। उनके दो बेटे हैं - जाहिर और जमीर।

2009 से दोनों अलग रहने लगे थे और उमर ने 2011 में आधिकारिक तौर पर अलगाव की पुष्टि की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने ऑब्जर्वेशन में कहा था कि दोनों पिछले कई वर्षों से अलग रह रहे हैं।

वहीं निधि राजदान की यह भी दूसरी शादी है। वह इससे पहले 2005 में पत्रकार और लेखक नीलेश मिश्रा से शादी कर चुकी हैं, लेकिन 2007 में उनका तलाक हो गया था।

कौन हैं #निधि राजदान?

निधि राजदान भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। उन्होंने NDTV में 21 साल तक काम किया और Executive Editor के पद तक पहुंचीं। उनका शो ‘Left, Right & Centre’ काफी लोकप्रिय रहा है। वह कश्मीर मुद्दे, राष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की एक्सपर्ट मानी जाती हैं। वह ‘Left, Right & Centre: The Idea of India’ किताब की लेखिका भी हैं।

उमर और निधि के रिश्ते की चर्चाएं 2020 से ही थीं, जब उमर को हिरासत से रिहा किया गया था और निधि ने ट्वीट कर लिखा था “Welcome back. Now please shave”। इसके बाद 16 अक्टूबर 2024 को जब उमर ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो निधि SKICC श्रीनगर में पहली पंक्ति में नजर आई थीं।

#सियासी और निजी जीवन में नया संतुलन

उमर अब्दुल्ला के लिए यह शादी निजी जीवन में स्थिरता के साथ-साथ सियासी जीवन में भी एक नए संतुलन का संकेत है। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति बदली है और मुख्यमंत्री के तौर पर उमर पर बड़ी जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में यह नई शुरुआत उनके समर्थकों के लिए भी खुशी की खबर बन गई है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं, कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों के नेताओं के साथ-साथ पत्रकारिता जगत से भी दोनों को बधाइयां मिल रही हैं।

उमर और निधि की यह कहानी बताती है कि जीवन दूसरे मौके देता है और 56 साल की उम्र में भी एक नई यात्रा शुरू की जा सकती है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 31,2026

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October 31, 2026

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का ‘जन-महाभियोग’ : खड़गे बोले - वोट का अधिकार खतरे में, राष्ट्रपति से ज्यादा सुरक्षा क्यों?

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का ‘जन-महाभियोग’ : खड़गे बोले - वोट का अधिकार खतरे में, राष्ट्रपति से ज्यादा सुरक्षा क्यों?
-Friday World Oct 31,2026
नई दिल्ली - लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव यानी चुनाव की निष्पक्षता पर आज सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन ने शनिवार को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास, 10 राजाजी मार्ग पर प्रतीकात्मक ‘जन-महाभियोग’ और ‘मॉक संसद’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। कार्यक्रम में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा सहित 21 विपक्षी दलों के नेता मौजूद रहे।

यह आयोजन शुक्रवार को होना था, लेकिन दिल्ली में लगातार बारिश के कारण इसे एक दिन के लिए टालना पड़ा था। विपक्ष ने साफ कहा है कि यह आयोजन 1 नवंबर को रामलीला मैदान में होने वाली ‘दिल्ली चलो’ रैली से ठीक पहले लोकतंत्र बचाने का संदेश है।

खड़गे का सीधा हमला - निजी दुश्मनी नहीं, संवैधानिक लड़ाई है

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि विपक्ष का CEC से कोई व्यक्तिगत बैर नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमारी लड़ाई व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से है। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग संविधान के दायरे में रहकर निष्पक्ष काम करे। दिल्ली में बैठा कोई व्यक्ति कंप्यूटर के एक क्लिक से गरीबों, दलितों, महिलाओं और युवाओं का वोट का अधिकार न छीन ले।”

खड़गे ने गंभीर आरोप लगाया कि CEC ज्ञानेश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के सीधे निर्देशों पर चुनाव आयोग चला रहे हैं।

राष्ट्रपति और CJI से भी ज्यादा सुरक्षा?

