पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। गुरुवार (15 जनवरी 2026) को उत्तर दिनाजपुर जिले के चाकुलिया में ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) कार्यालय में भारी तोड़-फोड़ और आगजनी की घटना हुई, जो लगातार दूसरे दिन की हिंसा है। इससे पहले बुधवार को मुर्शिदाबाद के फरक्का में भी इसी तरह का हंगामा हुआ था। ये घटनाएं राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के संशोधन प्रक्रिया पर गहराते राजनीतिक विवाद को उजागर कर रही हैं।
चाकुलिया में हिंसा का सिलसिला उत्तर दिनाजपुर के चाकुलिया (गोलपोकहर-II ब्लॉक) में सुबह करीब 9:30 बजे से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन दोपहर तक हिंसक हो गया। लगभग 300 लोगों की भीड़ ने जबरन बीडीओ कार्यालय में घुसकर फर्नीचर, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और सरकारी दस्तावेजों को नष्ट कर दिया। एसआईआर से जुड़े फॉर्म और रिकॉर्ड्स को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने रोकने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हमला कर दिया, जिसमें चाकुलिया थाने के इंस्पेक्टर-इन-चार्ज समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।
बीडीओ ने चाकुलिया थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने 10 लोगों को गिरफ्तार किया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य राजमार्ग भी ब्लॉक किया और टायर जलाकर विरोध जताया। पुलिस ने बताया कि शुरुआत में सूखी लकड़ियों में आग लगाई गई थी, लेकिन बाद में कार्यालय के अंदर भी आगजनी हुई। चुनाव आयोग ने इस घटना पर मुख्य चुनाव अधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
फरक्का में पहले दिन की घटना बुधवार को मुर्शिदाबाद के फरक्का में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक मनीरुल इस्लाम और उनके समर्थकों पर बीडीओ कार्यालय में तोड़-फोड़ का आरोप लगा। एसआईआर सुनवाई के दौरान हंगामा हुआ, जिससे प्रक्रिया रुक गई। बीडीओ कार्यालय में कुर्सियां फेंकी गईं और दस्तावेज नष्ट किए गए। पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और दो लोगों को गिरफ्तार किया। फरक्का में करीब 30 बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) ने काम से इस्तीफा दे दिया, कार्यभार और जनता की नाराजगी का हवाला देते हुए।
एसआईआर क्या है और क्यों विवाद? स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) चुनाव आयोग की एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची की गहन जांच की जाती है। इसका उद्देश्य अयोग्य नामों (जैसे मृतक, दोहरे नामांकन या अवैध प्रवासी) को हटाना और योग्य मतदाताओं को शामिल करना है। पश्चिम बंगाल में यह प्रक्रिया 2002 की पुरानी सूची के आधार पर की जा रही है, जिसमें 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' (जैसे उम्र में असंगति, नाम मेल न खाना) के आधार पर लाखों मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाया गया। टीएमसी का आरोप है कि यह प्रक्रिया अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है और बिना तैयारी के लागू की गई है, जिससे आम लोगों को परेशानी हो रही है।
राजनीतिक बयानबाजी तेज टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने कहा, "अगर चुनाव आयोग 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' लिस्ट जारी नहीं करता, तो कोलकाता और दिल्ली में बड़े लोकतांत्रिक विरोध होंगे। बंगाल को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? बिना प्लानिंग के एसआईआर से 82 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, इसके लिए ज्ञानेश कुमार जिम्मेदार हैं।"
वहीं, भाजपा नेता राजू बिस्ता ने पलटवार किया, "एसआईआर इसलिए हो रहा है ताकि मतदाता सूची की गड़बड़ियां सुधार सकें। अभिषेक बनर्जी ने इसे पढ़ा या समझा नहीं है, वे सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं।"
आगे क्या? ये घटनाएं दिखाती हैं कि एसआईआर प्रक्रिया राज्य में राजनीतिक तनाव का बड़ा केंद्र बन गई है। चुनाव आयोग ने सख्त निर्देश दिए हैं और सुरक्षा बढ़ाई है। यदि विरोध जारी रहा, तो सुनवाई प्रभावित हो सकती है। अंतिम मतदाता सूची फरवरी 2026 में प्रकाशित होने वाली है, लेकिन हिंसा से लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
यह स्थिति 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले बंगाल की राजनीति को और गरमा सकती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 16, 2026