-Friday World January 17,2026
विश्व की भू-राजनीति में एक नया तूफान उठ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद और इसे अमेरिका में शामिल करने की खुली धमकियों ने यूरोपीय देशों को एकजुट कर दिया है। दुनिया का सबसे बड़ा टापू ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और यूरोपीय संघ से जुड़ा हुआ है, अब अमेरिका और यूरोप के बीच बड़े टकराव का केंद्र बन गया है। फ्रांस ने इसे 'लाल रेखा' (रेड लाइन) करार देते हुए अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड के साथ कोई छेड़छाड़ नई दुनिया का निर्माण कर देगी—एक ऐसी दुनिया जहां पुराने गठबंधन टूट सकते हैं और आर्थिक संबंध ध्वस्त हो सकते हैं।
फ्रांस की सख्त चेतावनी: 'ग्रीनलैंड के साथ गड़बड़ मत करो!' फ्रांस के वित्त मंत्री रोलां लेस्क्युर (Roland Lescure) ने अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट को सीधे संदेश दिया कि ग्रीनलैंड पर कोई सैन्य कार्रवाई या जबरन कब्जे का प्रयास 'क्रॉस्ड लाइन' होगी। उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, "ग्रीनलैंड एक संप्रभु देश (डेनमार्क) का हिस्सा है और यूरोपीय संघ से जुड़ा है। इसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। अगर अमेरिका ऐसा करता है, तो यह यूएस-ईयू के आर्थिक संबंधों को गंभीर खतरे में डाल देगा और पूरी तरह नई दुनिया बन जाएगी।"
यह चेतावनी महज शब्द नहीं है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे और मजबूत करते हुए घोषणा की कि अमेरिका की इस महत्वाकांक्षा से 'अभूतपूर्व परिणाम' (unprecedented cascading consequences) होंगे। मैक्रों ने इसे 'नया वसाहतवाद' करार दिया और कहा कि यूरोप को अपने हितों और क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा करनी होगी। फ्रांस ने ग्रीनलैंड में 'लैंड, एयर और सी' फोर्सेस तैनात करने की शुरुआत कर दी है, जो ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस के तहत डेनमार्क के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास का हिस्सा है।
यूरोपीय देशों की सैन्य तैनाती: एकजुटता का मजबूत संदेश
ट्रंप की धमकियों के बाद यूरोप ने तुरंत कार्रवाई की। डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड्स और फिनलैंड जैसे देशों ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजे हैं।
- फ्रांस: लगभग 15 माउंटेन इन्फैंट्री सैनिक पहले ही पहुंच चुके हैं, और और अधिक थल, वायु व नौसेना बल आने वाले दिनों में तैनात होंगे।
- जर्मनी: 13 सदस्यीय टोही टीम।
- अन्य देश: स्वीडन, नॉर्वे और नीदरलैंड्स से छोटी-छोटी टीमें।
यह तैनाती प्रतीकात्मक से ज्यादा रणनीतिक है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसन ने साफ कहा कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर हमला करता है, तो **नाटो का अंत** हो जाएगा। उन्होंने इसे 'पोस्ट-वर्ल्ड वॉर II सुरक्षा व्यवस्था' के लिए खतरा बताया। यूरोपीय नेता एक सुर में कह रहे हैं कि पुराना वसाहतवादी युग खत्म हो चुका है और किसी भी देश की संप्रभुता पर हमला अस्वीकार्य है।
ग्रीनलैंड क्यों इतना महत्वपूर्ण? ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फीला टापू नहीं है। यह आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यहां प्रचुर मात्रा में दुर्लभ खनिज, दुर्लभ धातुएं और प्राकृतिक संसाधन हैं, जो आधुनिक तकनीक और रक्षा के लिए जरूरी हैं। भौगोलिक स्थिति के कारण यह अमेरिका, रूस और चीन के बीच आर्कटिक नियंत्रण की लड़ाई का केंद्र है। ट्रंप बार-बार कह चुके हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 'जरूरी' है, ताकि रूस या चीन इसका फायदा न उठा सकें। उन्होंने पहले भी इसे 'खरीदने' की कोशिश की थी, लेकिन अब बल प्रयोग से इंकार नहीं किया।
ट्रंप का तर्क है कि डेनमार्क इसे सुरक्षित नहीं रख सकता, लेकिन यूरोपीय देश इसे अमेरिकी 'नया वसाहतवाद' मानते हैं।
क्या होगा आगे? नाटो टूटेगा या ट्रेड वॉर? यह संकट अमेरिका-यूरोप संबंधों के लिए सबसे बड़ा परीक्षण है। फ्रांस की चेतावनी से ट्रेड वॉर की आशंका बढ़ गई है। अगर अमेरिका आगे बढ़ता है, तो यूरोपीय संघ आर्थिक प्रतिबंध या टैरिफ लगा सकता है। वहीं, डेनमार्क और यूरोप ने साफ कर दिया कि ग्रीनलैंड 'बिकाऊ' नहीं है।
ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति अब यूरोप के साथ टकराव पर आ गई है। सवाल यह है—क्या अमेरिका अपने दशकों पुराने सहयोगियों से टकराव मोल लेगा? या पीछे हटेगा? ग्रीनलैंड का भविष्य अब वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकता है।
यह मुद्दा सिर्फ एक टापू का नहीं, बल्कि संप्रभुता, गठबंधनों और नई विश्व व्यवस्था का है। दुनिया निगाहें टिकाए बैठी है—क्या ट्रंप की जिद नई जंग छेड़ देगी या कूटनीति जीतेगी? समय बताएगा!
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 17,2026