खड़गे ने दिसंबर 2023 में पारित हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि यह कानून तब पास किया गया जब विपक्ष के 145 सांसदों को संसद से निलंबित कर दिया गया था।

खड़गे का दावा है, “इस नए कानून के तहत चुनाव आयुक्त को जीवनभर के लिए ऐसा कानूनी सुरक्षा कवच दे दिया गया है, जो देश के राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भी नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।”

उन्होंने यह भी बताया कि 7 महीने पहले विपक्ष के 193 सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा में CEC को हटाने के लिए महाभियोग नोटिस दिया था, लेकिन लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा सभापति ने उसे स्वीकार ही नहीं किया।

6 बड़े आरोपों वाला प्रस्ताव

खड़गे द्वारा पेश किए गए ‘जन-महाभियोग’ प्रस्ताव में CEC ज्ञानेश कुमार पर 6 गंभीर आरोप लगाए गए:


 1. चुनाव चुराने की साजिश: राष्ट्रीय और विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने की साजिश रची गई।

 2. 13.2 करोड़ वोट काटे: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।

 3. फॉर्म-6 में चोरी-छिपे बदलाव: संसद की निगरानी के बिना वोटर रजिस्ट्रेशन के फॉर्म-6 को बदल दिया गया।
 
 4. ECINET पर कब्जा: ECINET के जरिए मतदाता सूचियों पर केंद्रीकृत नियंत्रण कर लिया गया।

5. अन्य आयुक्तों को दरकिनार: चुनाव आयोग के अन्य दो आयुक्तों को महत्वपूर्ण फैसलों से बाहर रखा गया।

6. इशारे पर काम करना: पीएम और गृहमंत्री के इशारे पर काम करने का आरोप।

SIR और वोट चोरी का मुद्दा

विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर है। खड़गे ने कहा कि बिहार में इसका पहला प्रयोग किया गया और अब पूरे देश में भाजपा विरोधी मतदाताओं को टारगेट किया जा रहा है।

“सत्ता बचाने के लिए पहले जांच एजेंसियों का इस्तेमाल हुआ, फिर इलेक्टोरल बॉन्ड्स आए और अब वोट चोरी का नया षड्यंत्र रचा जा रहा है। संविधान के अनुच्छेद 326 ने हर नागरिक को बिना भेदभाव के वोट का अधिकार दिया है, हम उसे बचाने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे।”

शशि थरूर और मीरा कुमार ने क्या कहा?

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा, “मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक निष्पक्ष अंपायर के तौर पर अपनी विश्वसनीयता खो दी है। जब संसद में हमारी महाभियोग नोटिस पर चर्चा नहीं होने दी गई, तो हमारे पास जनता के बीच ‘जन-महाभियोग’ लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं पूर्व स्पीकर मीरा कुमार ने कहा, “मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित करना लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार है। हमारा लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए।”

विपक्ष की 3 बड़ी मांगें

इस मॉक संसद में विपक्ष ने तीन मांगें रखीं:
1. CEC ज्ञानेश कुमार का तत्काल इस्तीफा या उन्हें पद से हटाया जाए।
2. 2023 का चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून रद्द किया जाए।
3. SIR की प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए और वोटर लिस्ट की स्वतंत्र समीक्षा हो।

फिलहाल यह ‘जन-महाभियोग’ केवल प्रतीकात्मक और राजनीतिक संदेश है, इसका कोई संवैधानिक वैधता नहीं है। लेकिन जानकार मानते हैं कि रामलीला मैदान रैली से पहले विपक्ष ने चुनाव आयोग बनाम लोकतंत्र की लड़ाई को सीधे जनता की अदालत में ला दिया है। अब सबकी नजरें चुनाव आयोग के जवाब और सुप्रीम कोर्ट में चल रही याचिकाओं पर टिकी हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 31,2026

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Friday, 30 October 2026

October 30, 2026

चमोली के पहाड़ों में दुखद हादसा: बद्रीनाथ से लौट रहा हेलिकॉप्टर क्रैश, पायलट समेत 6 लोगों की मौत

चमोली के पहाड़ों में दुखद हादसा: बद्रीनाथ से लौट रहा हेलिकॉप्टर क्रैश, पायलट समेत 6 लोगों की मौत
-Friday World Oct 30,2026 
#उत्तराखंड के चमोली जिले में शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को एक दिल दहलाने वाली दुर्घटना ने पूरे देश को शोक में डाल दिया। बद्रीनाथ धाम से दर्शन कर देहरादून लौट रहा ट्रांस भारत एविएशन का हेलिकॉप्टर जोशीमठ के पास चाई गांव के ऊपर पहाड़ी पर क्रैश हो गया। हेलिकॉप्टर में पायलट समेत कुल छह लोग सवार थे। खरा

#हेलिकॉप्टर का कॉल साइन VT-HCX था। यह दोपहर करीब 1:14 बजे बद्रीनाथ से देहरादून के सहस्रधारा हेलीपैड के लिए उड़ान भरी थी। जोशीमठ घाटी के ऊपर पहुंचते ही कंट्रोल रूम से संपर्क टूट गया और ट्रैकिंग सिस्टम भी उसकी लोकेशन दिखाना बंद कर दिया। स्थानीय स्तर पर धुआं उठने और जोर की आवाज सुनाई देने की सूचना मिली। करीब 2:20 बजे के आसपास चाई गांव के पास पहाड़ी पर हेलिकॉप्टर के मलबे का पता चला।

सवार लोगों की #पहचान में #पायलट कैप्टन हिमांशु (कुछ रिपोर्टों में हिमांशु सभरवाल) शामिल हैं। #पांच यात्री प्रताप (प्रथापा), अरुण (सालुंके), शंकर गौड़ा, सुधीर के. और एचएस नटराज (या नागराजा) थे। रिपोर्टों के अनुसार ये पांचों यात्री बेंगलुरु से थे। प्रारंभिक जानकारी में सभी छह के हताहत होने की आशंका जताई गई है। आधिकारिक पुष्टि अभी जारी जांच के बाद आएगी।

इस हादसे के पीछे #खराब मौसम को मुख्य संभावित कारण माना जा रहा है। मौसम विभाग ने चमोली सहित कई इलाकों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया था। बर्फबारी, घने बादल, कम दृश्यता और तेज हवाओं का अनुमान था। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम मिनटों में बदल जाता है। ऐसे में उड़ान भरने से पहले मौसम की सटीक जानकारी और सुरक्षा मानकों का पालन बेहद जरूरी होता है। हादसे के बाद कई सवाल उठ रहे हैं कि अलर्ट के बावजूद उड़ान की अनुमति कैसे दी गई।

#उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घटना की जानकारी मिलते ही अधिकारियों को निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन विभाग और एसडीआरएफ संयुक्त रूप से रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहे हैं। वे खुद पूरे घटनाक्रम की निगरानी कर रहे हैं। गंभीर रूप से घायलों को तुरंत एयरलिफ्ट कर बेहतर इलाज के लिए भेजने के निर्देश भी दिए गए। उन्होंने यात्रियों के सकुशल होने की कामना व्यक्त की।

#रेस्क्यू टीमें भारतीय सेना, इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) और स्थानीय पुलिस की हैं। इलाका दुर्गम है और खराब मौसम के कारण पहुंचना मुश्किल हो रहा है। अतिरिक्त हेलिकॉप्टर भी खोज में लगाए गए हैं। मलबा मिलने के बाद शवों को निकालने और आगे की जांच का काम चल रहा है।

#उत्तराखंड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण (यूसीएडीए) ने एहतियात के तौर पर ट्रांस भारत एविएशन के पूरे हेलिकॉप्टर बेड़े को ग्राउंड कर दिया है। यानी कंपनी के अन्य विमानों की उड़ानें फिलहाल बंद रहेंगी। जांच में मौसम की स्थिति, हेलिकॉप्टर की तकनीकी स्थिति, पायलट की तैयारी और सुरक्षा प्रोटोकॉल की गहन पड़ताल की जाएगी।

#चारधाम यात्रा क्षेत्र में हेलिकॉप्टर सेवाएं यात्रियों के लिए सुविधाजनक हैं, लेकिन #पहाड़ी इलाकों की #चुनौतियां भी कम नहीं। पहले भी केदारनाथ और अन्य रूट्स पर दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। इस घटना से फिर से सुरक्षा मानकों को और सख्त बनाने की जरूरत रेखांकित हुई है। मौसम अलर्ट के समय उड़ान संचालन पर सख्ती, बेहतर मौसम रडार सिस्टम और पायलट ट्रेनिंग पर फोकस जरूरी है।

#परिवारों के लिए यह अपूरणीय क्षति है। शोक संतप्त परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की जा रही है। प्रशासन परिवारों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराने का आश्वासन दे रहा है। घटना की पूरी जांच रिपोर्ट आने में समय लगेगा, लेकिन फिलहाल प्राथमिकता रेस्क्यू और पीड़ित परिवारों की मदद है।

यह हादसा हमें याद दिलाता है कि #प्रकृति के सामने तकनीक भी कभी-कभी #विवश हो जाती है। पहाड़ों की यात्रा करते समय सावधानी और मौसम का सम्मान सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। उम्मीद है कि जांच से सही कारण सामने आएंगे और भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 30,2026 

#ChamoliHelicopterCrash 
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October 30, 2026

“इसराइल के अरब: नागरिकता के अधिकारों के बीच पहचान की खोज और चुनौतियों भरी जिंदगी”

“इसराइल के अरब: नागरिकता के अधिकारों के बीच पहचान की खोज और चुनौतियों भरी जिंदगी”
-Friday World Oct 30,2026 
इसराइल में रहने वाले अरब लोग दुनिया के सबसे जटिल अल्पसंख्यक समुदायों में से एक हैं। इन्हें अक्सर “इजरायली अरब” या “फिलिस्तीनी नागरिक इसराइल” कहा जाता है। 2023-2024 के आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या लगभग 2.1 मिलियन है, जो इसराइल की कुल आबादी का करीब 20.9 से 21 प्रतिशत है। इनमें से अधिकांश पूर्ण इसराइली नागरिक हैं, जबकि पूर्वी येरुशलम के कुछ अरब स्थायी निवासी (permanent residents) की श्रेणी में आते हैं। 

ये लोग मुख्य रूप से 1948 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद बचे उन फिलिस्तीनी अरबों के वंशज हैं जो नए स्थापित इसराइल की सीमाओं के अंदर रह गए थे। उस समय करीब 1.5 लाख अरब इसराइल में रह गए थे, जिनकी संख्या आज बढ़कर दो मिलियन से अधिक हो गई है। 

#धार्मिक और भौगोलिक वितरण 
इनमें लगभग 83-84 प्रतिशत मुस्लिम (मुख्यतः सुन्नी), 8-9 प्रतिशत द्रूज और 7-8 प्रतिशत ईसाई हैं। द्रूज समुदाय अक्सर इसराइली पहचान को अधिक अपनाता है और कई द्रूज युवा सैन्य सेवा भी करते हैं। 

भौगोलिक रूप से ये मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में बसे हैं: 
- उत्तरी इसराइल (गैलिली) – लगभग आधी आबादी 
- सेंट्रल इसराइल का “ट्रायंगल” क्षेत्र (उम्म अल-फहम, ताइबा आदि) 
- दक्षिणी नेगेव रेगिस्तान में बेदुईन समुदाय 

नाजारेथ और रहात सबसे बड़े अरब शहर हैं। कुछ मिश्रित शहरों जैसे हाइफा, जाफा, एकर और लॉड में भी अरब आबादी रहती है। 

#कानूनी अधिकार और राजनीतिक भागीदारी 
इसराइल की स्वतंत्रता घोषणा सभी नागरिकों को धर्म, नस्ल या लिंग के आधार पर समान सामाजिक और राजनीतिक अधिकार की गारंटी देती है। अरब नागरिक वोट डालते हैं, केनेसेट (संसद) में प्रतिनिधित्व रखते हैं, न्यायाधीश बनते हैं और सरकारी नौकरियों में शामिल होते हैं। 2022 में पहली बार एक मुस्लिम न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट में स्थायी रूप से नियुक्त हुए थे। 

हालांकि, कई अरब राजनीतिक दल फिलिस्तीनी राष्ट्रीय पहचान पर जोर देते हैं और इसराइल को यहूदी राष्ट्र-राज्य के रूप में परिभाषित करने वाले कानूनों का विरोध करते हैं। 

### सामाजिक-आर्थिक स्थिति: प्रगति और अंतर 
पिछले दशक में कुछ सकारात्मक बदलाव हुए हैं। गरीबी दर में कमी आई है – 2023 में अरब परिवारों में गरीबी दर लगभग 38.4 प्रतिशत और बच्चों में 48.8 प्रतिशत रही, जो एक दशक पहले से कम है। श्रम बल में पुरुषों की भागीदारी 64 प्रतिशत के आसपास है, जबकि महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम (लगभग 37 प्रतिशत) है, हालांकि यह बढ़ रही है। 

उच्च शिक्षा में अरब छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अब वे कुल छात्रों का करीब 19 प्रतिशत हैं। कुछ विश्वविद्यालयों में अरब छात्रों की उपस्थिति उल्लेखनीय है। आय में भी वृद्धि हुई है, लेकिन यहूदी आबादी की तुलना में औसत वेतन कम है। अरब इलाकों में औसत वेतन यहूदी इलाकों से काफी कम रहता है। 

95 प्रतिशत अरब बस्तियां सामाजिक-आर्थिक सूचकांक के सबसे निचले चार क्लस्टर में आती हैं। शिक्षा, आवास, बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सेवाओं में अंतर अभी भी मौजूद है। शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा में भी अंतर देखा जाता है। 

#चुनौतियां: अपराध, पहचान और तनाव 
अरब समाज की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या संगठित अपराध और हिंसा है। हाल के वर्षों में हत्याओं की संख्या बहुत अधिक रही है – 2023 में 230 से अधिक और 2024-2025 में भी ऊंचे स्तर पर। कई अरब नागरिक पुलिस पर भरोसा नहीं करते और खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। 

पहचान का मुद्दा गहरा है। कई खुद को “फिलिस्तीनी नागरिक इसराइल” कहते हैं। वे इसराइली नागरिक होते हुए भी फिलिस्तीनी राष्ट्रीय भावना रखते हैं। अक्टूबर 2023 के बाद यहूदी-अरब संबंधों में तनाव बढ़ा है। कुछ जगहों पर आपसी अविश्वास और भय बढ़ा है। 

पूर्वी येरुशलम के अरबों की स्थिति थोड़ी अलग है – वे स्थायी निवासी हैं, वोट राष्ट्रीय चुनाव में नहीं डाल सकते, लेकिन स्थानीय सेवाओं का लाभ उठाते हैं। 

#जटिल वास्तविकता 
इसराइल के अरब नागरिकों की जिंदगी काले-सफेद नहीं है। वे पूर्ण नागरिकता के अधिकार रखते हैं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुंच रखते हैं जो कई अरब देशों से बेहतर है। साथ ही वे संरचनात्मक असमानताओं, उच्च अपराध दर, पहचान के संघर्ष और क्षेत्रीय संघर्ष के प्रभाव से जूझते हैं। 

प्रगति हो रही है – शिक्षा, महिलाओं की भागीदारी और आय में सुधार दिख रहा है। लेकिन पूर्ण समानता और सामाजिक एकीकरण अभी भी लंबी दूरी का सफर है। यह समुदाय इसराइल की विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और भविष्य में इसके अधिकारों व अवसरों को मजबूत करना पूरे समाज की स्थिरता के लिए जरूरी है। 

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 30,2026 

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October 30, 2026

सलाखों के साये में नेतन्याहू: जेल का खौफ और पतले होते हालात

सलाखों के साये में नेतन्याहू: जेल का खौफ और पतले होते हालात
-Friday World Oct 30,2026
इजराइल के लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू इन दिनों राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर भारी दबाव में हैं। अक्टूबर 2026 के संसदीय चुनावों के बाद उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई है। भ्रष्टाचार के मुकदमों का लंबा सिलसिला, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) का गिरफ्तारी वारंट और सत्ता खोने का खतरा—ये सब मिलकर उनके लिए सलाखों के पीछे जाने का खौफ पैदा कर रहे हैं। हालात वाकई पतली हैं।

नेतन्याहू 2020 से यरूशलम जिला अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे हैं। उन पर तीन मुख्य मामले हैं। केस 1000 में उन पर आरोप है कि उन्होंने व्यापारियों से महंगे उपहार लिए और बदले में फायदा पहुंचाया। केस 2000 में मीडिया कवरेज के बदले समझौतों का आरोप है। सबसे गंभीर केस 4000 में रिश्वत का आरोप है, जिसमें टेलीकॉम कंपनी को नियामक फायदे पहुंचाने के बदले अनुकूल कवरेज का दावा किया गया है। इन आरोपों में धोखाधड़ी, विश्वास भंग और रिश्वत शामिल हैं। अगर दोषी ठहराए गए तो रिश्वत के आरोप में 10 साल तक की सजा हो सकती है। नेतन्याहू इन सभी आरोपों से इनकार करते हैं और मुकदमे को राजनीतिक साजिश बताते हैं।

अक्टूबर 2026 के चुनाव में कोई स्पष्ट विजेता नहीं निकला। नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गुट को करीब 53 सीटें मिलीं, जबकि विपक्षी गुट को 48 के आसपास। अरब पार्टियों ने 19 सीटें हासिल कीं। न तो कोई गुट आसानी से 61 सीटों का बहुमत बना पा रहा है। नेतन्याहू फिलहाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने हुए हैं। लेकिन अगर वे सत्ता पूरी तरह खो देते हैं तो मुकदमे की रफ्तार तेज हो सकती है। सत्ता में रहते हुए कुछ सुरक्षा और देरी की संभावना रहती है, लेकिन बाहर निकलने पर अदालती प्रक्रिया तेज होने और दोषसिद्धि की स्थिति में जेल जाने का खतरा बढ़ जाता है। कई विश्लेषक लंबे समय से कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय तनाव और युद्धों को खींचने की कोशिशें कानूनी जवाबदेही टालने से जुड़ी हो सकती हैं।

इसके अलावा ICC ने नवंबर 2024 में गाजा में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप में नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। यह वारंट चुनाव के नतीजों से स्वतंत्र है। इजराइल ICC का सदस्य नहीं है और इसके अधिकार क्षेत्र को खारिज करता है, लेकिन ICC सदस्य देशों में यात्रा करने पर गिरफ्तारी का जोखिम बना रहता है। सत्ता खोने पर राजनयिक संरक्षण और भी कमजोर पड़ सकता है। तुर्की जैसी जगहों पर भी अलग कानूनी कार्रवाइयों की खबरें आई हैं।


नेतन्याहू की राजनीतिक जिंदगी हमेशा संघर्षपूर्ण रही है। वे इजराइल के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। लेकिन अब 77 वर्ष की उम्र में, लंबे मुकदमे, अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू विरोध के बीच उनकी स्थिति पहले से ज्यादा कमजोर दिखती है। विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट जैसे चेहरे सत्ता परिवर्तन की बात कर रहे हैं। चुनाव अभियान के दौरान नेतन्याहू ने सुरक्षा खतरों और क्षेत्रीय तनावों पर जोर दिया, लेकिन कानूनी खतरे की तलवार उनके सिर पर लगातार लटकती रही।

विशेषज्ञों के अनुसार सत्ता खोने का मतलब तुरंत जेल नहीं है। दोषसिद्धि के बाद ही सजा तय होती है। फिर भी मुकदमे की प्रक्रिया तेज होने, गवाहों और सबूतों के दबाव बढ़ने और राजनीतिक सुरक्षा खत्म होने से जोखिम साफ बढ़ जाता है। माफी या समझौते की चर्चाएं भी समय-समय पर उठती रही हैं, लेकिन कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। राष्ट्रपति इसाक हर्जोग जैसी संस्थाओं पर भी दबाव रहा है।

यह स्थिति सिर्फ नेतन्याहू की व्यक्तिगत नहीं, बल्कि इजराइल की राजनीति, न्याय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय छवि से जुड़ी है। लंबे युद्धों, सुरक्षा चुनौतियों और घरेलू ध्रुवीकरण के बीच कानूनी जवाबदेही का सवाल अब और तेज हो गया है। अगर गठबंधन वार्ताएं विफल रहीं और नई चुनाव या सत्ता परिवर्तन हुआ, तो नेतन्याहू के लिए कानूनी मोर्चा और कठिन हो सकता है।

वर्तमान में वे कार्यवाहक के रूप में बने हुए हैं और कुछ शक्तियां उनके पास हैं। लेकिन “सलाखों के पीछे जाने का खौफ” अब महज अटकल नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक गणना का हिस्सा बन चुका है। हालात पतली इसलिए हैं क्योंकि कानूनी प्रक्रिया जारी है, अंतरराष्ट्रीय वारंट सक्रिय है और घरेलू समर्थन अनिश्चित है। नेतन्याहू की सियासी कुशलता जानी-मानी है, लेकिन उम्र, मुकदमों का बोझ और बदलते राजनीतिक समीकरण उनके लिए चुनौती बढ़ा रहे हैं।

भविष्य में क्या होगा, यह गठबंधन वार्ताओं, अदालती फैसलों और क्षेत्रीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगा। फिलहाल इजराइल की राजनीति अस्थिरता के दौर से गुजर रही है और नेतन्याहू का कानूनी भविष्य इसके केंद्र में है। सत्ता की कुर्सी और जेल की सलाखों के बीच की दूरी अब पहले से कम लग रही है। यह कहानी सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि शक्ति, कानून और जवाबदेही के बीच के रिश्ते की भी है।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 30,2026 

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Thursday, 29 October 2026

October 29, 2026

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव: रिकॉर्ड तोड़ शुरुआती मतदान, कांग्रेस की सत्ता का फैसला एक सप्ताह दूर

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव: रिकॉर्ड तोड़ शुरुआती मतदान, कांग्रेस की सत्ता का फैसला एक सप्ताह दूर
-Friday World Oct 30,2026 
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के लिए घड़ी की सुइयां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। मतदान के दिन में एक सप्ताह से भी कम समय बचा है और पहले ही 4.3 करोड़ से अधिक अमेरिकी नागरिक अपना वोट डाल चुके हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ उच्च है, बल्कि पिछले कई चुनावों की तुलना में कहीं अधिक उत्साह को दर्शाता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की इलेक्शन लैब के आंकड़ों के अनुसार, हर दिन औसतन 40 से 50 लाख लोग समय से पहले मतदान कर रहे हैं। प्रोफेसर माइक मैकडोनाल्ड, जो इस डेटाबेस का संचालन करते हैं, बताते हैं कि यह रफ्तार पिछले अधिकांश चुनावों से काफी आगे है। कुल मिलाकर, इस बार का मतदान प्रतिशत 2020 या 2018 के स्तर को भी पार कर सकता है। याद रहे कि 2018 के मध्यावधि चुनाव में मतदान का रिकॉर्ड बना था, जिसने 1914 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया था।

खासतौर पर टेक्सास राज्य में मतदान का आंकड़ा चौंकाने वाला है। 2022 के मुकाबले यहां अब तक करीब 17.5 लाख अधिक लोग वोट डाल चुके हैं। राज्य में कुल 58 लाख से अधिक बैलेट पहले ही डाले जा चुके हैं। टेक्सास अब एक महत्वपूर्ण चुनावी मैदान बनकर उभरा है। यहां के नतीजे यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के शेष राष्ट्रपति कार्यकाल में सीनेट पर किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा।

हिस्पैनिक समुदायों में भी सामान्य से कहीं अधिक मतदान देखा जा रहा है। जिन राज्यों में मतदाताओं को पंजीकरण के समय अपनी राजनीतिक पार्टी बतानी होती है, वहां के आंकड़े दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के मतदाताओं का वोट प्रतिशत बढ़ा है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के शुरुआती मतदान के आंकड़े 2022 के आसपास ही स्थिर दिख रहे हैं।

गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, शुरुआती मतदान में 44 प्रतिशत वोट डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े मतदाताओं ने डाले हैं। रिपब्लिकन पार्टी के मतदाताओं का हिस्सा 31.2 प्रतिशत है, जबकि 24.7 प्रतिशत वोट उन लोगों के हैं जिन्होंने किसी पार्टी से अपना जुड़ाव दर्ज नहीं कराया। ये आंकड़े सिर्फ उन लगभग आधे राज्यों के हैं जहां पार्टी संबद्धता बताना जरूरी है। मैकडोनाल्ड के अनुसार, बिना पार्टी वाले मतदाताओं में भी शुरुआती मतदान बढ़ा है, हालांकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि उन्होंने किस उम्मीदवार को समर्थन दिया।

यह उच्च मतदान अमेरिकी राजनीति में गहरी रुचि और ध्रुवीकरण दोनों को दर्शाता है। कांग्रेस का नियंत्रण तय करने वाले इन चुनावों का असर अगले दो साल की नीतियों पर पड़ेगा। चाहे सीनेट हो या हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी राष्ट्रपति के एजेंडे को आगे बढ़ाने या रोकने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।

टेक्सास जैसे स्विंग स्टेट्स और अल्पसंख्यक समुदायों की सक्रियता इस बार के चुनाव को खास बना रही है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो 2026 के मध्यावधि चुनाव न सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ मतदान के लिए याद किए जाएंगे, बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र में जनभागीदारी के नए मानक भी स्थापित करेंगे। मतदान का अंतिम दिन नजदीक आ रहा है और पूरा देश नतीजों का इंतजार कर रहा है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 30,2026 

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